गुरु ग्रंथ साहिब 300 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1(गुरु की कृपा से) वह ईश्वर की भक्ति में लग गया है, जिससे उसका मन तन शीतल हो गया, उसके भीतर शांति एवं सहज सुख उत्पन्न हो गया।
2जो मनुष्य प्रभु का नाम-स्मरण करते हैं, उनके विकारों के बन्धन और अनेक पाप नाश हो जाते हैं। उसके तमाम कार्य सफल एवं सम्पूर्ण हो जाते हैं, उनकी दुर्बुद्धि नाश हो जाती है और उनका अहंकार निवृत्त हो जाता है।
3पारब्रह्म की शरण लेने से मनुष्य का जन्म-मरण का चक्र मिट जाता है।
4गोबिन्द प्रभु की महिमा-स्तुति के कारण वह अपने कुटुंब सहित (भवसागर से) पार हो जाता है।
5हे जीव ! ईश्वर की भक्ति ही करनी चाहिए और भगवान के नाम का जाप करना चाहिए।
6हे नानक ! सर्व सुखों का मूल वह परमात्मा पूर्ण गुरु के द्वारा मिलता है॥ १५॥
7श्लोक॥
8पूर्ण मनुष्य जिसे परमात्मा ने स्वयं पूर्ण किया है, वह कभी विचलित नहीं होता।
9हे नानक ! वह दिन-रात प्रगति करता रहता है और जीवन में असफल नहीं होता।॥ १६ ॥
10पउड़ी ॥
11पूर्णिमा- केवल एक परमेश्वर ही पूर्ण है। वह सब कुछ करने एवं करवाने में समर्थ है।
12सर्वव्यापक परमात्मा समस्त जीव-जन्तुओं पर दयालु रहता है, समस्त जीवों पर उसका रक्षा करने वाला हाथ है।
13गोविन्द जिसकी इच्छानुसार सब कुछ होता है, गुणों का भण्डार है।
14वह बुद्धिमान, अदृश्य एवं निरंजन प्रभु अन्तर्यामी है।
15पारब्रह्म-परमेश्वर समस्त विधियों को जानने वाला है।
16वह संतों का सहायक एवं शरण देने में समर्थ है। मैं सदैव उसको प्रणाम करता हूँ।
17मैं हरि के सुन्दर चरणों की आराधना करता हूँ, जिसकी अकथनीय कथा जानी नहीं जा सकती।
18हे नानक ! मैंने उस प्रभु की शरण ली है, जो पतितों का उद्धार करने वाला एवं अनाथों का नाथ है॥ १६ ॥
19श्लोक॥
20जब से मैंने भगवान की शरण ली है, मेरा दु:ख नाश हो गया है और दुविधा भाग गई है।
21हे नानक ! भगवान का यशोगान करने से मैंने मनोवांछित फल प्राप्त कर लिए हैं ॥ १७ ॥
22पउड़ी॥
23चाहे कोई मनुष्य भगवान के नाम का गायन करे,चाहे कोई मनुष्य भगवान का नाम सुने, चाहे कोई मनुष्य विचार करे,
24चाहे कोई मनुष्य उपदेश करे एवं चाहे कोई मनुष्य इसको अपने मन में दृढ़ करे, उसका उद्धार हो जाता है।
25उसके पाप मिट जाते हैं, वह निर्मल हो जाता है और उसके जन्म-जन्मांतरों की मैल दूर हो जाती है।
26इस लोक एवं परलोक में उसका मुख उज्ज्वल होता है और माया उस पर प्रभाव नहीं करती।
27वह बुद्धिमान मनुष्य है, वही वैष्णो, वही ज्ञानी एवं धनवान है,
28वही शूरवीर एवं वही उच्च कुल का है, जिसने भगवान का भजन किया है।
29क्षत्रिय, ब्राह्मण, शूद्र, वैश्य एवं चण्डाल जातियों वाले भी प्रभु का सिमरन करने से पार हो गए हैं।
30नानक, उसके चरणों की धूलि है, जो अपने ईश्वर को जानता है॥ १७ ॥
31गउड़ी की वार महला ४ ॥
32ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
33श्लोक महला ४॥
34महापुरुष सतिगुरु समस्त जीवों पर दयालु है, उसके लिए सभी जीव एक समान हैं।
35वह सबको एक दृष्टि से देखता है परन्तु वह मन की श्रद्धा से ही पाया जाता है।
36सतिगुरु के भीतर नाम-अमृत बसता है। वह प्रभु की भाँति उत्तम है और हरि पद रखता है।
37हे नानक ! गुरु की कृपा से ही भगवान का ध्यान किया जाता है, तथा विरले गुरमुख ही भगवान को प्राप्त करते हैं।॥ १॥
38महला ४॥
39अहंकार एवं माया समस्त विष है। उनके साथ लगकर मनुष्य इस दुनिया में सदैव नुक्सान प्राप्त करता है।
40शब्द का चिन्तन करने से गुरमुख हरि-नाम रूपी धन का लाभ कमा लेता है।
41हरि एवं हरि-अमृत को हृदय में वसाने से अहंकार की मैल का विष उतर जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं