गुरु ग्रंथ साहिब 316 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1भगवान ने तपस्वी का भीतरी पाप को पंचों को प्रकट करके दिखा दिया है।
2धर्मराज ने अपने यमदूतों को कह दिया है कि इस तपस्वी को ले जाकर उस स्थान पर डाल दो, जहाँ बड़े से बड़े महाहत्यारे डाले जाते हैं।
3यहाँ भी इसके मुँह कोई न लगे, क्योंकि यह तपस्वी सतिगुरु की ओर से तिरस्कृत है।
4हे नानक ! जो कुछ यह ईश्वर के दरबार में हुआ है, उसे कहकर सुना दिया है,
5इस तथ्य को वही इन्सान समझता है, जिसे परमात्मा ने संवारा हुआ है॥ १॥
6महला ४॥
7भगवान के भक्त भगवान की आराधना करते हैं और भगवान की गुणस्तुति करते हैं।
8भक्त नित्य भगवान का भजन कीर्तन करते हैं। भगवान का नाम बड़ा सुखदायक है।
9अपने भक्तों को भगवान ने हमेशा के लिए नाम का गुण प्रदान किया है, जो दिन-ब-दिन बढ़ता जाता है।
10भगवान ने अपने विरद की लाज रखी है और उसने अपने भक्तों को आत्मस्वरूप स्थिर घर में बिठा दिया है।
11निन्दकों से भगवान लेखा माँगता है और बहुत कठोर दण्ड देता है।
12निन्दक जैसा अपने मन में कमाते हैं, वैसा ही फल उन्हें मिलता है। (क्योंकि)
13भीतर बैठकर किया हुआ काम निश्चित ही प्रत्यक्ष हो जाता है चाहे कोई इसे धरती के नीचे करे।
14नानक भगवान की महिमा देखकर कृतार्थ हो रहा है॥ २॥
15पउड़ी महला ५॥
16भगवान अपने भक्तों का स्वयं रखवाला है। पापी क्या कर सकता है?
17मूर्ख घमण्डी इन्सान बड़ा घमण्ड करता है और (अहंकार-रूपी) विष खाकर मर जाता है।
18जीवन के थोड़े दिन जो उसने व्यतीत करने थे, समाप्त हो गए हैं और पकी हुई फसल की भाँति काट लिया जाएगा।
19मनुष्य जैसे जैसे करता है, (प्रभु के दरबार में भी) वैसे ही कहलवाते हैं।
20नानक का मालिक प्रभु महान है, जो सारी दुनिया का ही मालिक है॥ ३०॥
21श्लोक महला ४॥
22झूठ, लालच एवं अहंकार के कारण स्वेच्छाचारी इन्सान अपने मूल (भगवान) को ही भुला देते हैं।
23उनके रात-दिन झगड़ा करते हुए ही बीत जाते हैं और वे शब्द का चिन्तन नहीं करते।
24परमात्मा ने उनकी सारी मति-बुद्धि छीन ली है और वह सब विकार ही बोलते हैं।
25वे किसी की देन से संतुष्ट नहीं होते, क्योंकि उनके हृदय में तृष्णा एवं अज्ञानता का अँधेरा बना होता है।
26हे नानक ! ऐसे स्वेच्छाचारी लोगों से तो संबंधविच्छेद ही बेहतर है, जिनका मोह-माया से ही प्रेम होता है॥ १॥
27महला ४॥
28जिन लोगों के अन्तर्मन में द्वैत भावना से प्रेम होता है, वह गुरमुखों से प्रेम नहीं करते।
29ऐसे व्यक्ति जन्मते-मरते और आवागमन में भटकते हैं, और उन्हें स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता।
30वह झूठ का ही कार्य करते हैं, झूठ ही बोलते हैं और झूठ से जुड़कर वह झूठे हो जाते हैं।
31माया का मोह दुःख ही है। दुख द्वारा मनुष्य मरता है और दुख द्वारा ही वह विलाप करता है।
32हे नानक ! माया एवं ईश्वर का प्रेम शोभायमान नहीं हो सकता, चाहे हरेक मनुष्य इच्छा करे।
33जिनके खजाने में पुण्य हैं, वे गुरु के शब्द द्वारा सुख प्राप्त करते हैं।॥ २॥
34पउड़ी महला ५ ॥
35हे नानक ! संत एवं मुनिजन विचार करते हैं और चारों वेद भी कहते हैं कि
36भक्तजन जो वचन मुख से बोलते हैं, वे (सत्य) पूरे हो जाते हैं।
37भक्त सारी दुनिया में लोकप्रिय होते हैं और उनकी शोभा सभी लोग सुनते हैं।
38जो मूर्ख मनुष्य संतों से वैर करते हैं, वे सुख नहीं पाते
39वे दोषी जलते तो अहंकार में हैं परन्तु भक्तजनों के गुणों के लिए तरसते हैं।
40इन दोषी मनुष्यों के वश में भी क्या है? क्योंकि आदि से (नीच कर्मों के कारण) नीच संस्कार ही उनका भाग्य है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं