सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 303 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji

1(क्योंकि) जब सर्राफ सतिगुरु जी दूरदृष्टि से देखता है तो सभी स्वार्थी प्रकट हो जाते हैं।

2जैसी उनके हृदय की भावना होती है, वैसा ही उन्हें फल मिलता है। प्रभु-परमेश्वर के द्वारा वे उसी तरह पुरस्कृत अथवा तिरस्कृत होते हैं।

3(किन्तु) हे नानक ! (प्राणी के क्या वश ?) ये तमाम कौतुक ईश्वर आप हमेशा करके देख रहा है और दोनों तरफ (गुरमुखों एवं स्वार्थियों में) स्वयं ही ईश्वर विद्यमान है॥ १॥

4महला ४॥

5हरेक मनुष्य में एक ईश्वर व्यापक हो रहा है। जिस किसी से वह जुड़ता है, उसमें वह सफल हो जाता है।

6प्राणी चाहे अधिकतर बातें करें परन्तु वह वही चीज़ खाता है, जो उसके घर में विद्यमान हो।

7सतिगुरु के अतिरिक्त ज्ञान प्राप्त नहीं होता। न ही अहंकार भीतर से जाता है।

8अहंकारी जीवों को दुख एवं भूख सताते हैं। वह अपना हाथ फैला-फैलाकर द्वार-द्वार माँगते फिरते हैं।

9झुठ एवं छल छिपे नहीं रहते। उनका पाज का मुलम्मा उतर जाता है।

10पूर्व कर्मों के अनुसार जिनके भले संस्कार लिखे हुए हैं, उन्हें पूर्ण सतिगुरु मिल जाते हैं।

11जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही गुरु की संगति से मिलकर मनुष्य अनमोल बन जाता है।

12हे नानक के प्रभु! (जीवों के वश में कुछ नहीं) तू सबका मालिक है। जैसे तुझे भला लगता है, वैसे ही तू जीवों को चलाता है॥ २॥

13पउड़ी।

14जिन प्राणियों ने हृदय में ईश्वर का सिमरन किया है, उन्हें ईश्वर अपने साथ मिला लेता है।

15मैं उनके साथ गुणों की सांझ करता हूँ और शब्द द्वारा अवगुणों को जलाता हूँ।

16घास-फूस की भाँति पाप सस्ते खरीदे जाते हैं। केवल वही गुण प्राप्त करता है, जिसे वह सत्यस्वरूप परमात्मा प्रदान करता है।

17मैं अपने सतिगुरु पर बलिहारी जाता हूँ, जिन्होंने पाप मिटा कर मुझ में गुणों का प्रकाश कर दिया है।

18जो प्राणी सतिगुरु के समक्ष होता है, वही महान प्रभु की महिमा-स्तुति करने लग जाता है। ॥ ७ ॥

19श्लोक महला ४॥

20सतिगुरु में यही महान गुण है कि वह हर समय भगवान के नाम का ही ध्यान करता रहता है।

21भगवान के नाम का जाप ही सतिगुरु की पवित्रता एवं संयम है। वह भगवान के नाम से ही तृप्त रहते हैं।

22भगवान का नाम उनका बल है और भगवान का नाम ही उनकी सभा है। भगवान का नाम ही उनका रक्षक है।

23जो व्यक्ति श्रद्धा से गुरु-मूर्ति की पूजा करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है।

24जो मनुष्य पूर्ण सतिगुरु की निंदा करता है, उसका कर्तार विनाश कर देता है।

25वह अवसर उसे दोबारा नहीं मिलता। जो कुछ उसने बोया है, यह स्वयं ही सेवन करता है।

26जैसे चोर को गले में रस्सी डालकर ले जाया जाता है, वैसे ही मुँह काला करके उसे भयानक नरककुण्ड में डाला जाता है।

27जब वह दोबारा सतिगुरु की शरण लेता है और भगवान का नाम-सिमरन करता है तो वह (भयानक नरक से) पार हो जाता है।

28नानक भगवान की महिमा की बातें कह कर सुनाता है। चूंकि विश्व के रचयिता भगवान को ऐसे ही भला लगता है॥ १॥

29महला ४ ॥

30जो मनुष्य गुरु के हुक्म की उल्लंघना करता है, वह स्वेच्छाचारी, अज्ञानी मनुष्य माया रूपी विष द्वारा ठग लिया गया है।

31उसके हृदय में झूठ विद्यमान है और वह हरेक को झूठा ही समझता है। इसलिए ईश्वर ने व्यर्थ के विवाद उसके गले में डाल दिए हैं।

32वह व्यर्थ बकवारा करता है, परन्तु जो कुछ वह करता है, वह किसी को भी अच्छा नहीं लगता।

33वह दुहागिन नारी की भाँति घर-घर फिरता है। जो कोई भी उससे मेल-मिलाप करता है, उसे भी बुराई का तिलक (चिन्ह) लग जाता है।

34जो गुरमुख होता है, वह मनमुख से अलग रहता है, वह स्वेच्छाचारी की संगति त्यागकर गुरु के समक्ष बैठता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं