गुरु ग्रंथ साहिब 305 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1सत्यवादी सिक्ख सतिगुरु के पास बैठते हैं और उनकी सेवा करते हैं। झूठों को खोज-तलाश करते हुए कहीं भी स्थान नहीं मिलता।
2जिन्हें सतिगुरु के वचन अच्छे नहीं लगते, उनके चेहरे तिरस्कृत हैं और ईश्वर से अपमानित हुए वे भटकते फिरते हैं।
3जिनके ह्रदय में ईश्वर का प्रेम नहीं, उन स्वेच्छाचारी बेताल लोगों को कितनी देर तक दिलासा दिया जा सकता है?
4जो मनुष्य सतिगुरु को मिलता है, वह अपने मन को (विकारों से) अंकुश लगाकर रखता है। साथ ही, प्रभु के नाम की अपनी पूंजी का वह स्वयं ही इस्तेमाल करता है।
5हे नानक! (जीव के वश में कुछ नहीं) गुरु से मिलाकर कुछ लोगों को प्रभु सुख प्रदान करता है एवं कुछ कपट करने वालों को अलग कर देता है॥ १॥
6महला ४॥
7जिनके अन्तर्मन में भगवान का नाम रूपी भण्डार है, उनके कार्य ईश्वर स्वयं संवार देता है।
8उन्हें दूसरे लोगों के सहारे की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि ईश्वर उनको अपना कर सदैव उनके साथ-साथ रहता है।
9सब लोग उनका दर्शन करके उनकी प्रशंसा करते हैं क्योंकि जब सृजनहार परमात्मा स्वयं उनका पक्ष करता है तो प्रत्येक ही उनका पक्ष करेगा।
10भगवान के बनाए हुए राजे-महाराजे भी प्रभु के सेवक के समक्ष वन्दना करते हैं।
11पूर्ण गुरु की महिमा महान है। महान ईश्वर की सेवा करने से अतुलनीय सुख प्राप्त होता है।
12पूर्ण गुरु के द्वारा ईश्वर ने दान दिया है, वह समाप्त नहीं होता, क्योंकि ईश्वर सदैव ही दया किए जाता है और वह दान दिनों-दिन बढ़ता रहता है।
13जो कोई निंदक (ऐसे प्रभु के सेवक की) महानता देखकर सहन नहीं कर सकता, उसे सृजनहार ने स्वयं ईष्याग्नि में पीड़ित किया है।
14दास नानक विश्व के रचयिता परमात्मा की गुणस्तुति करता है, जो अपने भक्तो की सदैव रक्षा करता आया है ॥ २ ॥
15पउड़ी॥
16हे मेरे मालिक ! तू अगम्य एवं दया का घर है, बड़ा दाता एवं चतुर है,
17मुझे तेरे समान बड़ा दूसरा कोई दिखाई नहीं देता, तुम ही बुद्धिमान हो, जो मेरे मन को प्रिय लगे हो।
18जो मोह रूपी कुटुम्ब दिखाई देता है, सब क्षणभंगुर है और जन्म-मरण के अधीन है।
19जो मनुष्य सत्यस्वरूप परमात्मा के अलावा किसी दूसरे से मन लगाते हैं, वह झूठ के व्यापारी हैं और उनका इस पर अभिमान भी झूठा है।
20हे नानक ! सत्यस्वरूप परमात्मा का ध्यान कर, चूंकि सत्य (ईश्वर) से विहीन हुए मूर्ख जीव दुखी होकर मरते रहते हैं ॥१०॥
21श्लोक महला ४॥
22स्वेच्छाचारी पुरुष पहले तो सतिगुरु को सम्मान नहीं देता, तत्पश्चात् उसकी शिक्षा का कोई फायदा नहीं होता,
23वह भाग्यहीन दुविधा में ही भटकता रहता है, यदि गुरु के प्रति श्रद्धा न हो तो सिर्फ बातों से कैसे सुख मिल सकता है ?
24जिसके अन्तर्मन में सतिगुरु का प्रेम नहीं, वह दिखावे के लिए (गुरु-द्वार पर) आता जाता है।
25यदि जगत् का रचयिता प्रभु-परमेश्वर दया करे तो दिखाई दे जाता है कि सतिगुरु भगवान का रूप है।
26वह तब गुरु का शब्द रूपी अमृत पान करता है और उसकी तमाम ईष्या, चिन्ता एवं दुविधा मिट जाते हैं।
27हे नानक ! वह दिन-रात सदैव ही प्रसन्न रहता है और सदा ही परमेश्वर की गुणस्तुति करता रहता है।॥ १॥
28महला ४॥
29जो मनुष्य सतिगुरु का (सच्चा) सिक्ख कहलाता है, वह प्रभातकाल उठकर ईश्वर के नाम का सिमरन करता है।
30वह प्रतिदिन सुबह उद्यम करता है, स्नान करता है और फिर नाम-रूपी अमृत के सरोवर में डुबकी लगाता है।
31गुरु के उपदेश द्वारा वह प्रभु-परमेश्वर के नाम का जाप जपता है और इस प्रकार उसके तमाम पाप दोष निवृत हो जाते हैं।
32फिर दिन निकलने पर गुरु की वाणी का कीर्त्तन करता है और उठते-बैठते प्रभु का नाम सिमरन करता रहता है।
33जो गुरु का सिक्ख अपनी हर सांस एवं ग्रास से मेरे हरि-परमेश्वर की आराधना करता है, वह गुरु के मन को अच्छा लगने लग जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं