गुरु ग्रंथ साहिब 302 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji
1समस्त जीव-जन्तु तेरे हैं और तू सबका मालिक है। तू समस्त जीव-जन्तुओं को मुक्ति प्रदान करता है॥ ४॥
2श्लोक महला ४॥
3साजन प्रभु का प्रेम भरा सन्देश सुनकर जिनके नेत्र दर्शनों की आशा में लग जाते हैं,
4हे नानक ! गुरु ने प्रसन्न होकर उन्हें साजन प्रभु से मिला दिया है एवं वे सुखपूर्वक रहते हैं॥ १॥
5महला ४॥
6दाता सतिगुरु बड़े दयालु हैं। वह सदैव दया के घर में बसते हैं।
7सतिगुरु के ह्रदय में किसी के साथ शत्रुता नहीं, वह सर्वत्र एक ईश्वर को देखते रहते हैं।
8जो प्राणी निर्वेर के साथ वैर करते हैं, उनमें से कोई सुखी नहीं होता।
9सतिगुरु जी सबका भला चाहते हैं। उनका बुरा किस तरह हो सकता है ?
10जिस श्रद्धा भावना से कोई मनुष्य सतिगुरु के पास जाता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।
11हे नानक ! विश्व की रचना करने वाले परमात्मा से कोई बात छिपाई नहीं जा सकती, चूंकि वह सबकुछ जानता है॥ २॥
12पउड़ी ॥
13जिसे मालिक बड़ा महान करता है, उसे ही महान समझना चाहिए।
14जिसे मालिक पसंद करता है, वह उसे क्षमा कर देता है और वह मालिक के मन में प्रिय लगता है।
15वह (जीव-स्त्री) मूर्ख एवं बुद्धिहीन है, जो उससे तुलना करती है।
16जिसे सदगुरु प्रभु से मिलाते हैं वही मिलती है एवं प्रभु की गुणस्तुति करके दूसरों को सुनाती है।
17हे नानक ! परमात्मा सदैव सत्य है, जो इस तथ्य को समझता है, वह सत्य में ही समा जाता है। ॥ ५॥
18श्लोक महला ४ ॥
19भगवान सत्य है, माया से रहित है, अनश्वर, निडर, निर्वेर एवं निराकार है।
20जो मनुष्य एकाग्रचित होकर उसका सिमरन करते हैं, वे अहंकार के भार से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।
21जिन गुरमुखों ने भगवान की आराधना की है, ऐसे संतजनों को विश्व में बड़ी लोकप्रियता हासिल होती है।
22यदि कोई व्यक्ति पूर्ण सतिगुरु की निन्दा करता है तो उसको सारी दुनिया प्रताड़ित करती है।
23सतिगुरु के भीतर स्वयं भगवान बसता है और स्वयं ही उनका रक्षक है।
24वह गुरु धन्य ! धन्य ! है, जो प्रभु की गुणस्तुति करता रहता है। उसको मैं सदैव प्रणाम करता हूँ।
25हे नानक ! मैं उन पर तन-मन से न्यौछावर हूँ, जिन्होंने सृजनहार परमेश्वर की आराधना की है॥ १॥
26महला ४॥
27ईश्वर ने स्वयं ही धरती बनाई और स्वयं ही आकाश बनाया।
28इस धरती में ईश्वर ने जीव-जन्तु उत्पन्न किए और स्वयं ही प्राणियों के मुख में भोजन दिया है।
29अपने आप ही वह सर्वव्यापक हो रहा है और स्वयं ही गुणों का भण्डार है।
30हे नानक ! तू प्रभु के नाम की आराधना कर, वह तेरे तमाम पाप नाश कर देगा ॥ २ ॥
31पउड़ी॥
32हे सत्य के पुंज परमात्मा ! तू सदैव सत्य है। उस सत्य के पुंज को सत्य ही प्रिय लगता है।
33हे सत्यस्वरूप प्रभु ! जो जो प्राणी तेरी प्रशंसा करते हैं, यमदूत उनके निकट नहीं आता।
34जिनके हृदय को सत्य प्रभु अच्छा लगता है, उनके मुख उसके दरबार में उज्ज्वल हो जाते हैं।
35झुठे पीछे धकेल दिए जाते हैं, मन में झूठ एवं छल-कपट होने के कारण वह महा कष्ट सहन करते हैं।
36झूठों के मुख सत्य के दरबार में काले होते हैं। झूठे केवल झूठे ही रहते हैं।॥ ६॥
37श्लोक महला ४॥
38सतिगुरु धर्म की धरती है। उसमें जैसा कोई धीज बोता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है।
39गुरु के सिक्ख नाम-अमृत बोते हैं एवं ईश्वर को अपने अमृत फल के रूप में प्राप्त करते हैं।
40इस लोक एवं परलोक में उनके मुख उज्ज्वल होते हैं। प्रभु के सच्चे दरबार में उनको मान-सम्मान मिलता है।
41कुछ लोगों के मन में कपट होता है और वह सदैव ही कपट कमाते हैं, जैसा वह बोते हैं, वैसा ही फल खाते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं