गुरु ग्रंथ साहिब 306 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1जिस पर मेरा स्वामी दयालु होता है, उस गुरसिक्ख को गुरु उपदेश देता है।
2नानक भी उस गुरसिक्ख की चरण-धूलि माँगता है, जो स्वयं नाम जपता है और दूसरों को जपाता है॥ २॥
3पउड़ी ॥
4हे सत्यस्वरूप प्रभु ! वे बहुत थोड़े व्यक्ति हैं, जो तेरा ध्यान-मनन करते हैं।
5जो मनुष्य पूर्ण एकाग्रचित होकर एक ईश्वर की आराधना करते हैं, उनकी बरकत अनन्त जीव खाते हैं।
6हे प्रभु! वैसे तो सारी सृष्टि तेरा चिन्तन करती है परन्तु स्वीकृत वही होते हैं, जिन्हें तुम पसन्द करते हो।
7सतिगुरु की सेवा से विहीन रहकर जो मनुष्य खाने-पीने एवं पहनने के रसों में मग्न रहते हैं, वे कोढ़ी बार-बार जन्म लेते हैं।
8ऐसे मनुष्य सामने तो मीठी बातें करते हैं परन्तु तत्पश्चात विष घोलकर निकालते हैं।
9ऐसे मन से खोटे पुरुषों को ईश्वर ने जुदा कर दिया है॥ ११॥
10श्लोक महला ४॥
11उस विमुख ने दूसरे विमुख को जूओं से भरा हुआ नीला एवं काला पहरावा डाल दिया है।
12इस जगत् में उसे कोई निकट नहीं बैठने देता, गन्दगी में पड़कर अपितु बहुत-सी मैल लगाकर मनमुख (वापिस) आया।
13जो मनुष्य पराई निन्दा एवं चुगली करने के लिए परामर्श करके भेजा गया था, वहाँ भी दोनों का मुँह काला किया गया।
14हे भाई ! जगत् में सब ओर एक-दम सुना गया कि विमुख को नौकर सहित जूतियाँ (खानी) पड़ीं और खूव हल्का होकर घर को उठ आया है।
15आगे संबंधियों में विमुख को बैठना मिले भी तो फिर पत्नी तथा भतीजों ने लाकर घर में स्थान दिया,
16उसके लोक-परलोक दोनों व्यर्थ गए और अब भूखा तथा प्यासा रोता है।
17जगत् का स्वामी कर्ता पुरुष धन्य धन्य है, जिसने न्याय के आसन पर विराज कर स्वयं सच्चा न्याय करवाया है।
18जो मनुष्य पूर्ण सतिगुरु की निन्दा करता है, उसको सच्चा स्वामी दण्ड देकर मार फेंकता है।
19यह न्याय का वचन उस ईश्वर ने स्वयं कहा है, जिसने इस सृष्टि की रचना की है॥ १॥
20महला ४ ॥
21जिसका स्वामी कंगाल है, उसका नोकर कहाँ पेट भर कर खा सकता है।
22यदि स्वामी के घर में कोई वस्तु हो तो उसे उसका नौकर प्राप्त कर सकता है परन्तु यदि है ही नहीं तो उसे वह कहाँ से ले सकता है।
23जिसकी सेवा करने पर भी लेखा मॉगा जाना हो, वह सेवा कठिन और अनुपयोगी है।
24हे नानक ! जिस ईश्वर एवं गुरु का दर्शन (मानव जन्म को) सफल (करता) है, उसकी सेवा करो तांकि फिर कोई लेखा न मॉगे ॥ २ ॥
25पउड़ी ॥
26हे नानक ! संतजन विचार करते हैं और चारों वेद कहते हैं कि
27भक्तजन जो वचन मुँह से बोलते हैं, वे सत्य ही पूरे हो जाते हैं।
28भक्त समूचे जगत् में लोकप्रिय हो जाते हैं, उनकी शोभा सभी लोग सुनते हैं।
29जो मूख लोग संतों से वैर-विरोध करते हैं, वे सुख नहीं पाते।
30वे दोषी जलते तो अहंकार में हैं परन्तु संतजनों के गुणों को तरसते हैं।
31इन दोषी मनुष्यों के वश में भी क्या है? चूंकि आदि काल से कुसंस्कार ही उनका भाग्य है।
32जिनका उस पारब्रह्म ने नाश किया है, वह किसी के भी मित्र नहीं।
33यह धर्म का न्याय है कि जो निर्वेर से वैर करते हैं, वह नष्ट हो जाते हैं।
34जिन्हें संतों ने तिरस्कृत किया है, वे भटकते रहते हैं।
35जब वृक्ष जड़ सहित उखाड़ दिया जाता है, उसकी टहनियाँ भी सूख जाती हैं।॥ १२॥
36सलोक मः ४ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं