सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 315 · Raag Gauree

1श्लोक महला ५॥

2शेष बचे हुए निन्दकों को भगवान ने स्वयं ही (प्रयास करके) समाप्त कर दिया है।

3हे नानक ! संतजनों की सहायता करने वाला भगवान सर्वत्र प्रत्यक्ष रूप में व्यापक हो रहा है॥ १॥

4महला ५॥

5जो पुरुष पहले से ही भगवान को भूल गए हैं, वे और किसका सहारा लें ? (क्योंकि)

6हे नानक ! इनको उस प्रभु ने मारा हुआ है, जो जगत् का मूल प्रत्येक कार्य करने एवं करवाने में समर्थ है॥ २ ॥

7पउड़ी ५ ॥

8मनुष्य रात को कमन्द लेकर चलते हैं परन्तु ईश्वर उन्हें जानता है,

9भीतर छिपकर पराई औरतों की ओर देखते हैं,

10विषम स्थान पर सेंध लगाते हैं और मदिरा को मीठा मानते हैं।

11आखिरकार आप अपने किए कर्मो के अनुसार स्वयं ही पश्चाताप करते हैं

12चूंकि अजराईल मृत्यु का फरिश्ता नीच कर्म करने वालों को ऐसे पीसता है, जैसे कोल्हू में तिल॥ २७॥

13श्लोक महला ५ ॥

14जो व्यक्ति सच्चे शाह के सेवक होते हैं, वही सत्य के दरबार में स्वीकार होते हैं।

15हे नानक ! जो भगवान के अलावा किसी दूसरे की सेवा करते हैं, ऐसे मूर्ख व्यक्ति बहुत दुखी होकर मरते हैं ॥ १ ॥

16महला ५ ॥

17परमात्मा ने आदि से जो लेख लिखा होता है, उसे मिटाया नहीं जा सकता।

18हे नानक ! राम नाम रूपी धन ही उत्तम पूंजी है, इसलिए हमेशा ही नाम का ध्यान करते रहना चाहिए॥ २ ॥

19पउड़ी ५ ॥

20जिस इन्सान को नारायण की ओर से ठोकर लगे, वह जीवन के सन्मार्ग पर स्थिर नहीं रह सकता।

21ऐसा व्यक्ति बेशुमार पाप करता है और हमेशा ही विकार रूपी विष चखता है।

22दूसरों की निंदा करता हुआ वह गल सड़कर मर जाता है। अपने शरीर में भी वह सड़ता रहता है।

23जिसे सच्चे प्रभु ने मार दिया है, उसे कौन बचा सकता है।

24हे नानक ! उस अलक्ष्य परमात्मा की शरण प्राप्त करो।। २८ ।।

25श्लोक महला ५॥

26कृतघ्न लोगों का निवास घोर नरक में ही होता है, जहाँ उन्हें बहुत कष्टदायक दुख भोगने पड़ते हैं।

27हे नानक ! प्रभु द्वारा मारे हुए ऐसे लोग बड़े दुखी होकर मरते हैं॥ १॥

28महला ५॥

29उस ईश्वर ने समस्त रोगों की औषधियाँ बनाई हैं परन्तु निंदकों का कोई उपचार नहीं।

30हे नानक ! जिन्हें ईश्वर स्वयं कुमार्गगामी करता है, ऐसे निन्दक इन्सान योनियों में गलते-सड़ते रहते हैं। २ ॥

31पउड़ी ५॥

32जिस व्यक्ति को पूर्ण सतिगुरु ने प्रसन्न होकर हरि नाम रूपी सच्चा एवं अक्षय धन दिया है,

33उसके सभी संशय मिट जाते हैं एवं मृत्यु का भय भी समाप्त हो जाता है।

34काम, क्रोध एवं बुराइयां संतों की संगति करने से मिट जाते हैं।

35सच्चे प्रभु के अतिरिक्त जो दूसरों की सेवा करते हैं, वे निराश्रित होकर मर जाते हैं।

36नानक को गुरु ने क्षमा कर दिया है और वह ईश्वर के नाम में प्रवृत्त हो गया है ॥२९॥

37श्लोक महला ४॥

38वह व्यक्ति तपस्वी नहीं हो सकता, जिसका मन लालची होता है और कोढ़ी की तरह नित्य धन के लिए भटकता रहता है।

39जब इसे पहले निमंत्रण देकर बुलाया गया तो इसने सत्य की भिक्षा लेने से इन्कार कर दिया लेकिन तदुपरांत पश्चाताप करके उसने अपने पुत्र को लाकर संगत में बिठा दिया।

40गांव के बड़े आदमी यह कह कर हँसने लग पडे कि लालच की लहर ने तपस्वी को नष्ट कर दिया है।

41तपस्वी जहाँ कम धन-पदार्थ देखता है, उस स्थान के वह निकट नहीं जाता। अधिक धन देखकर तपस्वी अपना धर्म भी हार जाता है।

42संतजनों ने बैठकर विचार किया है कि हे भाई ! यह तपस्वी नहीं है अपितु बगुला है।

43तपस्वी महापुरुषों की निन्दा करता है और दुनिया की स्तुति गाता है। इस दोष के कारण ईश्वर ने उसे धिक्कार दिया है।

44देखो ! महापुरुषों की निन्दा करने का इसे यह फल मिला है कि इसकी सारी मेहनत निष्फल हो गई है।

45वह बाहर मुखियों के पास बैठता है और तपस्वी कहलवाता है।

46जब वह भीतर बैठता है तो नीच कर्म करता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं