सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 304 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji

1हे संतजनों ! जो अपने गुरु की निंदा करता है, वह भला पुरुष नहीं। वह अपना मूल लाभ समस्त गंवा देता है।

2नानक कहकर सुनाता है कि पहले लोग शास्त्रों एवं वेदों को पढ़ते एवं प्रचार करते थे परन्तु पूर्ण गुरु की वाणी उन सबमें सर्वोच्च प्रामाणिक है।

3गुरु के सिक्खों को गुरु की प्रशंसा अच्छी लगती है। लेकिन स्वेच्छाचारी को यह अवसर प्राप्त नहीं होता ॥ २ ॥

4पउड़ी ॥

5सत्यस्वरूप परमात्मा सर्वोपरि है। यह (प्रभु) उस मनुष्य को मिलता है, जिसे सतिगुरु तिलक (आशीर्वाद) दें।

6सतिगुरु भी वही है जो सत्य का ध्यान-मनन करता है। यह सत्य है कि सत्यस्वरूप परमात्मा एवं सतिगुरु एक ही हैं।

7वही महापुरुष सतिगुरु है, जिसने (कामादिक) विकारों को अपने वश में किया हुआ है।

8जो मनुष्य सतिगुरु की सेवा से विहीन रहते हैं और अपने आपको बड़ा कहलवाते हैं, उनके भीतर झूठ विद्यमान है।

9उनके रुक्ष चेहरे पर धिक्कार है। वह सतिगुरु से बिछुड़ा होता है, उसका मुख तिरस्कृत किया हुआ होता है और उसकी वार्तालाप किसी को भी अच्छी नहीं लगती ॥ ८ ॥

10श्लोक महला ४॥

11सारी दुनिया भगवान का खेत है। भगवान स्वयं ही (जीवों से) कृषि करवाता है।

12गुरमुख प्रभु की कृपा की फसल पैदा करता है। लेकिन स्वेच्छाचारी अपना मूल भी गंवा देता है।

13हरेक व्यक्ति अपने लाभ हेतु बोता है। लेकिन भगवान उस फसल को उगाता है, जो उसे अच्छी लगती है।

14गुरु का सिक्ख भगवान के नाम रूपी अमृत को बोता है और वह भगवान के अमृतमयी नाम को अपने अमृत फल के तौर पर प्राप्त करता है।

15मृत्यु रूपी चूहा प्रतिदिन फसल को कुतरता है परन्तु विश्व के रचयिता ईश्वर ने इसे पीट कर बाहर निकाल दिया है।

16इसलिए गुरमुखों की फसल प्रेम-पूर्वक उगती है और ईश्वर की दया से अनाज के दानों का अम्बार लग जाता है।

17जिन्होंने महापुरुष सतिगुरु का ध्यान किया है, ईश्वर ने उनकी तमाम चिंता एवं दुःख नष्ट कर दिए हैं।

18हे नानक ! जो मनुष्य हरि-नाम की आराधना करता है, वह स्वयं पार हो जाता है और सारे जगत् का भी कल्याण कर देता है॥ १॥

19महला ४॥

20स्वेच्छाचारी मनुष्य सारा दिन लोभ में प्रवृत्त हुआ रहता है, चाहे बातें वह दूसरी ही करता है।

21वह रात को नींद में घुट जाता है, उसकी तमाम इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं।

22ऐसे स्वेच्छाचारी मनुष्यों पर स्त्रियों का हुक्म चलता है और वह उन्हें सदैव ही अच्छे-अच्छे पदार्थ लाकर देते हैं।

23जो पुरुष स्त्रियों का कहना मानते हैं, वे अपवित्र, बुद्धिहीन एवं मूर्ख होते हैं।

24अशुद्ध पुरुष कामवासना में लीन रहते हैं, वह स्त्रियों से परामर्श लेते हैं और उसके आदेशानुसार चलते हैं।

25जो सतिगुरु के हुक्म अनुसार चलता है, वह पुरुष सच्चा तथा सर्वोत्कृष्ट है।

26समस्त स्त्रियाँ एवं पुरुष ईश्वर ने स्वयं उत्पन्न किए हैं। ईश्वर ही तमाम खेलें खेलता है।

27नानक का कथन है कि हे प्रभु ! सृष्टि की यह तमाम रचना तेरी रची हुई है, जो कुछ तूने किंया है, सब भला है॥ २॥

28पउड़ी ॥

29हे मेरे मालिक ! तू बेपरवाह, अथाह एवं अतुलनीय है, फिर तुझे कैसे तोला जा सकता है?

30हे गोविन्द ! जो तुझे याद करते हैं और जिन्हें सतिगुरु मिलता है, वे बड़े भाग्यशाली हैं।

31सतिगुरु की वाणी सत्य स्वरूप है। गुरुवाणी द्वारा मनुष्य पूर्ण जाना जाता है।

32कई दूसरे झूठ के व्यापारी सतिगुरु की नकल करके अधकचरी वाणी उच्चरित करते हैं परन्तु हृदय में झूठ होने के कारण शीघ्र ही नाश हो जाते हैं।

33उनके हृदय में कुछ और होता है तथा मुँह में कुछ और, वे विष रूपी माया का संग्रह करने के लिए पीड़ित होते हैं और खप-खप कर मरते हैं॥ ६ ॥

34श्लोक महला ४॥

35सतिगुरु की सेवा बड़ी निर्मल है, जो व्यक्ति निर्मल होता है, वही यह चुनौतीपूर्ण कार्य कर सकता है।

36जिनके अन्तर्मन में कपट, विकार एवं झूठ होता है, सत्यस्वरूप ईश्वर ने स्वयं ही उन कोढ़ियों को अलग कर दिया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं