सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 28 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji

1यह मानव-जन्म रूपी पदार्थ पाकर जो जीव एकाग्रचित होकर प्रभु-नाम को स्मरण नहीं करता।

2वह श्वास रूपी पांव फिसलने के कारण इस संसार में भी नहीं रहता और उसे परलोक में भी ठिकाना नहीं मिलता।

3फिर यह मानव-जन्म का समय हाथ नहीं लगता तथा अंत में प्रायश्चित करता हुआ इस संसार से चला जाता है।

4जिन पर परमेश्वर की कृपा होती है, वे परमात्मा में लिवलीन होकर आवागमन के चक्र से बच जाते हैं।॥ ४॥

5एक-दूसरे को देख कर तो सभी नाम-सुमिरन करने लगते हैं, लेकिन स्वेच्छाचारी इसे समझ नहीं पाता।

6जिन गुरुमुख जीवों का हृदय पवित्र है, उनकी उपासना सफल होती है।

7ऐसे जीव कीर्तन द्वारा हरि का गुणगान करते हैं और धर्म-ग्रंथों में हरि के गुणों को पढ़ते हैं तथा हरि के गुणों को गाते हुए उसी में समाधिस्थ हो जाते हैं।

8नानक देव जी कथन करते हैं कि जो जीव प्रभु-नाम में लिवलीन रहते हैं, उनकी वाणी सदा सत्य होती है॥ ५॥ ४॥ ३७ ॥

9श्रीरागु महला ३ ॥

10जिन्होंने भी गुरु उपदेशानुसार एकाग्र मन से प्रभु के नाम का सुमिरन किया है।

11इस सत्य स्वरूप परमात्मा के दरबार में उनके मुँह सदा उज्ज्वल होते हैं, अर्थात् वे प्रभु दरबार में सम्मानित होते हैं।

12वे ही गुरुमुख जीव सत्य नाम के साथ प्रीत करके सदैव ब्रह्मानंद रूपी अमृत-पान करते हैं। १॥

13हे भाई ! गुरुमुख जीवों का सदा सम्मान होता है।

14हरि प्रभु का नाम-सुमिरन सदा करें तो वह अहंकार रूपी मैल हृदय से धोकर निकाल देता है॥ १॥ रहाउ॥

15स्वेच्छाचारी जीव नाम-सुमिरन के बारे में नहीं जानता तथा नाम-सुमिरन के बिना सम्मान नष्ट हो जाता है।

16ऐसे जीवों को द्वैत-भाव में लिप्त होने के कारण गुरु-शिक्षा का रस अनुभव नहीं होता।

17जिस प्रकार विष्ठा के कीड़े विष्ठा में ही पड़े रहते हैं, और वही पर ही मर जाते हैं (उसी प्रकार स्वेच्छाचारी जीव भी विषय-विकारों की गंदगी में लिप्त रह कर अंत में नरकों की गंदगी में समा जाता है) ॥ २॥

18उन जीवों का जन्म सफल है जो सतिगुरु के विचारानुसार चलते हैं।

19वह स्वयं ही मुक्त नहीं होते, बल्कि अपने कई कुटुम्ब भी मुक्त कर लेते हैं, ऐसे जीवों की जन्मदात्री माँ धन्य है।

20सो हे भाई ! परम पिता परमेश्वर का नाम-सुमिरन करो, किन्तु नाम सुमिरन भी वही जीव कर सकता है, जिस पर वह परमात्मा कृपा करता है॥ ३॥

21जिन गुरुमुख जीवों ने अहं-भाव त्याग कर नाम-सुमिरन किया है।

22वे अन्दर-बाहर से (अंतर्मन व तन से) निर्मल हैं और निश्चित ही उस सत्य स्वरूप परमात्मा में अभेद हो रहे हैं।

23नानक देव जी कथन करते हैं कि उन गुरुमुख जीवों का संसार में आना स्वीकृत है, जिन्होंने गुरु की शिक्षा द्वारा प्रभु का नाम-सुमिरन किया है॥ ४॥ ५॥ ३८॥

24श्रीरागु महला ३ ॥

25हरि भक्तों के पास हरि की नाम रूपी पूंजी है और वे गुरु से पूछ कर नाम का व्यापार करते हैं,

26वे सदैव परमात्मा का नाम स्मरण करते हैं और वे हरिनाम रूपी सौदे के आश्रय में ही रहते हैं।

27पूर्ण गुरु ने उन्हें परमात्मा का नाम दृढ़ करवाया है, इसलिए उनका अक्षय भण्डार नाम ही है॥ १॥

28हे भाई ! इस चंचल मन को समझाओ।

29यह आलस्य क्यों करता है, गुरु के द्वारा इस मन को नाम-स्मरण में लीन करो ॥ १॥ रहाउ॥

30यदि कोई जीव गुरु उपदेश द्वारा चिन्तन करे कि हरि भक्ति क्या है? तो प्रत्युत्तर है कि हरि-भक्ति हरि—परमेश्वर का प्रेम है।

31छल-कपट करने से भक्ति नहीं हो सकती, छल-कपट से किए वचन दुविधापूर्ण अर्थात् द्वैत-भाव वाले होते हैं, जो जीव को अपमानित करते हैं।

32जिसके अंतर्मन में ज्ञान-विवेक होता है, वह गुरुमुख जीव किसी के मिलाने से नहीं मिलता ॥ २॥

33वही जीव परमेश्वर का सेवक कहलाता है, जो प्रायः परमात्मा को हृदय में धारण करके रखता है।

34इसके अतिरिक्त अंतर्मन से अहंत्व का त्याग करके अपना तन-मन उस परमात्मा को अर्पित कर देता है।

35वह गुरुमुख जीव धन्य एवं परमात्मा के द्वार पर स्वीकृत होता है, जो विषय-विकारों के समक्ष कभी अपनी पराजय स्वीकार करके नहीं आता ॥ ३॥

36परमात्मा अपनी कृपा से ही किसी जीव को मिले तो उसे प्राप्त किया जा सकता, अन्यथा उसकी कृपा के बिना उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं