सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 312 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji

1गुरु के सिक्खों ने अपने हृदय में विचार कर लिया है कि उसे लोक-परलोक में सहारा नहीं मिलता है।

2जो मनुष्य सतिगुरु से जाकर मिलते हैं और अपने हृदय में नाम का चिंतन करते हैं, वे भवसागर से पार हो जाते हैं।

3नानक के गुरसिक्ख पुत्रो ! ईश्वर का नाम जपो (क्योंकि) ईश्वर भवसागर से पार करवा देता है॥ २ ॥

4महला ३॥

5अहंकार ने सारी दुनिया को भटकाया हुआ है, इसलिए दुनिया दुर्मति के कारण विषय-विकारों में फॅसती है।

6जिस मनुष्य को गुरु मिलता है, उस पर भगवान की कृपा-दृष्टि होती है, अन्यथा स्वेच्छाचारी मनुष्य के लिए अज्ञान रूपी अँधेरा ही बना रहता है।

7हे नानक ! प्रभु जिस मनुष्य का प्रेम ‘शब्द' में लगाता है, उसे वह स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है॥ ३॥

8पउड़ी॥

9सत्यस्वरूप प्रभु की गुणस्तुति सदैव स्थिर रहने वाली है, (यह गुणस्तुति) वही मनुष्य कर सकता है, जिसका हृदय भी प्रशंसा में भीगा हुआ हो।

10जो मनुष्य एकाग्रचित होकर एक ईश्वर का स्मरण करते हैं, उनका शरीर कभी क्षीण नहीं होता।

11वह पुरुष धन्य -धन्य एवं उपमायोग्य हैं, जिनकी रसना सत्यनाम के अमृत को चखती है।

12जिनके ह्रदय में सत्यस्वरूप परमात्मा सचमुच प्रिय लगता है, वे सत्य के दरबार में सम्मानित होते हैं।

13सत्यवादियों का जन्म धन्य है जिनके चेहरे को सत्य उज्ज्वल कर देता है॥ २० ॥

14श्लोक महला ४॥

15यदि शाक्त इन्सान गुरु के समक्ष जाकर झुक भी जाए तो भी वह मन में खोट होने के कारण झुठ का व्यापारी बना रहता है।

16जब गुरु जी कहते है - 'हे मेरे भाइओ, सावधान हो जाओ। फिर यह शाक्त भी बगुलों के समान मिलकर बैठ जाते हैं।

17गुरसिक्खों के मन में सतिगुरु बसता है, इसलिए सिक्खों में मिलकर बैठे हुए भी शाक्त जांच-पड़ताल के समय चुनकर निकाल दिए जाते हैं।

18वे आगे-पीछे होकर मुँह तो बहुत छिपाते हैं, लेकिन झूठ के व्यापारी सत्संगत में मिल नहीं सकते।

19शाक्त लोगों का भोजन वहाँ (गुरमुखों के साथ में) नहीं होता, (इसलिए) भेड़ों के समान (किसी अन्य स्थान पर) जाकर झूठ को प्राप्त करते हैं।

20यदि शाक्त मनुष्य को (नाम-रूपी) भला पदार्थ खिलाने की इच्छा भी करें तो भी वह मुंह से (निन्दा रूपी) विष ही उगलकर निकालता है।

21(हे संतजनों !) शाक्त के साथ संगति मत करो, क्योंकि जगत् के रचयिता ने स्वयं उन्हें मृत कर दिया है,

22जिस ईश्वर का यह खेल है, वह स्वयं इस खेल को रचकर देख रहा है। हे नानक ! तुम ईश्वर का नाम-सिमरन करते रहो ॥ १ ॥

23महला ४॥

24महापुरुष सतिगुरु अगम्य है, जिसने अपने हृदय में भगवान को धारण किया हुआ है।

25सतिगुरु की समानता कोई नहीं कर सकता, क्योंकि परमात्मा उसके पक्ष में है।

26भगवान की भक्ति ही सतिगुरु का खड्ग और बख्तर है, जिससे उसने काल (रूपी) कंटक को मारकर दूर फॅक दिया है।

27ईश्वर स्वयं सतिगुरु का रखवाला है। जो सतिगुरु के पद्चिन्हों पर चलते हैं, प्रभु उन सबको आप ही बचा लेता है।

28जो मनुष्य पूर्ण सतिगुरु का बुरा सोचता है, उसे पैदा करने वाला प्रभु स्वयं ही नष्ट कर देता है।

29यह न्याय भगवान के दरबार में होता है। हे नानक ! अगम्य हरि का सिमरन करने से यह सूझ पैदा होती है॥ २॥

30पउड़ी ॥

31जो व्यक्ति सोते समय भी सत्य की आराधना करते हैं और उठते समय भी सत्य-नाम का जाप करते हैं।

32ऐसे व्यक्ति कलियुग में विरले ही मिलते हैं, जो गुरमुख सत्य नाम में मग्न रहते हैं।

33मैं उन पर तन-मन से न्योछावर हूँ जो रात-दिन सत्यनाम उच्चरित करते रहते हैं।

34जिन लोगों के मन एवं तन में सत्य भला लगता है, वह सत्य के दरबार में पहुँच जाते हैं।

35दास नानक भी सत्य नाम बोलता रहता है। वह सत्य प्रभु सदैव ही नवीन है॥ २१ ॥

36श्लोक महला ४ ॥

37क्या सोना और क्या जागना ? गुरमुखों के लिए तो सब कुछ स्वीकार्य है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं