गुरु ग्रंथ साहिब 292 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1कोई नरक में जाने लगा और कोई स्वर्ग की अभिलाषा करने लगा।
2ईश्वर ने सांसारिक विवाद, धन-दौलत के जंजाल,
3अहंकार, मोह, दुविधा एवं भय के भार बना दिए।
4दुःख-सुख, मान-अपमान
5अनेक प्रकार से वर्णन होने प्रारम्भ हो गए।
6अपनी लीला प्रभु स्वयं ही रचता और देखता हैं।
7हे नानक ! जब परमात्मा अपनी लीला को समेट लेता है तो केवल वही रह जाता है॥ ७ ॥
8जहाँ पर अनन्त परमात्मा है, वहीं उसका भक्त है, जहाँ पर भक्त है, वहीं परमात्मा स्वयं है।
9जहाँ कहीं वह रचना का प्रसार करता है, वह उसके संत के प्रताप के लिए है।
10दोनों पक्षों का वह स्वयं ही मालिक है।
11उसकी शोभा केवल उसी को ही शोभा देती है।
12भगवान स्वयं ही लीला एवं खेल करता है।
13वह स्वयं ही आनंद भोगता है और फिर भी निर्लिप्त रहता है।
14जिस किसी को वह चाहता है, उसको अपने नाम के साथ लगा लेता है।
15जिस किसी को वह चाहता है, उसको संसार का खेल खिलाता है।
16नानक का कथन है कि हे अनन्त ! हे अथाह ! हे गणना-रहित, अतुलनीय परमात्मा !
17जैसे तुम बुलाते हो, वैसे ही यह दास बोलता है॥ ८ ॥ २१॥
18श्लोक ॥
19हे जीव-जन्तुओं के पालनहार परमेश्वर ! तू स्वयं ही सर्वव्यापक है।
20हे नानक ! एक ईश्वर ही सर्वत्र व्यापक है। इसके अलावा दूसरा कोई कहाँ दिखाई देता है॥ १॥
21अष्टपदी II
22वह स्वयं ही वक्ता है और स्वयं ही श्रोता है।
23वह स्वयं ही एक है और स्वयं ही उसका विस्तार है।
24जब उसे भला लगता है तो वह सृष्टि की रचना कर देता है।
25अपनी इच्छानुसार वह इसे स्वयं में लीन कर देता है।
26हे परमात्मा ! तुम्हारे बिना कुछ भी किया नहीं जा सकता।
27तूने समूचे जगत् को एक सूत्र में पिरोया हुआ है।
28जिसे पूज्य परमेश्वर स्वयं ज्ञान देता है,
29वह मनुष्य सत्यनाम प्राप्त कर लेता है।
30वह समदर्शी तथा तत्वज्ञाता है।
31हे नानक ! वह समूचे जगत् को विजयी करने वाला है॥ १॥
32समस्त जीव-जन्तु उस परमात्मा के वश में हैं।
33वह दीनदयालु एवं अनाथों का नाथ है।
34जिसकी परमात्मा रक्षा करता है, उसे कोई भी मार नहीं सकता।
35जिसे वह अपने हृदय से विस्मृत कर देता है, वह पूर्व ही मृत है।
36उसे छोड़कर कोई मनुष्य दूसरे के पास क्यों जाए?
37सबके सिर पर एक निरंजन प्रभु है।
38जिसके वश में प्राणी की समस्त युक्तियां हैं
39समझ ले कि वह भीतर एवं बाहर तेरे साथ है।
40उस गुणों के भण्डार, अनंत एवं अपार परमात्मा पर
41दास नानक सदैव बलिहारी जाता है॥ २॥
42दयालु परमात्मा हर जगह पर मौजूद है और
43समस्त जीवों पर कृपालु होता है।
44अपनी लीला वह स्वयं ही जानता है।
45अन्तर्यामी प्रभु सबमें समाया हुआ है।
46वह अनेक विधियों से जीवों का पोषण करता है।
47जिस किसी की भी उसने उत्पत्ति की है, वह उसका ध्यान करता रहता है।
48जो कोई भी भगवान को भला लगता है, उसे वह अपने साथ मिला लेता है।
49ऐसा भक्त हरि-प्रभु की भक्ति एवं गुणस्तुति करता है।
50हे नानक ! जिसने मन में श्रद्धा धारण करके भगवान को माना है,
51उसने एक सृष्टिकर्ता प्रभु को ही जाना है॥ ३॥
52जो भक्त भगवान के एक नाम में लगा है,
53उसकी आशा व्यर्थ नहीं जाती।
54सेवक को सेवा करनी ही शोभा देती है।
55प्रभु के हुक्म का पालन करके वह परम पद (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है।
56उसे इससे ऊपर और कोई भी विचार नहीं आता
57जिसके हृदय में निरंकार प्रभु बसता है।
58वह अपने बन्धन तोड़कर निर्वेर हो जाता है
59और दिन-रात गुरु के चरणों की पूजा-अर्चना करता है।
60वह इहलोक में सुखी एवं परलोक में आनंद-प्रसन्न होता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं