गुरु ग्रंथ साहिब 299 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1अपने हाथों एवं चरणों से साधुओं की सेवा करो।
2हे नानक ! यह जीवन-आचरण ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त होता है॥ १०॥
3श्लोक ॥
4केवल एक ईश्वर की महिमा का ही बखान करना चाहिए, ऐसे स्वाद को कोई विरला पुरुष ही जानता है।
5गोबिन्द की महिमा को जाना नहीं जा सकता। हे नानक ! वह तो बहुत अदभुत रूप है॥ ११॥
6पउड़ी।
7एकादशी-प्रभु-परमेश्वर को सदैव निकट देखी।
8अपनी इन्द्रियों को वश में करके प्रभु का नाम सुनो।
9जो व्यक्ति अपने मन में संतोष धारण करता है और समस्त जीवों के साथ दया करता है,
10इस विधि से उसका व्रत सफल हो जाता है।
11ऐसा करके वह अपने भागते हुए मन को स्थिर करके रखता है।
12भगवान के नाम का जाप करने से मन एवं शरीर शुद्ध हो जाते हैं।
13भगवान दुनिया में हर जगह मौजूद है,
14इसलिए हे नानक ! भगवान का कीर्तन हरदम करते रहो चूंकि यही एक अटल धर्म है॥ ११॥
15श्लोक॥
16कृपा के घर संतों को मिलने एवं उनकी सेवा करने से दुर्मति मिट जाती है।
17हे नानक ! जो लोग प्रभु के साथ मिले रहते हैं, उनके हर प्रकार के बन्धन नाश हो जाते हैं। १२॥
18पउड़ी।
19द्वादशी- दान-पुण्य करो, ईश्वर का नाम-सिमरन करो और जीवन पवित्र रखो।
20अपना अभिमान त्याग कर भगवान की भक्ति करते रहो।
21संतों की संगति में शामिल होकर हरि नाम रूपी अमृत का पान करो।
22प्रेमपूर्वक प्रभु का कीर्तन करने से मन तृप्त हो जाता है।
23मधुर वाणी हर किसी को संतोष प्रदान करती है।
24पंचभूतक आत्मा हरि-नाम रूपी रस से आनंदित हो जाती है।
25पूर्ण गुरु द्वारा यह निश्चय ही मिल जाता है।
26हे नानक ! राम का नाम-सिमरन करने से जीव फिर से योनियों में नहीं आता ॥ १२ ॥
27श्लोक॥
28दुनिया माया के तीन गुणों के दबाव में फँसी रहती है, इसलिए उसके कार्य पूर्ण नहीं होते।
29हे नानक ! वही प्राणी मोक्ष प्राप्त करता है, जिसके हृदय में पतितों का उद्धार करने वाला ईश्वर का नाम बस जाता है॥ १३ ॥
30पउड़ी ॥
31त्रयोदशी- यह संसार तीन गुणों के ताप से दुःखी पड़ा हुआ है।
32जिससे यह जन्म-मरण के चक्र में पड़कर नरक में जाता है।
33प्रभु-परमेश्वर का भजन इसके मन में प्रवेश नहीं करता।
34सुखों के सागर प्रभु की महिमा मनुष्य एक क्षण भर के लिए भी नहीं करता।
35हर्ष एवं शोक का यह शरीर पुतला है।
36इसे माया का दीर्घ एवं असाध्य रोग लगा हुआ है।
37वह दिन रात विकारों का कार्य करता है और हार थक जाता है।
38ऑखों में नोंद से वह स्वप्न में भी बातें करता है।
39भगवान को भुला कर उसकी यह दशा हो जाती है।
40नानक ने दया के घर प्रभु की शरण ली है॥ १३ ॥
41श्लोक ॥
42परमात्मा चारों दिशाओं एवं चौदह लोकों में हर जगह पर मौजूद है।
43हे नानक ! उस ईश्वर के भण्डारों में कोई कमी नहीं देखी जाती, प्रभु द्वारा किए तमाम कार्य सफल होते हैं।॥ १४॥
44पउड़ी ॥
45चौदश- चारों दिशाओं में ईश्वर स्वयं ही बस रहा है।
46सभी लोकों में उसका तेज-प्रताप चमक रहा है।
47दसों दिशाओं में एक प्रभु ही व्यापक है।
48धरती एवं आकाश हर स्थान पर ईश्वर को देखो।
49जल, धरती, वन, पहाड़ एवं पाताल-
50इन सब में दयालु परमेश्वर बस रहा है।
51गोचर एवं अगोचर समूचे जगत् में भगवान मौजूद है।
52हे नानक ! गुरमुख ईश्वर को पहचान लेता है॥ १४॥
53श्लोक॥
54गुरु के उपदेश द्वारा गोविन्द की गुणस्तुति करने से आत्मा को जीता जा सकता है।
55हे नानक ! संतों की कृपा से भय मिट जाता है और संशय निवृत्त हो जाता है॥ १५॥
56पउड़ी ॥
57अमावस्या-जिस व्यक्ति को गुरदेव ने संतोष प्रदान किया है, उसकी आत्मा सुखी हो गई है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं