गुरु ग्रंथ साहिब 307 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1गुरु की महिमा महान है, चूंकेि वह अपने अन्तर्मन में भगवान का ध्यान करता रहता है।
2परमात्मा ने खुश होकर यह महिमा प्रदान की है, इसलिए किसी के घटाने पर तिल मात्र भी कम नहीं होती।
3जब सच्चा मालिक सतिगुरु के पक्ष में है तो सारी दुनिया के जितने भी लोग गुरु के विरुद्ध होते हैं, वे खप-खप कर मर जाते हैं।
4सतिगुरु की महिमा कर्तार ने स्वयं बढ़ाई है और दोषियों के मुँह काले किए हैं।
5ज्यों-ज्यों निंदक मनुष्य सतिगुरु की निंदा करते, त्यों-त्यों सतिगुरु की महिमा बढ़ती रहती है।
6हे नानक ! सतिगुरु ने जिस ईश्वर का स्मरण किया है, उसने सारा संसार लाकर गुरु के चरणों में रख दिया है॥ १॥
7महला ४ ॥
8जो मनुष्य सतिगुरु के साथ वैर-विरोध करता है, उसका लोक-परलोक समूचे ही व्यर्थ जाते हैं।
9उसका वश नहीं चलता इसलिए वह सदा क्षुब्ध होता है और दांत पीसता है।
10धन एवं पदार्थ हेतु वह निरन्तर ही प्रयास करता है परन्तु उसका पहला पदार्थ भी समाप्त हो जाता है।
11वह क्या कमाएगा और क्या खाएगा, जिसके हृदय में दुःख चिन्ता की पीड़ा है!
12जो निर्वेर से शत्रुता करता है, वह संसार के तमाम पाप अपने सिर पर ले लेता है।
13जिसका मुँह उसके हृदय की निन्दा करता हो पर मुँह में मिठास हो, उसे लोक-परलोक में कोई सहारा नहीं देता।
14ऐसा खोटा मनुष्य यदि सोने को हाथ डाले तो वह भी राख हो जाता है।
15फिर भी यदि वह गुरु की शरण ले तो उसके पहले पाप क्षमा हो जाते हैं।
16हे नानक ! जो मनुष्य (गुरु की शरण लेकर) प्रतिदिन नाम-स्मरण करता है, ईश्वर का सिमरन करते हुए उसके अपराध मिट जाते हैं।॥ २॥
17पउड़ी॥
18हे सत्यस्वरूप परमेश्वर ! तू सदैव सत्य है। तेरी कचहरी सर्वोपरि है।
19हे सत्य के पुंज ! जो तेरा ध्यान करते हैं, तेरी सेवा भक्ति करते हैं, उन्हें तेरा ही मान है।
20उनके हृदय में सत्य है इसलिए उनके चेहरे उज्ज्वल रहते हैं, वे सत्य बोलते हैं और हे सत्य प्रभु! तेरा ही उन्हें आश्रय है।
21जो व्यक्ति गुरु के माध्यम से भगवान की सराहना करते हैं, वही सच्चे भक्त हैं और उनके पास सच्चा शब्द रूपी चिन्ह है।
22मैं उन पर न्यौछावर हूँ, बलिहारी हैं, जो सत्यस्वरूप ईश्वर की सेवा-भक्ति करते रहते हैं।॥ १३॥
23श्लोक महला ४॥
24जो आदि से ही पूर्ण सतिगुरु द्वारा शापित हुए हैं, वे अब पुन: सतिगुरु की ओर से तिरस्कृत हो गए हैं,
25यदि उन्हें गुरु के साथ मिलाप की तीव्र लालसा भी हो तो भी परमात्मा ऐसे शापितों को मिलने नहीं देता।
26उन्हें सत्संगति में भी आश्रय नहीं मिलता। गुरु ने भी संगति में यही विचार किया है।
27यदि कोई भी अब जाकर उनको मिलता है, उसे मृत्यु का निर्दयी यमदूत प्रताड़ित करता है।
28जिन लोगों को गुरु नानक देव जी ने भी धिक्कार दिया, उन तिरस्कृत व्यक्तियों को गुरु अंगद देव ने भी झूठा घोषित किया।
29उस समय तीसरी पीढ़ी वाले श्री गुरु अमरदास जी ने विचार किया कि इन निर्धन लोगों के वश में क्या है?
30जिन सतिगुरु ने चौथे स्थान पर गुरु नियुक्त किया था, उन्होंने तमाम निंदक एवं दुष्टों का कल्याण कर दिया।
31कोई पुत्र अथवा सिक्ख जो कोई भी सतिगुरु की सेवा करता है, उसके सारे काम गुरु जी संवार देते हैं।
32पुत्र, धन, लक्ष्मी जिस भी वस्तु की वह इच्छा करे, वही फल उसे मिलता है।सतिगुरु उसे ले जाकर ईश्वर से मिलाता है और ईश्वर उसे पार कर देता है।
33जिस सतिगुरु के हृदय में भगवान का निवास है, उसमें सारे खजाने विद्यमान हैं।
34केवल वही मनुष्य सतिगुरु को पाता है जिसके माथे पर पूर्वकृत शुभ कर्मों के संस्कार रूप लेख लिखे हुए हैं।
35नानक उनकी चरण-धूलि मांगता है, जो गुरसिक्ख मित्र प्यारे हैं।॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं