सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 301 · Raag Gauree · Guru Raam Daas Ji

1जिन गुरमुखों पर वह कृपा करता है, उनके तमाम कार्य सफल हो जाते हैं।

2हे नानक ! ईश्वर को वही मेिले हैं, जो आदि से मिले हैं और जिन्हें दुनिया के रचयिता भगवान ने स्वयं मिलाया है॥ २॥

3पउड़ी ॥

4हे मेरे सच्चे मालिक ! हे गुसाई ! तू सदैव सत्य है।

5सारी दुनिया तेरा ही ध्यान करती रहती है और तेरे समक्ष नतमस्तक होती है।

6तेरी कीर्ति सुन्दर एवं सुन्दरता का घर है। जो भी तेरी सराहना करता है, उसे तू पार कर देता है।

7गुरमुखों को तुम फल प्रदान करते हो और वह सत्यनाम में समा जाते हैं।

8हे मेरे महान मालिक ! तेरी महिमा महान है॥ १ ॥

9श्लोक महला ४॥

10भगवान के नाम के सिवाय केिसी अन्य की सराहना करना एवं तमाम बातचीत का स्वाद फीका है।

11स्वेच्छाचारी जीव अपने अहंकार की प्रशंसा करते हैं परन्तु अहंत्व का मोह व्यर्थ है।

12जिनकी वह सराहना करते हैं, वे मर जाते हैं। वह तमाम विवादों में नष्ट हो जाते हैं।

13हे नानक ! परमानंद हरि-परमेश्वर की आराधना करके गुरमुख बच गए हैं।॥ १॥

14महला ४॥

15हे सतिगुरु ! मुझे हरि-प्रभु की बातें सुनाइए, चूंकि मैं अपने मन में उसके नाम का ध्यान करूँ।

16हे नानक ! भगवान का नाम बड़ा पावन है, इसलिए मेरी यही इच्छा है कि मैं अपने मुख से (हरि-नाम) बोलकर अपने सभी दुख समाप्त कर लूं ॥ २॥

17पउड़ी॥

18हे निरंजन प्रभु ! तू स्वयं ही निरंकार है। हे सत्य परमेश्वर !

19जिन्होंने एकाग्रचित होकर तेरा ध्यान किया है, तूने उनके तमाम दुःख नाश कर दिए हैं।

20तेरी बराबरी करने वाला कोई नहीं, जिसे पास बैठा कर मैं तेरा जिक्र करूँ।

21हे निरंजन प्रभु ! तेरे जैसा बड़ा दाता तू ही है और तू ही मेरे हृदय को प्रिय लगता है।

22हे मेरे सच्चे मालिक ! तेरी महिमा सत्य है॥ २ ॥

23श्लोक महला ४॥

24जिनके अन्तर्मन में अहंकार का रोग विद्यमान है, ऐसे स्वेच्छाचारी दुर्जन जीव दुविधा में भटके हुए हैं।

25हे नानक ! यह अहंकार का रोग सतिगुरु से मिलकर एवं साधु-सज्जनों की संगति करके निवृत किया जा सकता है॥ १॥

26महला ४॥

27गुरमुखों का मन एवं शरीर गुणों के भण्डार परमात्मा की प्रीति में मग्न रहते हैं।

28हे नानक ! उसने भगवान की शरण ली है। वह गुरु धन्य हैं, जिन्होंने उसे ईश्वर से मिला दिया है॥ २॥

29पउड़ी ॥

30हे सर्वशक्तिशाली प्रभु ! तू अगम्य है, फिर मैं तेरी तुलना किससे करूं ?

31यदि कोई तेरे जैसा महान हो तो मैं उसका नाम लुं। लेकिन तेरे जैसा केवल तू ही कहा जाता है।

32(हे नाथ !) तू प्रत्येक शरीर में मौजूद है, परन्तु यह बात उन पर प्रकट होती है जो सतिगुरु के समक्ष होते हैं।

33हे प्रभु ! तू ही सत्य एवं हम सबका मालिक है और तू ही सर्वोपरि है।

34हे सत्यरवरूप परमेश्वर ! यदि हमें यह विश्वस्त हो जाए कि जो कुछ तू करता है केवल वही होता है, तब हम क्यों अफसोस करें ? ॥ ३ ॥

35श्लोक महला ४ ॥

36मेरा मन एवं तन आठों प्रहर प्रियतम के प्रेम में मग्न रहे।

37हे नानक ! जिन पर भगवान अपनी कृपा धारण करता है, वे सतिगुरु के सुख में रहते हैं।॥ १॥

38महला ४॥

39जिनके अन्तर्मन में भगवान का प्रेम है, जब वह प्रभु का यशोगान करते हैं, तो वह बहुत सुन्दर लगते हैं।

40हे नानक ! जिस भगवान ने यह प्रेम लगाया है, वह स्वयं ही जानता है॥ २॥

41पउड़ी ॥

42हे विश्व के रचयिता प्रभु ! तू स्वयं अविस्मरणीय है, इसलिए कोई भूल नहीं करते।

43हे सच्चे ! जो कुछ तू करता है, वह शुभ करता है। गुरु के शब्द द्वारा यह ज्ञान प्राप्त होता है।

44हे प्रभु ! तू समस्त कार्य करने एवं जीवों से करवाने में समर्थ है। तेरे अलावा दूसरा कोई नहीं।

45हे मेरे मालिक ! तू अगम्य एवं दया का घर है और सारी दुनिया तेरा ही ध्यान करती रहती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं