गुरु ग्रंथ साहिब 319 · Raag Gauree
1महला ५॥
2दुनिया का व्यवहार वैसा है, जैसे दामिनी की चमक है।
3हे नानक ! केवल वही वस्तु सुन्दर है, जो उस मालिक-प्रभु का नाम जपना है॥ २॥
4पउड़ी॥
5मनुष्यों ने स्मृतियाँ, शास्त्र भली प्रकार देखे हैं परन्तु किसी ने भी ईश्वर का मूल्यांकन नहीं जाना।
6जो पुरुष संतों की संगति के साथ मिलता है, वह प्रभु की प्रीति का आनंद भोगता है।
7सृष्टि के रचयिता ईश्वर का सत्य नाम, रत्नों की खान है।
8जिसके मस्तक पर (शुभ कर्मों से) भाग्य हों, वही मनुष्य भगवान का चिन्तन करता है।
9हे स्वामी ! नानक का आतिथ्य-सत्कार यही है केि अपना सत्य नाम परलोक के लिए खर्च के रूप में दे ॥ ४ ॥
10श्लोक महला ५॥
11जिस पुरुष के मन में चिन्ता है, लेकिन नयनों से देखने से सुखी प्रतीत होता है, उसकी माया की भूख बिल्कुल नहीं मिटती।
12हे नानक ! सत्य नाम के अतिरिक्त किसी का भी दुःख दूर नहीं होता।। १ ।।
13महला ५॥
14उन (जीव-) व्यापारियों के समूह के समूह लुट गए (मानो) जिन्होंने ईश्वर का नाम-रूपी सौदा नहीं लादा।
15(परन्तु) हे नानक ! जिन्होंने गुरु को मिलकर ईश्वर को पहचान लिया है, उनको शुभकामनाएँ मिलती हैं।॥ २ ॥
16पउड़ी ॥
17जहाँ साधुजन विराजमान होते हैं, वह स्थान अति सुन्दर है।
18चूंकि ऐसे व्यक्ति अपने समर्थ प्रभु को स्मरण करते हैं, जिससे उनके मन से तमाम पाप (विकार) मिट जाते हैं।
19हे पारब्रह्म ! तुम पतित प्राणियों का उद्धार करने वाले हो- यह बात संतजन और वेद भी कहते हैं।
20तेरा विरद् भक्तवत्सल है, जो युगों-युगांतरों में इस्तेमाल होता है।
21नानक एक तेरा ही नाम माँगता है, जो उसके मन एवं शरीर को भला लगता है।॥ ५ ॥
22श्लोक महला ५॥
23जब पौ फूटती है अर्थात् थोड़ा-सा उजाला होता है तो चिड़ियाँ चहकती हैं और उस समय भक्तो के हदय में स्मरण की लहरें उठती हैं।
24हे नानक ! जिन संतजनों का ईश्वर के नाम में प्रेम होता है, उन्होंने पौ फूटने के समय कौतुकमय रूप रचे होते हैं।॥ १॥
25महला ५॥
26हे ईश्वर ! उन घरों, मन्दिरों में ही हर्षोल्लास होता है, जहाँ तू याद आता है।
27हे नानक ! यदि ईश्वर भूल जाए तो दुनिया का तमाम ऐश्वर्य-वैभव खोटे मित्र समान है॥ २॥
28पउड़ी।
29हे भाइयो ! ईश्वर का नाम रूपी धन ही सच्ची पूँजी है। लेकिन किसी विरले पुरुष ने ही यह बात समझी है,
30केवल यह पूंजी उसे ही प्राप्त होती है, जिसे विधाता स्वयं प्रदान करता है।
31ईश्वर का सेवक (जिसे नाम-राशि मिलती है) ईश्वर के रंग में मग्न हो जाता है, वह अपने तन-मन में कृतार्थ हो जाता है।
32सत्संग में वह भगवान की प्रशंसा करता है और इस प्रकार तमाम दुःखों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
33हे नानक ! केवल वही मनुष्य जीता है, जिसने एक ईश्वर को पहचान लिया है॥ ६॥
34श्लोक महला ५॥
35आक के फूल तब तक सुन्दर हैं जब तक आक के साथ लगे हुए हैं,
36(परन्तु) हे नानक ! अपने मालिक से प्रीति टूटने पर उनके हजारों टुकड़े हो जाते हैं।॥ १॥
37महला ५॥
38ईश्वर को भुलाने वाले प्राणी प्राण त्याग गए हैं, परन्तु वे अच्छी प्रकार मर भी नहीं सके।
39जो राम से विमुख हुए हैं, वे इस प्रकार हैं जैसे सूली पर चढ़ाए गए चोर हों।॥ २॥
40पउड़ी॥
41एक ईश्वर ही सर्व सुखों का भण्डार है जो अविनाशी सुना जाता है।
42ईश्वर सागर, पृथ्वी, गगन हर जगह पर सर्वव्यापक है, वह तो कण-कण में मौजूद कहा जाता है,
43वह ऊँचे-नीचे तमाम जीवों में एक समान विद्यमान है। कीड़े से लेकर हाथी तक सभी उस ईश्वर से ही बने हैं।
44मित्र, साथी, पुत्र, रिश्तेदार सभी उस ईश्वर के ही पैदा किए हुए हैं।
45हे नानक ! जिसे ईश्वर अपनी प्रसन्नता द्वारा अपना ‘नाम' प्रदान करता है, वह उसकी प्रीति का आनंद प्राप्त करता है॥ ७ ॥
46श्लोक महला ५॥
47जिन लोगों को श्वास लेते एवं खाते समय कभी भी ईश्वर नहीं भूलता, जिनके ह्रदय में हरि नाम-रूपी मन्त्र है,
48हे नानक ! ऐसे व्यक्ति ही भाग्यवान हैं और वही पूर्ण संत हैं॥ १॥
49महला ५॥
50जो व्यक्ति खाने के दुःख में दिन-रात भटकता फिरता है,
51ऐसा व्यक्ति नरक में पड़ने से किस तरह बच सकता है, यदि वह अपने हृदय में गुरु-पैगम्बर के माध्यम से ईश्वर को ही स्मरण नहीं करता ॥ २ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं