सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 298 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1भगवान बड़ा महान एवं सर्वोपरि है, जिसकी महिमा का अन्त अनेकों शेषनाग भी नहीं जान सकते।

2नारद मुनि, मुनिजन, शुकदेव एवं व्यास भी गोविन्द की महिमा का गायन करते हैं।

3ईश्वर के भक्त उसके नाम-रस में भीगे रहते हैं, उसके स्मरण में आोत-प्रोत रहते हैं और भगवान के भजन में लीन रहते हैं।

4दया के घर भगवान की शरण लेने से मोह, अभिमान एवं दुविधा नाश हो जाते हैं।

5जिनके मन तथा तन में ईश्वर के सुन्दर चरण बस गए, ईश्वर के दर्शन करके वे कृतार्थ हो जाते हैं।

6साधसंगत द्वारा ईश्वर चरणों में सुरति लगाकर लाभ प्राप्त किया जाता है।

7हे नानक ! नाम का ध्यान करके गुणों के भण्डार भगवान का नाम रूपी भण्डार उपलब्ध कर लो ॥ ६ ॥

8श्लोक॥

9संतों की गण्डली हमेशा ही भगवान का यश कथन करती रहती है और सहज स्वभाव सत्य ही बोलती रहती है।

10हे नानक ! एक ईश्वर में सुरति लगाने से मन संतुष्ट हो जाता है।॥ ७॥

11पउड़ी॥

12सप्तमी-प्रभु का नाम रूपी धन संचित करो, क्योंकि नाम-धन का भण्डार कभी समाप्त नहीं होता।

13(यह नाम धन) संतों की संगति करने से ही प्राप्त होता है, जिस प्रभु के गुणों का कोई अन्त नहीं, जिसके स्वरूप का ओर-छोर नहीं मिलता।

14हे जिज्ञासुओ ! अपना अहंकार त्याग कर भगवान का भजन करते रहो और उस प्रभु की शरण में ही आओ।

15भगवान की शरण में आने से दुख दूर हो जाते हैं, भवसागर भी पार हो जाता है तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

16जो मनुष्य दिन-रात अपने मन में ईश्वर का नाम-सिमरन करता है, उसका जन्म सफल हो जाता है।

17जो परमेश्वर (प्रत्येक जीव के)भीतर -बाहर सदैव साथ है, वह कर्तार प्रभु उस मनुष्य का मित्र बन जाता है।

18हे जीव ! जो व्यक्ति (हमें) भगवान का नाम जपने का उपदेश देता है, वही हमारा वास्तविक मित्र, सखा एवं साथी है।

19हे नानक ! जो पुरुष हरि-परमेश्वर के नाम का जाप करता है, मैं उस पर कुर्बान जाता हूँ॥७॥

20श्लोक॥

21यदि हम आठों प्रहर भगवान की महिमा- स्तुति करते रहें और दूसरे तमाम बन्धन त्याग दें तो

22हे नानक ! भगवान प्रसन्न होकर दया के घर में आ जाता है तथा यमदूत भी दृष्टि नहीं कर सकता ॥ ८ ॥

23पउड़ी॥

24अष्टमी- आठ सिद्धियाँ, नौ निधियाँ,

25समस्त बहुमूल्य पदार्थ, पूर्ण बुद्धि,

26हृदय कमल का प्रकाश, सदैव आनंद,

27पवित्र जीवन आचरण, अचूक उपदेश,

28समस्त धर्म (गुण), पवित्र स्नान एवं

29सर्वोच्च तथा श्रेष्ठ ज्ञान,

30पूर्ण गुरु की संगति करने से प्रभु-परमेश्वर के भजन द्वारा प्राप्त हो जाते हैं।

31हे नानक ! प्रेमपूर्वक ईश्वर का नाम-स्मरण करने से मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है।॥ ८ ॥

32श्लोक ॥

33जो व्यक्ति नारायण का नाम-सिमरन नहीं करता, ऐसे व्यक्ति को हमेशा विकारों के रसों ने मुग्ध किया हुआ है।

34हे नानक ! यदि जीव भगवान का नाम भुला दे तो उसे बार-बार नरक-स्वर्ग में जन्म लेना पड़ता है॥९॥

35पउड़ी॥

36नवमी- शरीर की नौ इन्द्रियाँ (नाक-कान इत्यादि) अपवित्र रहती हैं।

37जीव प्रभु का नाम स्मरण नहीं करते और विपरीत कर्म करते रहते हैं।

38ईश्वर के नाम-स्मरण से विहीन मनुष्य पराई नारियाँ भोगते हैं और साधुओं की निन्दा करते रहते हैं और

39अपने कानों से तनिक मात्र भी भगवान का यश नहीं सुनते।

40वे अपना पेट भरने के लिए पराया धन चुराते रहते हैं।

41फिर भी उनकी लालच की अग्नि तृप्त नहीं होती और न ही उनकी तृष्णा दूर होती है।

42प्रभु की भक्ति के बिना उनके तमाम प्रयासों को ऐसे फल ही लगते हैं।

43हे नानक ! भगवान को मुलाकर भाग्यहीन लोग आवागमन के चक्र में फंसे रहते हैं ॥९॥

44श्लोक ॥

45मैं दसों दिशाओं में ही खोज रहा हूँ। लेकिन जिधर कहीं भी देखता हूँ, उधर ही भगवान को मैं पाता हूँ।

46हे नानक ! मनुष्य का मन वश में तभी आता है, यदि परमेश्वर उस पर पूर्ण कृपा करता है ॥१०॥|

47पउड़ी॥

48दसमी- जो मनुष्य अपनी दसों इन्दियों (पाँच ज्ञान एवं पाँच कर्म इन्द्रियां ) को वश में कर लेता है,

49परमात्मा का नाम जपने से उसके मन में संतोष उत्पन्न हो जाता है।

50अपने कानों से गोपाल का यश सुनो।

51अपने नेत्रों से दयालु संतों को देखो।

52अपनी जिह्मा से अनन्त परमात्मा की गुणस्तुति करो।

53अपने हृदय में पूर्ण भगवान का चिन्तन करो।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं