सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 29 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji

1चौरासी लाख योनियों के जीव अर्थात्-सृष्टि के समस्त प्राणी उस परमात्मा के मिलन को तरस रहे हैं, किन्तु जिसे वह स्वयं दया-दृष्टि करके मिलाता है, वही परमात्मा से आकर मिल सकता है।

2नानक देव जी कथन करते हैं जो गुरु उपदेशानुसार हरि-नाम में लीन हुए हैं, उन्होंने ही हरि-प्रभु को प्राप्त किया है ॥४॥६॥३९ ॥

3श्रीरागु महला ३ ॥

4हरि-नाम सुखों का सागर है तथा इसे गुरु के उपदेशानुसार ही पाया जा सकता है।

5प्रतिदिन प्रभु-नाम का चिंतन करने से जीव स्वाभाविक ही परमेश्वर में समा जाता है।

6यदि जीव का अंतर्मन सत्य स्वरूप परमात्मा के साथ मिल जाए तो जिव्हा हरि-प्रभु का गुणगान करती है ॥ १॥

7हे भाई ! द्वैत-भाव के कारण सम्पूर्ण जगत् दुखी हो रहा है।

8यदि गुरु की शरण में आकर जीव नित्य प्रति नाम-स्मरण करता रहे तो वह आत्मिक सुख प्राप्त करता है ॥ १॥ रहाउ ॥

9ऐसे सत्य प्राणी को कभी पापों की मैल नहीं लगती और वह शुद्ध मन से हरि-प्रभु का नाम-सिमरन करता है।

10गुरु-उपदेश को पहचानने से हरि-प्रभु के अमृत रूपी नाम में समाया जा सकता है।

11जिस जीव ने अपने हृदय में तीक्ष्ण ज्ञान का दीपक जला लिया तो उसके ह्रदय से अज्ञानता का अंधेरा नष्ट हो जाता है। ॥२॥

12स्वेच्छाचारी जीव अहंकार, तृष्णादि विकारों की मैल से मलिन हो रहे हैं।

13गुरु के उपदेश बिना यह मैल कभी नहीं उतरती, ऐसे में जीव आवागमन के चक्र में फँस कर पीड़ित होता है।

14वह मायावी क्रीड़ा में खचित हुए रहते हैं और इस कारण वह न तो इस संसार का सुख भोग पाते हैं तथा न ही परलोक का आनंद ले पाते हैं। ॥ ३॥

15गुरुमुख जीव जप, तप व संयम में रह कर हरि-प्रभु के नाम से प्रीति करता है।

16ऐसा जीव सदैव ईश्वर के एक नाम का सिमरन करता है।

17नानक देव जी कथन करते हैं केि समस्त प्राणियों का आसरा केवल नाम सिमरन ही है ॥४॥७॥४०॥

18श्रीरागु महला ३ ॥

19स्वेच्छाचारी जीव माया के मोह में फंसा होने के कारण उदासीनता एवं वैराग्य प्राप्त नहीं कर सकता।

20वह गुरु-उपदेश के रहस्य को नहीं समझता, इसलिए वह परमात्मा के दर पर अपनी प्रतिष्ठा खो देता है।

21यदि वह गुरुमुख होकर अहंत्व का त्याग करके परमात्मा के नाम में लीन होता है, तभी उसे आत्मिक आनंद की प्राप्ति होगी॥ १॥

22हे मन ! तुझ में सदैव भौतिक पदार्थों की कामना ही भरी रहती है।

23परिपूर्ण सतिगुरु की सेवा करने से यह मोह पूरी तरह सड़ जाता है तथा जीव गृहस्थ जीवन में ही उदासीन रहता है।॥ १॥ रहाउ॥

24गुरु की शरण लेकर यदि जीव धर्म कार्य करे तो वह परमात्मा की प्रसंनता प्राप्त करता है तथा वैराग्य का आनंद उठाता है।

25वह अपने अंतर्मन से अहंत्व का त्याग करके निश्चित होकर नित्य-प्रति दिन-रात ईश्वर की उपासना करता है।

26ऐसा जीव सौभाग्य से ही सत्संगति पाता है और वह स्वाभाविक ही परमात्मा को प्राप्त कर लेता है II २ II

27वास्तविक तौर पर साधू और वैरागी वही है जो हृदय में प्रभु-नाम को धारण कर ले।

28उसके मन में तनिक भी तामसिकता नहीं रहती तथा वह अंतर्मन से अहंत्व को मिटा लेता है।

29प्रभु का यह नाम रूपी रधज़ाना सतिगुरु ने ही दिखाया है और हरि-प्रभु का नाम-रस पीकर वह तृप्त हो गए॥ ३॥

30जिस किसी ने भी हरि-नाम को प्राप्त किया तो उसने सौभाग्य, वैराग्य तथा सत्संगति द्वारा ही पाया है।

31भौतिक पदार्थों में आसक्त जीव (मनमुख) सतिगुरु को नहीं पहचानता अर्थात् वह गुरु का उपदेश ग्रहण नहीं करता, क्योंकि उसके अंदर अहंकार प्रबल होता है तथा वह योनियों में ही भटकता रहता है।

32नानक देव जी कथन करते हैं कि गुरु के उपदेश में अनुरक्त जीव परमात्मा के नाम में रंग गए तथा यह रंग प्रभु के भय के बिना नहीं लग सकता॥ ४॥ ८ ॥ ४१ ॥

33श्रीरागु महला ३ ॥

34शरीर (घर) द्वारा ही नाम रूपी सौदा प्राप्त होता है, क्योंकि अंतर्मन में समस्त पदार्थ व्याप्त हैं।

35लेकिन यह सौदा किसी विशेष गुरुमुख जीव को प्रतिक्षण नाम-सिमरन करने से ही प्राप्त होता है।

36प्रभु का नाम-भण्डार अक्षुण्ण है और यह सौभाग्य से ही प्राप्त होता है॥ १॥

37हे प्राणी मन ! अपने भीतर से निंदा, अहंकार और गर्व का त्याग कर दे।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं