सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 296 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1श्रेष्ठ ज्ञान, उत्तम स्नान,

2चारों पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष), हृदय कमल का खिलना,

3सब में रहते हुए सबसे तटस्थ रहना,

4सुन्दरता, बुद्धिमत्ता एवं तत्ववेत्ता,

5समदर्शी एवं एक दृष्टि से ईश्वर को देखना,

6हे नानक ! ये तमाम फल उसे मिलते हैं, जो अपने मुँह से (सुखमनी) सुखों की मणि का जाप करता है और गुरु के वचन तथा प्रभु के नाम की महिमा मन लगाकर सुनता है॥ ६॥

7जो भी जीव इस गुणों के भण्डार का ह्रदय से जाप करता है,

8उसकी समस्त युगों में गति हो जाती है।

9यह वाणी गोबिन्द का यश एवं नाम की ध्वनि है,

10जिस बारे स्मृतियों, शास्त्र एवं वेद वर्णन करते हैं।

11समस्त मतों (धर्मो) का सारांश भगवान का नाम ही है।

12इस नाम का निवास गोविन्द के भक्त के हृदय में होता है।

13करोड़ों ही अपराध संतों की संगति करने से नाश हो जाते हैं।

14संतों की कृपा से जीव यमों से छूट जाता है।

15हे नानक ! जिस व्यक्ति के मस्तक पर ईश्वर ने भाग्य लिख दिया है,

16वही व्यक्ति साधु की शरण में आता है॥ ७॥

17जिस पुरुष के हृदय में (सुखमनी) निवास करती है और जो इसे प्रेमपूर्वक सुनता है,

18वही हरि-प्रभु को स्मरण करता है।

19उसके जन्म-मरण के दुःख नाश हो जाते हैं।

20वह इस दुर्लभ शरीर को तत्काल विकारों से बचा लेता है।

21उसकी शोभा निर्मल है एवं उसकी वाणी अमृत रूप होती है।

22एक ईश्वर का नाम ही उसके मन में समाया रहता है।

23दुःख, रोग, भय एवं दुविधा उससे दूर हो जाते हैं।

24उसका नाम साधु हो जाता है और उसके कर्म पवित्र होते हैं।

25उसकी शोभा सर्वोच्च हो जाती है।

26हे नानक ! इन गुणों के कारण (ईश्वर की) इस वाणी का नाम सुखमनी है॥ ८॥ २४॥

27थिती गउड़ी महला ५ ॥

28श्लोक ॥

29ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

30इस विश्व का रचयिता परमात्मा जल, धरती एवं गगन में सर्वव्यापक है।

31हे नानक ! सबका मालिक एक प्रभु अनेक प्रकार से सारे विश्व में फैला हुआ है॥ १॥

32पउड़ी॥

33एकम- ईश्वर एक है और उस एक प्रभु की ही वंदना करो और उसे ही स्मरण करना चाहिए।

34उस गोविन्द गोपाल का यशोगान करो एवं अकाल पुरुष की शरण लो।

35मोक्ष एवं सुख पाने के लिए उसमें अपनी आशा रखो, जिसके हुक्म से सबकुछ होता है।

36मैंने चारों कोनों एवं दसों दिशाओं में भटक कर देख लिया है, उस (प्रभु-परमश्वर) के अलावा दूसरा कोई (रक्षक) नहीं है।

37(हे जीव !) वेद, पुराण एवं स्मृतियां सुनकर मैंने उन पर बहुत विधियों से विचार किया है।

38केवल निरंकार परमात्मा ही पापियों का उद्धार करने वाला, भयनाशक एवं सुखों का सागर है।

39प्रभु ही दाता, भोगनहार एवं देन देने वाला है। उस (प्रभु) के अलावा दूसरा कोई नहीं।

40हे नानक ! परमात्मा की गुणस्तुति करने से मनुष्य को सब कुछ मिल जाता है, जिसकी वह अभिलाषा करता है। ॥१॥

41हे मेरे मित्र ! नित्य ही गोविन्द की गुणस्तुति करनी चाहिए,

42साधसंगति में मिलकर उस भगवान का भजन करना चाहिए॥ १॥ रहाउ॥

43श्लोक ॥

44ईश्वर को अनेक बार प्रणाम कर और उस प्रभु की शरण में आओ।

45हे नानक ! साधसंगत करने से दुनिया का मोह व द्वैतवाद मिट जाता है और तमाम भ्रम नाश हो जाते हैं।॥ २॥

46पउड़ी॥

47द्वितीय- अपनी मंदबुद्धि को त्याग कर सदैव ही गुरु की सेवा करनी चाहिए।

48हे मित्र ! काम, क्रोध एवं लालच त्याग देने से राम नाम रूपी रत्न तेरी आत्मा एवं शरीर में आ बसेगा।

49तेरा मरण मिट जाएगा और जीवन मिल जाएगा तथा तेरे तमाम दुःख-क्लेश नाश हो जाएँगे।

50अपना अहंकार त्यागकर गोविन्द का भजन करो, प्रभु की भक्ति मन में प्रवेश कर जाएगी।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं