गुरु ग्रंथ साहिब 30 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji
1तुम गुरुमुख होकर परमेश्वर हरि-प्रभु को स्मरण करो॥ १॥ रहाउ॥
2जो गुरुमुख जीव गुरु उपदेश ग्रहण करके उस पर विचार करता है, वह लोक-परलोक में प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है।
3वह अपने हृदय में मुरारि के नाम को जपने से मृत्युलोक व परलोक में सुखों को प्राप्त करता है।
4गुरु के उपदेश का चिन्तन करने से वह गृह रूपी अंतःकरण में परमात्मा के स्वरूप को पा लेता है॥ २॥
5जो जीव सतिगुरु से परामुख होते हैं उनके मुख कलंकित होते हैं।
6वे प्रतिदिन कष्ट भोगते हैं और नित्य यमों के जाल में फँसते हैं।
7उनको स्वप्न में भी सुख प्राप्त नहीं होता तथा कई तरह की चिंताग्नि उन्हें पूर्णतया जला देती है॥ ३॥
8समस्त प्राणियों को देने वाला ईश्वर एक ही है और वह स्वयं ही अनुग्रह करता है।
9उसके अनुग्रह के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जिसे चाहे वह देता है।
10नानक देव जी कथन करते हैं कि गुरु की शरण में जाकर जो प्रभु को पाने का उद्यम करता है, वही उसके आनंद को जान सकता है॥ ४॥ ६॥ ४२॥
11श्रीरागु महला ३ ॥
12सत्य परमात्मा की सेवा-उपासना की जाए तो वह सत्य स्वरूप रूपी सम्मान प्रदान करता है।
13गुरु की कृपा द्वारा वह हृदय में वास करता है और अहंकार को दूर करता है।
14यह मन भटकने से तभी बच सकता है, जब वह परमेश्वर स्वयं कृपा-दृष्टि करता है॥ १॥
15हे भाई ! गुरु के उपदेश द्वारा हरि-प्रभु के नाम का सिमरन करो।
16यदि नाम-भण्डार सदा के लिए मन में स्थिर हो जाए तो जीव उस प्रभु के स्वरूप में स्थान प्राप्त कर लेता है ॥१॥ रहाउ ॥
17स्वेच्छाचारी जीव का हृदय व शरीर अविद्या के कारण अन्धा हो रहा है, इसलिए उसे ठहरने के लिए कोई आश्रय नहीं होता।
18वह अनेकानेक योनियों में भटकता फिरता है, जैसे सूने घर में कौवा रहता हो।
19गुरु की शिक्षा द्वारा हृदय में ज्ञान का प्रकाश होता है और वाणी द्वारा परमेश्वर का नाम प्राप्त होता है।॥ २॥
20संसार में त्रिगुणी (सत्त्व, रज, तम) विषय-विकारों का अंधेरा छाया हुआ है और माया के मोह की धूलि चढ़ी हुई है।
21लोभी जीव वेद आदि धर्म ग्रंथों को पढ़-पढ़ कर परमेश्वर को पुकारते तो हैं, लेकिन द्वैत-भाव के कारण वह एकेश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य को स्मरण करते हैं।
22विषय-विकारों की अग्नि में जल कर वे मर गए तथा वह न इस संसार के सुख भोग सके और न ही परलोक में स्थान पा सके॥ ३॥
23उन्होंने माया-मोह में लिप्त होकर उस प्रतिपालक परमात्मा को विस्मृत कर दिया है।
24सम्पूर्ण सृष्टि गुरु के बिना चेतना रहित है और वह यमों के जाल में फँसी हुई है।
25नानक देव जी कथन करते हैं कि गुरु के उपदेशानुसार सत्य-नाम का सिमरन करके ही जीव यमों के बंधन से बच सकते हैं। ४॥ १० ॥ ४३ ॥
26श्रीरागु महला ३ ॥
27गुरुमुख जीवों ने त्रिगुणी माया का मोह त्याग कर तुरीयावस्था (चौथा पद) को प्राप्त किया है।
28परमात्मा ने कृपा करके जिस जीव को अपने साथ मिलाया है, उसके ह्रदय में ही उस हरि-प्रभु का नाम बसा है।
29जिनके भाग्य रूपी खज़ाने में पुण्य जमा है, प्रभु उनको सत्संगति में मेिलाता है॥ १॥
30हे माई ! गुरु की शिक्षा द्वारा सत्य में निवास करो।
31केवल सत्य की साधना करो, जिससे उस सत्य स्वरूप से मिलन संभव हो सके ॥ १॥ रहाउ ॥
32जिन्होंने पारब्रह्म परमेश्वर के नाम को पहचाना है, उन पर मैं बलिहारी जाता हूँ।
33अहंत्व का त्याग करके उनके चरणों में पड़ जाऊँ और उनकी इच्छानुसार चलू।
34क्योंकि उनकी संगति में रह कर नाम-सिमरन का लाभ मिलता है, तथा सहज ही नाम की प्राप्ति हो जाती है॥ २॥
35किन्तु गुरु के बिना नाम की प्राप्ति नहीं हो सकती और नाम के बिना सत्य स्वरूप को नहीं पाया जा सकता।
36फिर कोई ऐसा सत्य गुरु ढूंढ लो, जिसके द्वारा वह सत्य परमात्मा प्राप्त किया जाए।
37जो जीव गुरु के मार्गदर्शन में सत्य परमात्मा को पा लेता है उसके काम, क्रोध, लोभ रूपी दैत्यों का संहार हो जाता है और वह आत्मिक आनंद का सुख-भोग करता है जो उस परमात्मा को अच्छा लगता है, वही होता है॥ ३॥
38जैसी सतिगुरु में श्रद्धा होगी, वैसा सुख-फल जीव को प्राप्त होगा।
39इस तथ्य में बिल्कुल भी संदेह नहीं है, निस्संकोच कोई भी जीव सतिगुरु से प्रेम करके देख ले।
40नानक देव जी कथन करते हैं कि अकाल पुरुष एवं गुरु बेशक दो रूप दिखाई देते हैं, परंतु इन दोनों में ज्योति एक ही है, गुरु के उपदेश द्वारा ही अकाल-पुरुष से मिलन संभव है॥ ४॥ ११॥ ४४॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं