गुरु ग्रंथ साहिब 317 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1जो मनुष्य पारब्रह्म द्वारा मृत हैं, वे किसी के (सगे) नहीं।
2यह धर्म का न्याय है कि जो लोग निर्वेरों के साथ वैर करते हैं, वे बहुत दुखी होते हैं।
3जो व्यक्ति संतों से शापित हैं, वे योनियों में भटकते रहते हैं।
4जब वृक्ष जड़ से उखाड़ दिया जाता है तो इसकी टहनियाँ भी सूख जाती हैं।॥ ३१॥
5श्लोक महला ॥५॥
6हे नानक ! मेरे मन में गुरु ने उस भगवान का नाम दृढ़ किया है, जो सहज ही सृष्टि की रचना एवं सृष्टि का विनाश करने में समर्थ है।
7हे मित्र ! यदि तू भगवान को सदैव स्मरण करे तो तेरे तमाम दुःख निवृत्त हो जाएँ॥ १॥
8महला ५॥
9भूखा मनुष्य मान-अपमान तथा अपशब्दों की परवाह नहीं करता।
10हे हरि ! नानक तो तेरा नाम ही माँगता है, इसलिए कृपा करके ऐसा संयोग बना दे॥ २॥
11पउड़ी ॥
12इन्सान जैसा कर्म करता है, उसका वैसा ही फल प्राप्त करता है।
13यदि कोई इन्सान गर्म एवं कड़ा लोहा चबाए तो वह गले में चुभ जाता है।
14उसके खोटे कर्मों के कारण यमदूत उसके गले में रस्सा डालकर आगे धकेल देता है।
15उसकी कोई भी आशा पूरी नहीं होती, वह हमेशा पराई मैल चोरी करता है।
16कृतघ्न इन्सान भगवान के किए हुए उपकार का आभार व्यक्त नहीं करता, इसलिए योनियों में भटकता रहता है।
17जब उसके समस्त सहारे समाप्त हो जाते हैं तो फल भोगने हेतु ईश्वर उसे दुनिया से उठा लेता है।
18वह लड़ाई की अग्नि यो बुझने नहीं देता था, इसलिए परमात्मा ने उसे समेट लिया है।
19जो जो लोग अभिमान करते हैं, वे ढह कर धरती पर ही गिरते हैं॥ ३२ ॥
20श्लोक महला ३॥
21गुरमुख में ही ज्ञान तथा विवेक बुद्धि होती है।
22वह भगवान की महिमा-स्तुति करता है और अपने ह्रदय में उनकी माला पिरोता है।
23वह पवित्र-पावन एवं उच्च बुद्धि वाला होता है।
24जो व्यक्ति उसकी संगति करता है, वह उसे भी भवसागर से पार करवा देता है।
25उसके हृदय में प्रभु नाम (रूपी) सुगन्ध समाई होती है,
26वह भगवान के दरबार में बड़ी शोभा प्राप्त करता है और उसकी वाणी सर्वोत्तम होती है,
27जो पुरुष उस वाणी को सुनता है, वह कृतार्थ हो जाता है।
28हे नानक ! सतिगुरु को मिलकर उसने यह नाम (रूपी) धन-सम्पति प्राप्त की है॥ १॥
29महला ४॥
30सतिगुरु के हृदय का भेद इन्सान की समझ में नहीं आ सकता कि सतिगुरु को क्या भला लगता है।
31परन्तु सतिगुरु गुरसिक्खों के हृदय में मौजूद है। जो मनुष्य उनकी (सेवा की) कामना करता है, वह गुरु की प्रसन्नता के दायरे में आ जाता है।
32(क्योंकि) सतिगुरु जो आज्ञा देता है, वही काम गुरसिक्ख करते हैं। सत्य के घर में गुरु के सिक्खों की सेवा स्वीकार हो जाती है।
33जो मनुष्य सतिगुरु की आज्ञा के विरुद्ध गुरसिक्खों के पास से काम कराना चाहे, गुरु का सिक्ख फिर उसके निकट नहीं जाता,
34(परन्तु) जो मनुष्य सतिगुरु के दरबार में एकाग्रचित होकर सेवा करता है, गुरसिक्ख उसकी सेवा करता है।
35जो मनुष्य छल-कपट करने हेतु आता है और छल-कपट के ख्याल में चला जाता है, उसके निकट गुरु का सिक्ख कभी नहीं आता।
36नानक यही ब्रह्म विचार कह कर सुनाता है केि
37जो व्यक्ति सतिगुरु के मन को प्रसन्न किए बिना कार्य कराता है, वह व्यक्ति बहुत दुख भोगता है॥ २॥
38पउड़ी ॥
39हे परमात्मा ! तू ही सच्चा मालिक है जो सबसे महान है तथा तुझ जैसा तू स्वयं ही महान है, अन्य कोई नहीं।
40जिसे तू अपने साथ मिलाता है, वही तुझसे मिलता है। तू स्वयं ही उसका लेखा छोड़कर उसे क्षमा कर देता है।
41जिसे तू आप मिलाता है, वही मन लगाकर सतिगुरु की सेवा करता है।
42हे प्रभु ! तू सत्य है, तू सच्चा मालिक है, जीवों का सब कुछ-प्राण, शरीर, त्वचा, अस्थि-तेरा ही दिया हुआ है।
43हे सत्यस्वरूप परमात्मा ! जैसे तुझे उपयुक्त लगता है, वैसे ही हमें रख लो, नानक के मन में तेरी ही आशा है॥ ३३॥ १॥ शुद्ध ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं