सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 290 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1वह ईश्वर क्यों विस्मृत हो, जिसने हमें सब कुछ दिया है।

2यह परमात्मा क्यों विस्मृत हो, जो जीवों के जीवन का आधार है।

3उस अकालपुरुष को क्यों भुलाएँ, जो गर्भ की अग्नि में हमारी रक्षा करता है।

4गुरु की कृपा से कोई विरला पुरुष ही इसको देखता है।

5उस ईश्वर को क्यों भुलाएँ, जो मनुष्य को पाप से बचाता है

6और स्वयं से जन्म-जन्मांतरों से बिछुड़े हुए को अपने साथ मिला लेता है ?

7पूर्ण गुरु ने मुझे यह वास्तविकता समझाई है।

8हे नानक ! उसने तो अपने प्रभु का ही ध्यान किया है॥ ४॥

9हे सज्जन, संतजनों ! यह कार्य करो।

10अन्य सबकुछ छोड़कर भगवान के नाम का जाप करो।

11भगवान के नाम का सिमरन करके सुख पाओ।

12आप भी नाम का जाप करो और दूसरों से भी नाम का जाप करवाओ।

13प्रभु की भक्ति द्वारा यह संसार सागर पार किया जाता है।

14भक्ति के बिना यह शरीर भस्म हो जाएगा।

15प्रभु का नाम सर्व कल्याण एवं सुखों का खजाना है,

16डूबता हुआ जीव भी इसमें सुख पा लेता है।

17समस्त दुखों का नाश हो जाता है।

18हे नानक ! गुणों के भण्डार के नाम का जाप करते रहो ॥ ५॥

19भगवान की प्रीति व प्रेम रस का चाव उत्पन्न हुआ है।

20मन-तन के भीतर यही स्वाद भर गया है।

21अपने नेत्रों से प्रभु के दर्शन करके मैं सुख पाता हूँ।

22संतों के चरण धोकर मेरा मन प्रसन्न हो गया है।

23भक्तजनों की आत्मा एवं शरीर में प्रभु की प्रीति विद्यमान है।

24कोई विरला पुरुष ही उनकी संगति प्राप्त करता है।

25हे ईश्वर ! दया करके हमें एक नाम-वस्तु प्रदान कीजिए (तांकि)

26गुरु की दया से तेरा नाम जप सकें।

27उसकी उपमा वर्णन नहीं की जा सकती

28हे नानक ! ईश्वर तो सर्वव्यापक है ॥ ६॥

29परमात्मा क्षमाशील एवं दीनदयालु है।

30वह भक्तवत्सल एवं सदैव कृपालु है।

31वह गोविन्द, गोपाल अनाथों का नाथ है।

32वह समस्त जीव-जन्तुओं का पोषण करता है।

33वह आदिपुरुष एवं सृष्टि का रचयिता है।

34वह भक्तजनों के प्राणों का आधार है।

35जो कोई भी उसका जाप करता है, वह पवित्र-पावन हो जाता है।

36वह अपने मन का प्रेम ईश्वर की भक्ति पर केन्द्रित करता है।

37हम गुणविहीन, नीच व मूर्ख है,

38नानक का कथन है कि हे सर्वशक्तिमान भगवान ! तुम्हारी शरण में आए हैं।॥ ७॥

39उसने तमाम स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त कर लिए हैं,

40जिस जीव ने एक क्षण भर के लिए भी भगवान की महिमा-स्तुति की है।

41वह अनेक राज्य, भोग-पदार्थ एवं उपलब्धियां प्राप्त करता है

42जिसके मन को हरि के नाम की कथा भली लगती है।

43वह अनेक प्रकार के भोजन, वस्त्र एवं संगीत का आनंद प्राप्त करता है

44जिसकी रसना सदैव हरि-परमेश्वर के नाम का जाप करती रहती है।

45उसके कर्म शुभ हैं, उसी को शोभा मिलती है और वही धनवान है

46जिसके हृदय में पूर्ण गुरु का मंत्र बसता है।

47हे ईश्वर ! अपने संतों की संगति में स्थान दीजिए।

48हे नानक ! सत्संगति में रहने से सर्व सुखों का आलोक हो जाता है॥ ८ ॥ २० ॥

49श्लोक ॥

50निरंकार प्रभु स्वयं ही सर्गुण एवं निर्गुण है। वह स्वयं ही शून्य समाधि में रहता है।

51हे नानक ! निरंकार प्रभु ने स्वयं ही सृष्टि-रचना की है और फिर स्वयं ही (जीवों द्वारा) जाप करता है॥ १॥

52अष्टपदी।

53जब इस सृष्टि का प्रसार कुछ भी दिखाई नहीं देता था,

54तब पाप अथवा पुण्य किस (प्राणी) से हो सकता था ?

55जब परमात्मा स्वयं शून्य समाधि में था,

56तब वैर-विरोध कोई किससे करता था।

57जब (दुनिया का) कोई वर्ण अथवा चिन्ह दिखाई नहीं देता था,

58बताओ तब हर्ष एवं शोक किसे स्पर्श कर सकते थे।

59जब पारब्रह्म स्वयं ही सब कुछ था,

60तब मोह कहाँ हो सकता था और दुविधा किसे हो सकती थी ?

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं