सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 287 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1हे नानक ! जिस पर गुरु जी स्वयं कृपा करते हैं,

2वह सेवक गुरु की शिक्षा प्राप्त करता है॥ २॥

3जो सेवक अपने गुरु का मन पूर्णतया जीत लेता है,

4वह परमेश्वर की गति को जान लेता है।

5सतिगुरु वही है, जिसके हृदय में हरि का नाम है।

6मैं अनेक बार अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ।

7गुरु जी प्रत्येक पदार्थ के खजाने एवं जीवन प्रदान करने वाले हैं।

8वह आठ प्रहर ही पारब्रह्म के रंग में मग्न रहते हैं।

9भक्त ब्रह्म में बसता है और पारब्रह्म भक्त में बसता है।

10प्रभु केवल एक ही है इसमें कोई सन्देह नहीं।

11हे नानक ! हजारों ही चतुराइयों द्वारा गुरु प्राप्त नहीं होता,

12ऐसा गुरु बड़े भाग्य से ही मिलता है॥ ३ ॥

13गुरु का दर्शन फल प्रदान करने वाला है तथा दर्शन-मात्र से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है।

14उनके चरण स्पर्श करने से मनुष्य की अवस्था एवं जीवन-आचरण निर्मल हो जाते हैं।

15गुरु की संगति करने से प्राणी राम की गुणस्तुति करता है

16और पारब्रह्म के दरबार में पहुँच जाता है।

17गुरु के वचन सुनने से कान तृप्त हो जाते हैं तथा

18मन में संतोष आ जाता है और आत्मा तृप्त हो जाती है।

19गुरु पूर्ण पुरुष हैं और उनका मंत्र सदैव अटल है।

20जिसे वह अपनी अमृत दृष्टि से देखते हैं, वह संत बन जाता है।

21गुरु के गुण अनन्त हैं, जिसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

22हे नानक ! ईश्वर को जो प्राणी अच्छा लगता है, उसे वह गुरु से मिला देता है। ४॥

23जिव्हा एक है परन्तु ईश्वर के गुण अनन्त हैं।

24वह सद्पुरुष पूर्ण विवेक वाला है। किसी भी वचन द्वारा प्राणी ईश्वर के गुणों तक पहुँच नहीं सकता।

25प्रभु अगम्य, अगोचर एवं पवित्र पावन है।

26प्रभु को भोजन की आवश्यकता नहीं, वह वैर-रहित एवं सुख प्रदान करने वाला है।

27कोई भी प्राणी उसका मूल्यांकन नहीं कर पाया।

28अनेकों भक्त नित्य उसकी वन्दना करते रहते हैं।

29उसके चरण कमलों को वह अपने हृदय में स्मरण करते हैं।

30हे नानक ! अपने सतिगुरु पर हमेशा बलिहारी जाता हूँ,

31जिनकी कृपा से वह ऐसे प्रभु का नाम-स्मरण करता है॥ ५ ॥

32यह हरि रस किसी विरले पुरुष को ही प्राप्त होता है।

33जो इस अमृत का पान करता है, वह अमर हो जाता है।

34उस पुरुष का कभी नाश नहीं होता, जिसके हृदय में गुणों का भण्डार प्रकट हो जाता है।

35आठ पहर ही वह हरि का नाम लेता है और

36अपने सेवक को सच्चा उपदेश प्रदान करता है।

37मोह-माया के साथ उसका कभी मेल नहीं होता।

38वह अपने ह्रदय में एक हरि-परमेश्वर को ही बसाता है।

39अज्ञानता रूपी अन्धेरे में उसके लिए नाम रूपी दीपक रौशन हो जाता है।

40हे नानक ! दुविधा, मोह एवं दुःख उससे दूर भाग जाते हैं।॥ ६॥

41गुरु के पूर्ण उपदेश ने मोह-माया की अग्नि में शीतलता प्रविष्ट करा दी है,

42प्रसन्नता उत्पन्न हो गई है व दुःख दूर हो गया है

43जन्म-मरण का भय मिट गया है।

44गुरु के पूर्ण उपदेश से

45भय नाश हो गया है और निडर रहते हैं।

46तमाम रोग नष्ट होकर मन से लुप्त हो गए हैं।

47जिस गुरु के थे, उसने कृपा की है,

48सत्संगति में यह मुरारी के नाम का जाप करता है।

49भय एवं दुविधा मिट गए हैं।

50हे नानक ! हरि-परमेश्वर की महिमा कानों से सुनकर शांति मिल गई है ॥ ७॥

51वह स्वयं निर्गुण स्वामी है और वह ही सर्गुण है,

52जिसने अपनी कला (शक्ति) प्रकट करके समूचे विश्व को मुग्ध किया हुआ है।

53अपने कौतुक प्रभु ने स्वयं ही रचे हैं।

54अपना मूल्यांकन वह स्वयं ही जानता है।

55ईश्वर के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं।

56सबके भीतर वह अकालपुरुष स्वयं ही मौजूद है।

57ताने-बाने की तरह वह तमाम रूप-रंगों में समा रहा है।

58संतों की संगति करने से वह प्रगट हो जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं