गुरु ग्रंथ साहिब 318 · Raag Gauree
1गउड़ी की वार महला ५ राइ कमालदी मोजदी की वार की धुनि उपरि गावणी
2ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
3श्लोक महला ५ ॥
4जो व्यक्ति भगवान के नाम का सिमरन करता है, उसका दुनिया में जन्म लेना सफल है।
5जिस व्यक्ति ने निर्लेप प्रभु का भजन किया है, मैं उस पर बलिहारी जाता हूँ।
6उसे सर्वज्ञ हरि मिल गया है, उसका जन्म-मरण का दुःख-क्लेश मिट गया है।
7हे नानक ! उसे एक सत्यस्वरूप परमात्मा का ही सहारा है, उसने सत्संग में रहकर भवसागर पार कर लिया है॥ १॥
8महला ५॥
9यदि प्रातः काल उठकर कोई महापुरुष अतिथि मेरे घर आए,
10मैं उस महापुरुष के चरण धोऊं और मेरे मन एवं तन को वह सदा प्यारा लगे।
11वह महापुरुष नित्य नाम सुने, नाम-धन संचित करे और नाम में ही सुरति लगाकर रखे।
12उसके आगमन से मेरा सारा घर पवित्र हो जाए, मैं भी भगवान का गुणानुवाद करता रहूँ।
13हे नानक ! ऐसा प्रभु के नाम का व्यापारी भाग्य से ही मिल सकता है॥ २ ॥
14पउड़ी ॥
15हे परमात्मा ! जो कुछ तुझे भला लगता है, तेरा वही हुक्म भला है।
16तुम सब जीव-जन्तुओं में मौजूद हो, सब में समाए हुए हो।
17हे प्रभु ! तुम सर्वव्यापक हो और समस्त प्राणियों में तुम ही जाने जाते हो।
18परमात्मा की इच्छा को स्वीकार करने से वह सत्य प्रभु सत्संग में रहकर ही प्राप्त होता है।
19नानक तो उस ईश्वर की शरण में है और उस पर सदैव ही न्यौछावर है॥ १॥
20श्लोक महला ५॥
21यदि तुझे स्मरण है तो उस सच्चे साहिब को याद कर, जो सबका मालिक है।
22हे नानक ! सतिगुरु की सेवा रूपी जहाज पर सवार होकर भयानक संसार-सागर से पार हो जा ॥ १॥
23महला ५॥
24मूर्ख इन्सान सुन्दर सूक्ष्म वस्त्र बड़े अभिमान से पहनते हैं,
25परन्तु हे नानक ! मरणोपरांत ये वस्त्र प्राणी के साथ नहीं जाते, यहाँ जलकर राख हो जाते हैं॥ २ ॥
26पउड़ी॥
27केवल वही इन्सान इस दुनिया में बचे हैं, जिनकी सच्चे परमेश्वर ने रक्षा की है।
28ऐसे लोगों के दर्शन करके हरि-नाम रूपी अमृत चखा जा सकता है।
29संतों की संगति करने से काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि विकार नष्ट हो जाते हैं।
30प्रभु स्वयं उनकी जांच-पड़ताल करता है, जिन पर वह अपनी कृपा-दृष्टि करता है।
31हे नानक ! भगवान के कौतुक समझे नहीं जा सकते, कोई प्राणी समझ नहीं सकता ॥ २ ॥
32श्लोक महला ५॥
33हे नानक ! वही दिन शुभ एवं सुन्दर है, जिस दिन ईश्वर मन में याद आता |है।
34जिस दिन भगवान भूल जाता है, वह ऋतु अशुभ एवं धिक्कार योग्य है॥ १॥
35महला ५॥
36हे नानक ! उस (ईश्वर) के साथ मित्रता कर, जिसके वश में सब कुछ है।
37जो एक कदम भी मनुष्य के साथ नहीं चलते, वे कुमित्र कहलाते हैं।॥ २॥
38पउड़ी ॥
39हे भाई ! ईश्वर का नाम अमृत (रूपी) खजाना है, उस अमृत को सत्संग में मिलकर पियो।
40जिसका सिमरन करने से सुख प्राप्त होता है और सारी तृष्णा मिट जाती है।
41गुरु पारब्रह्म की सेवा करने से कोई भूख नहीं रहेगी।
42(नाम-सिमरन करने से) सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और अमरपद प्राप्त हो जाता है।
43हे पारब्रह्म ! तुझ जैसा तू ही है और नानक तेरी शरण में है॥ ३॥
44श्लोक महला ५॥
45मैंने हर जगह पर (भगवान को) देखा है, कोई भी स्थान उससे खाली नहीं है।
46हे नानक ! जिन्हें सतिगुरु मिल गया है, उन्हें जीवन का आनंद मिल गया है॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं