सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 286 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1उसको वह अपना हाथ देकर बचा लेता है।

2मनुष्य अनेक विधियों से यत्न करता है,

3परन्तु उसके काम असफल हो जाते हैं।

4ईश्वर के अलावा दूसरा कोई मार अथवा बचा नहीं सकता।

5समस्त जीव-जन्तुओं का परमात्मा ही रखवाला है।

6हे नश्वर प्राणी ! तुम क्यों चिन्ता करते हो ?

7हे नानक ! अलक्ष्य एवं आश्चर्यजनक परमात्मा को स्मरण कर॥ ५ ॥

8बार-बार ईश्वर के नाम का जाप करना चाहिए।

9नाम-अमृत पीकर यह मन एवं शरीर तृप्त हो जाते हैं।

10जिस गुरमुख को नाम-रत्न प्राप्त हुआ है,

11वह ईश्वर के अलावा किसी दूसरे को नहीं देखता।

12नाम उसका धन है और नाम ही उसका रूप, रंग है।

13नाम उसका सुख है और हरि का नाम ही उसका साथी होता है।

14जो मनुष्य नाम-अमृत से तृप्त हो जाते हैं,

15उनकी आत्मा एवं शरीर केवल नाम में ही लीन हो जाते हैं।

16हे नानक ! उठते-बैठते, सोते हुए

17सदैव ईश्वर का नाम-स्मरण ही सेवकों का काम होता हैII ६ ॥

18अपनी जिव्हा से दिन-रात परमेश्वर की गुणस्तुति करो।

19यह देन परमेश्वर ने अपने सेवक को प्रदान की है।

20वह मन के उत्साह से भक्ति करता है

21और अपने प्रभु में ही लीन रहता है।

22वह जो कुछ हो रहा है, भगवान की इच्छा से सहर्ष जानता है

23और अपने प्रभु के हुक्म को पहचानता है।

24उसकी महिमा कोन वर्णन कर सकता है ?

25उसकी एक प्रशंसा को भी मैं वर्णन करना नहीं जानता।

26जो सारा दिन प्रभु की उपस्थिति में बसते हैं,

27हे नानक ! वह पूर्ण पुरुष हैं।॥ ७ ॥

28हे मेरे मन ! तू उनकी शरण ले।

29अपना मन एवं तन उन पुरुषों को समर्पित कर दे।

30जिस पुरुष ने अपने प्रभु को पहचान लिया है,

31वह मनुष्य समस्त वस्तुएँ देने वाला है।

32उसकी शरण में तुम्हें सर्व सुख मिल जाएँगे।

33उसके दर्शन द्वारा समस्त पाप नाश हो जाएँगे।

34दूसरी चतुराई त्याग कर

35प्रभु के उस सेवक की सेवा में स्वयं को लगा ले।

36तेरा आवागमन मिट जाएगा।

37हे नानक ! सदैव ही उस सेवक के चरणों की पूजा करो ॥ ८ ॥ १७ ॥

38श्लोक॥

39जिसने सत्यस्वरूप परमात्मा को जान लिया है, उसका नाम सतिगुरु है।

40हे नानक ! उसकी संगति में ईश्वर की गुणस्तुति करने से उसका शिष्य भी पार हो जाता है॥ १॥

41अष्टपदी।

42सतिगुरु अपने शिष्य का पालन-पोषण करता है।

43अपने सेवक पर गुरु जी हमेशा दयालु रहते हैं।

44गुरु अपने शिष्य की मन्दबुद्धि रूपी मैल को साफ कर देते हैं।

45गुरु के उपदेश द्वारा वह हरि के नाम का जाप करता है।

46सतिगुरु अपने शिष्य के बन्धन काट देते हैं।

47गुरु का शिष्य विकारों से हट जाता है।

48सतिगुरु अपने शिष्य को ईश्वर-नाम रूपी धन प्रदान करते हैं।

49गुरु का शिष्य बड़ा भाग्यशाली है।

50सतिगुरु अपने शिष्य का इहलोक एवं परलोक संवार देते हैं।

51हे नानक ! सतिगुरु अपने शिष्य को अपने हृदय से लगाकर रखता है ॥ १ ॥

52जो सेवक गुरु के घर में रहता है,

53वह गुरु की आज्ञा सहर्ष मन में स्वीकार करता है।

54वह अपने आपको बड़ा नहीं जतलाता।

55वह अपने हृदय में हमेशा ही हरि-परमेश्वर के नाम का ध्यान करता रहता है।

56जो अपना मन सतिगुरु के समक्ष बेच देता है,

57उस सेवक के तमाम कार्य संवर जाते हैं।

58जो सेवक निष्काम भावना से गुरु की सेवा करता है,

59वह प्रभु को पा लेता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं