सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 314 · Raag Gauree

1पउड़ी॥

2हे विश्व के रचयिता प्रभु ! तुम सबकुछ जानते हो, जो कुछ जीवों के हृदय में होता है।

3समूचा जगत् ही इस चिन्तना में है; हे परमात्मा ! एक तुम इससे परे हो

4(क्योंकि) जो कुछ हो रहा है, सब तेरा किया हुआ हो रहा है, सारी (सृष्टि की) रचना ही तेरी बनाई हुई है।

5हे सच्चे मालिक ! तुम कण-कण में सर्वव्यापक हो, तेरे खेल अदभुत हैं।

6जो मनुष्य सतिगुरु से मिला है, उसे ही भगवान प्राप्त हुआ है और किसी ने उन्हें भगवान की ओर से नहीं हटाया॥ २४॥

7श्लोक महला ४॥

8यह चंचल मन स्थिर करके वश में रखना चाहिए और गुरु के माध्यम से अपना चित परमात्मा में लगाना चाहिए।

9उठते-बैठते अपनी हरेक श्वास एवं ग्रास से हम क्यों उस प्रभु को कभी विस्मृत करें ?

10अब जबकि यह आत्मा प्रभु-परमेश्वर के वश में कर दी है, इसलिए मेरी जन्म-मरण की चिन्ता मिट गई है।

11(हे प्रभु !) जैसे तुझे अच्छा लगे वैसे (मुझे) नानक को नाम की देन प्रदान कर चूंकि नाम ही मन की चिन्ता को मिटा सकता है। १॥

12महला ३ ॥

13अहंकार में मस्त हुआ मनमुख इन्सान सतिगुरु के महल (अर्थात् सत्संग) को नहीं पहचानता और हर वक्त दुविधा में रहता है।

14हमेशा ही बुलाए जाने के बावजूद वह सतिगुरु के महल (सत्संग) में उपस्थित नहीं होता। प्रभु के दरबार में वह किस तरह स्वीकृत होगा ?

15कोई विरला पुरुष ही सतिगुरु के महल (सत्संग) को जानता है और जो जानता है, वह सदा हाथ जोड़कर खड़ा रहता है।

16हे नानक ! यदि मेरा हरि अपनी कृपा करे तो वह मनुष्य को (मनमुखता से) मोड़ लेता है॥ २॥

17पउड़ी।

18जिस सेवा से सतिगुरु का मन प्रसन्न हो जाए, वहीं की हुई सेवा फलदायक है।

19(क्योंकि) जब सतिगुरु का मन प्रसन्न हो जाए, तभी पाप-विकार भी दूर हो जाते हैं।

20सतिगुरु जो उपदेश सिक्खों को देते हैं, वे ध्यानपूर्वक उसे सुनते हैं।

21जो सिक्ख सतिगुरु की इच्छा को मानते हैं, उन्हें चौगुनी रंगत चढ़ जाती है।

22गुरमुखों का यह अदभुत जीवन-आचरण है कि गुरु का उपदेश सुनकर उनका मन प्रसन्न हो जाता है॥ २५॥

23श्लोक महला ३॥

24जिस व्यक्ति ने अपने गुरु की निंदा की है, उसे कहीं भी स्थान नहीं मिलता।

25उसका लोक एवं परलोक दोनों व्यर्थ हो जाते हैं और प्रभु के दरबार में भी उसे स्थान नहीं मिलता।

26सतिगुरु के चरण-स्पर्श का यह सुनहरी अवसर फिर से प्राप्त नहीं होता। (क्योंकि)

27सतिगुरु की निंदा करने में एक बार यदि पथभ्रष्ट हो जाए तो बिल्कुल दुखों में ही जीवन व्यतीत होता है।

28महापुरुष सतिगुरु की किसी से शत्रुता नहीं है। जिस किसी को वह चाहता है, वह अपने साथ मिला लेता है।

29हे नानक ! सत्य के दरबार में गुरु उनकी मुक्ति करवा देता है, जिन्हें वह प्रभु के दर्शन करवाता है॥ १॥

30महला ३॥

31स्वेच्छाचारी पुरुष अज्ञानी, खोटी बुद्धि वाला एवं अहंकारी होता है,

32उसके मन में क्रोध ही होता है और वह जुए में बुद्धि गंवा देता है।

33वह छल-कपट तथा पाप के काम करता है (इसलिए)

34वह क्या सुन सकता है और दूसरों को क्या बता सकता है ?

35वह अन्धा और बहरा मनुष्य भटक गया है

36और जन्मता-मरता रहता है।

37सतिगुरु से साक्षात्कार हुए बिना वह परलोक में स्वीकार नहीं होता।

38हे नानक ! पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार जो उनकी किस्मत में लिखा होता है, वहीं उसे मिलता है॥ २॥

39पउड़ी।

40जिनके ह्रदय कठोर होते हैं, वे सतिगुरु के पास नहीं बैठते।

41वहाँ सत्य प्रवृत्त हो रहा है और झूठे लोग मानसिक तौर पर उदास रहते हैं।

42वे छल-कपट करके समय बिताते हैं और दुबारा जाकर झूठों के पास बैठ जाते हैं।

43सत्य में झूठ नहीं मिलता, हे मेरे मन ! तू निर्णय करके देख ले।

44झूठे जाकर झूठों से मिल जाते हैं तथा सत्यवादी सिक्ख सतिगुरु के पास बैठते हैं।॥ २६॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं