सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 297 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1तुझे लाभ प्राप्त होगा और कोई नुक्सान नहीं होगा एवं ईश्वर के दरबार में मान-सम्मान मिलेगा।

2जो व्यक्ति राम नाम रूपी धन एकत्र करता है वही व्यक्ति सच्चा साहूकार एवं भाग्यवान है।

3उठते-बैठते हरि का भजन करो एवं सत्संगति में प्रेम उत्पन्न करो।

4हे नानक ! जब पारब्रह्म प्रभु मनुष्य के हृदय में बस जाता है तो उसकी दुर्बुद्धि नाश हो जाती है॥ २॥

5श्लोक ॥

6माया के तीण गुण दुनिया को बड़ा दुःखी कर रहे हैं, लेकिन कोई विरला पुरुष ही तुरीय अवस्था को पाता है।

7हे नानक ! जिनके हृदय में प्रभु-परमेश्वर निवास करता है, वह संत पवित्र-पावन हो जाते हैं॥ ३ ॥

8पउड़ी ॥

9तृतीय- माया के तीन गुणों वाले मनुष्य (विषय-विकारों के) विष को फल के तौर पर एकत्रित करते हैं। कभी वे भले हैं और कभी वे बुरे हैं।

10वह नरक-स्वर्ग में अधिकतर भटकते हैं और मृत्यु सदैव ही उनका संहार करती है।

11दुनिया के हर्ष, शोक एवं दुविधा के चक्र में फँसे हुए वह अपना अमूल्य जीवन अहंकार करते हुए बिता देते हैं।

12जिस ईश्वर ने उनको उत्पन्न किया है, उसे वे नहीं जानते और दूसरे अनेक उपाय सोचते रहते हैं।

13लौकिक आस्वादनों के कारण प्राणी को मन एवं तन के रोग तथा दूसरे झंझट भी लगे रहते हैं, कभी इसके मन का दुःख क्लेश मिटता नहीं है।

14वह सर्वव्यापक पारब्रह्म-प्रभु के तेज-प्रताप को अनुभव नहीं करते।

15मोह एवं दुविधा में अत्याधिक सांसारिक लोग डूब गए हैं और कुंभी नरक में वे निवास पाते हैं।

16नानक का कथन है कि हे प्रभु ! कृपा करके मेरी रक्षा करो, चूंकि मुझे तेरी ही आशा है॥ ३॥

17श्लोक ॥

18जो मनुष्य अपना अभिमान त्याग देता है, वही चतुर, बुद्धिमान एवं गुणवान है।

19हे नानक ! भगवान के नाम का भजन करने से संसार के चार उत्तम पदार्थ एवं आठ सिद्धियाँ मिल जाती हैं॥ ४ ॥

20पउड़ी।

21चतुर्थी- चारों वेद सुनकर और उनके यथार्थ को विचार कर मैंने निर्णय किया है कि

22राम के नाम का भजन, तमाम हर्ष एवं सुखों का भण्डार है।

23परमेश्वर के भजन में लीन होने से नरक मिट जाता है। दुःख नाश हो जाता है और अनेक क्लेश नष्ट हो जाते हैं,

24आत्मिक मृत्यु मिट जाती है और प्राणी यमराज से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।

25निरंकार परमात्मा के प्रेम में मग्न होने से मनुष्य का भय नाश हो जाता है और वह अमृत रस पान करता है।

26ईश्वर नाम के सहारे से दु:ख, दर्द एवं अपवित्रता नष्ट हो जाते हैं।

27देवते, मनुष्य एवं मुनिजन भी सुख के सागर गोपाल की खोज करते हैं।

28हे नानक ! संतों की चरण-धूलि लेने से मन पवित्र एवं (लोक-परलोक में) मुख उज्ज्वल हो जाता है॥ ४॥

29श्लोक ॥

30जीव माया के मोह में ही मग्न रहता है, जिसके कारण पाँच विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) उसके हृदय में बसे रहते हैं।

31हे नानक ! किन्तु सत्संगति करने से जीव पवित्र हो जाता है और वह प्रभु के रंग में मग्न रहता है॥ ५॥

32पउड़ी ॥

33पंचमी- संसार में वही महापुरुष सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं, जिन्होंने इस संसार के परपंच को समझ लिया है।

34पुष्पों की अधिक सुगन्धि एवं अनेक रंगों की भाँति समस्त छल-कपट झूठे हैं।

35मनुष्य देखता नहीं, वह यथार्थ को समझता नहीं, न ही वह थोड़ा-सा भी विचार करता है।

36दुनिया आस्वादनों, मोह, रस में बंधी रहती है और अज्ञान में लीन रहती है।

37जो मनुष्य अनेक कर्म करते हैं वे जन्म मरण के चक्र में पड़ते हैं और अनेक योनियों में भटकते रहते हैं

38परन्तु करतार की आराधना नहीं करते और जिनके हृदय में विचार कर (भले बुरे काम की) परख नहीं है ।

39जो व्यक्ति भगवान की भक्ति तथा भगवान में श्रद्धा धारण करते हैं, उनके साथ माया बिल्कुल लिप्त नहीं होती।

40हे नानक ! दुनिया में विरले इन्सान ही मिलते हैं जो दुनिया के परपंच में नहीं फॅसते॥ ५ ॥

41श्लोक ॥

42षट्शास्त्र उच्च स्वर से पुकारते हुए कहते हैं कि भगवान की महिमा का अन्त नहीं मिल सकता तथा उसके अस्तित्व का आोर-छोर नहीं पाया जा सकता।

43हे नानक ! भगवान के भक्त भगवान के द्वार पर उसका गुणानुवाद करते हुए अति सुन्दर लगते हैं।॥ ६॥

44पउड़ी॥

45षष्ठी- षट्शास्त्र कहते हैं, अनेक स्मृतियाँ भी कथन करती हैं कि

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं