सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 288 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1सृष्टि की रचना करके प्रभु ने अपनी सत्ता टिकाई है।

2हे नानक ! मैं अनेक बार उस (प्रभु) पर कुर्बान जाता हूँ॥ ८॥ १८॥

3श्लोक ॥

4हे प्राणी ! भगवान के भजन के सिवाय कुछ भी साथ नहीं जाता, सभी विषय-विकार धूल समान हैं।

5हे नानक ! हरि-परमेश्वर के नाम-स्मरण की कमाई करना ही अति उत्तम धन है॥१॥

6अष्टपदी ॥

7संतजनों की संगति में मिलकर यही विचार करो।

8एक ईश्वर को स्मरण करो और नाम का सहारा लो।

9हे मेरे मित्र ! दूसरे तमाम प्रयास भुला दो।

10ईश्वर के चरण कमल अपने मन एवं हृदय में बसाओ।

11वह ईश्वर तमाम कार्य करने व जीव से करवाने में सामथ्र्य रखता है।

12ईश्वर के नाम रूपी वस्तु को दृढ़ करके पकड़ लो।

13इस (प्रभु के नाम रूपी) धन को एकत्रित करो और भाग्यशाली बन जाओ।

14संतजनों का मंत्र पवित्र-पावन है।

15एक ईश्वर की आशा अपने मन में रखो !

16हे नानक ! इस तरह तेरे तमाम रोग मिट जाएँगे।॥ १ ॥

17(हे मित्र !) जिस धन हेतु तू चारों ओर भागता-फिरता है,

18वह धन तुझे ईश्वर की सेवा से प्राप्त होगा।

19हे मेरे मित्र ! जिस सुख की तू नित्य इच्छा करता है,

20वह सुख तुझे संतों की संगति में प्रेम करने से मिलेगा।

21जिस शोभा के लिए तू शुभ कर्म करता है,

22वह शोभा भगवान की शरण में जाने से मिलती है।

23जो रोग अनेक प्रयासों से नहीं मिटता,

24वह रोग हरि नाम रूपी औषधि लेने से मिट जाता है।

25तमाम खजानों में ईश्वर का नाम सर्वश्रेष्ठ खजाना है।

26हे नानक ! उसके नाम का जाप कर, ईश्वर के दरबार में स्वीकार हो जाओगे॥ २ ॥

27अपने मन को भगवान के नाम द्वारा जगाओ।

28दसों दिशाओं में भटकता हुआ यह मन इस तरह अपने गृह आ जाएगा।

29उसे कोई संकट नहीं आता

30जिसके ह्रदय में वह ईश्वर बसता है,

31यह कलियुग गर्म (अग्नि) है और हरि का नाम शीतल है।

32उसे सदैव स्मरण करो एवं सुख पाओ।

33नाम-सिमरन से भय नाश हो जाता है और आशा पूर्ण हो जाती है।

34प्रभु की भक्ति के साथ प्रेम करने से आत्मा उज्ज्वल हो जाती है।

35जो नाम-स्मरण करता है, उसके हृदग-घर में अनश्वर प्रभु आ बसता है।

36हे नानक ! (नाम का जाप करने से) यम की फाँसी कट जाती है॥ ३॥

37वो ही सच्चा मनुष्य है, जो सार-तत्व के स्मरण का उपदेश देता है।

38वह बिल्कुल कच्चा (झूठा) है, जो आवागमन (जन्म-मरण के चक्र) में पड़ता है।

39प्रभु की सेवा से आवागमन मिट जाता है।

40अपना अहंत्व त्याग दे और गुरदेव की शरण ले।

41इस तरह अनमोल जीवन का उद्धार हो जाता है।

42हरि-परमेश्वर की आराधना कर, जो तेरे प्राणों का आधार है।

43अनेक उपाय करने से छुटकारा नहीं होता।

44चाहे स्मृतियों, शास्त्रों व वेदों का विचार करके देख लो।

45मन लगाकर केवल भगवान की भक्ति ही करो।

46हे नानक ! (जो भक्ति करता है) उसे मनोवांछित फल मिलता है॥४॥

47धन-दौलत तेरे साथ नहीं जाने वाला,

48फिर हे मूर्ख मन ! तू क्यों इससे लिपटा हुआ है।

49पुत्र, मित्र, परिवार एवं पत्नी -

50इन में से तू बता कौन तेरा सहायक है ?

51राज्य, रंगरलियां एवं धन-दौलत का विस्तार

52इनमें से बता कौन कब बचा है ?

53अश्व, हाथी एवं रथों की सवारी करनी -

54यह सब झूठा आडम्बर है।

55मूर्ख पुरुष उस परमात्मा को नहीं जानता, जिसने ये तमाम पदार्थ दिए हैं।

56हे नानक ! नाम को भुला कर प्राणी अन्त में पश्चाताप करता है॥ ५ ॥

57हे मूर्ख मनुष्य ! तू गुरु की शिक्षा ले।

58प्रभु की भक्ति के बिना बड़े बुद्धिमान लोग भी डूब गए हैं।

59हे मेरे मित्र ! अपने मन में भगवान की भक्ति कर,

60उससे तेरा मन निर्मल हो जाएगा।

61प्रभु के चरण कमल अपने हृदय में बसा,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं