सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 313 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji

1जिन्हें श्वास लेते और भोजन खाते समय एक क्षण भर के लिए भी भगवान का नाम विस्मृत नहीं होता, वही सर्वगुणसम्पन्न एवं प्रधान हैं।

2भगवान की कृपा से सतिगुरु (उन्हें) मिलता है और उनका ध्यान रात-दिन भगवान में लगा रहता है।

3मैं भी उन गुरमुखों की संगति करुं ताकि भगवान के दरबार में सम्मान प्राप्त हो।

4वे सोते और जागते वक्त ईश्वर की गुणस्तुति करते हैं।

5हे नानक ! उनके चेहरे उज्ज्वल हैं जो प्रतिदिन सुबह जागकर ईश्वर को स्मरण करते हैं।॥ १॥

6महला ४॥

7अपने सतिगुरु की सेवा करने से मनुष्य अपार नाम प्राप्त करता है।

8दाता गुरदेव ईश्वर के नाम की देन प्रदान करता है और डूबते हुए मनुष्य को भयानक संसार-सागर में से निकाल लेता है।

9वह शाह धन्य-धन्य हैं जो ईश्वर के नाम का व्यापार करते हैं।

10सिक्ख व्यापारी आते हैं और सतिगुरु उन्हें शब्द द्वारा भवसागर से पार करवा देता है।

11हे नानक ! सृजनहार प्रभु की सेवा-भक्ति वही मनुष्य करते हैं, जिस पर वह स्वयं कृपा करता है। २॥

12पउड़ी।

13जो सत्य के पुंज परमात्मा की सत्य ही भक्ति करते हैं, वही (परमात्मा) के भक्त है।

14जो मनुष्य गुरु के समक्ष होकर खोजकर ढूंढते हैं, वे अपने हृदय में ही प्रभु को प्राप्त कर लेते हैं।

15जिन मनुष्यों ने सच्चे मालिक की सचमुच सेवा की है, उन्होंने दुःखदायक काल को मारकर नियंत्रित कर लिया है।

16सत्य का पुंज परमात्मा महान है, उसकी सेवा-भक्ति जो मनुष्य करते हैं, वे सत्य में ही लीन हो जाते हैं।

17वह सत्य का पुंज परमात्मा धन्य है, जो व्यक्ति सच्चे (परमात्मा) की भक्ति करते हैं, उन्हें उत्तम फल मिलता है॥ २२ ॥

18श्लोक महला ४॥

19स्वेच्छाचारी प्राणी मुर्ख है, चूंकि ऐसा नामविहीन इन्सान भटकता ही रहता है।

20गुरु के बिना उसका मन स्थिर नहीं होता और वह बार-बार गर्भ-योनि में पड़ता है।

21जब हरि-प्रभु स्वयं दया के घर में आता है तो इसे सतिगुरु आकर मिल जाता है।

22(इसलिए) हे नानक ! तुम भी नाम की महिमा-स्तुति करो चूंकेि तेरा जन्म-मरण का दुःख मिट जाए ॥ १ ॥

23महला ४॥

24मैं अपने गुरु की बड़े प्रेम से अनेक विधियों से प्रशंसा करता हूँ।

25मेरा मन गुरु के साथ मग्न है। गुरु जी ने मेरे मन को संवार दिया है।

26मेरी रसना प्रशंसा करके तृप्त नहीं होती और मन प्रियतम-प्रभु के साथ प्रेम करके तृप्त नहीं होता।

27हे नानक ! मन को नाम की भूख है और मन हरि-रस को पान करने से तृप्त होता है।॥ २॥

28पउड़ी॥

29सत्यस्वरूप प्रभु जिसने दिन और रात बनाए हैं, वह सत्य का पुंज (इस) कुदरत से ही सचमुच बड़ी महानता वाला मालूम होता है।

30मैं सदैव उस सत्यस्वरूप परमात्मा की प्रशंसा करता हूँ और सच्चे (परमात्मा) की महिमा सत्य है।

31प्रशंसनीय परमात्मा सत्य है और उसकी प्रशंसा भी सत्य है। सत्यस्वरूप परमात्मा का कोई भी मूल्यांकन नहीं जान सका।

32जब पूर्ण सतिगुरु मिलता है तो परमात्मा प्रत्यक्ष दिखाई देता है।

33जो गुरमुख सत्य का यश गाते हैं, उनकी तमाम भूख निवृत्त हो जाती है॥ २३॥

34श्लोक महला ४॥

35अपने मन एवं तन में ही भलीभाँति खोज-खोजकर मैंने उस प्रभु को ढूंढ लिया है, जिसे मैं चाहता था।

36मुझे गुरु वकील मिल गया है, जिसने मुझे प्रभु-परमेश्वर से मिला दिया है॥ १॥

37महला ३॥

38मायाधारी बड़ा अन्धा एवं बहरा है।

39ऐसा व्यक्ति गुरु के शब्द को ध्यानपूर्वक नहीं सुनता और बड़ा शोर-शराबा करता है।

40गुरमुख शब्द में सुरति लगाने से ही जाना जाता है।

41वे ईश्वर के नाम को सुनते और उसमें आस्था रखते हैं और ईश्वर के नाम में ही वे समा जाते हैं।

42(परन्तु मायाधारी अथवा गुरमुख के क्या वश ?) जो कुछ उस ईश्वर को भला लगता है, (उसके अनुसार) यह जीव कराने से काम करता है।

43हे नानक ! जीव रूपी बाजा वैसे बजता है, जैसे प्रभु उसे बजाता है॥ २॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं