सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 285 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1जिसकी यह सृष्टि है, वही उसका सृजनहार है।

2कोई दूसरा उसको नहीं समझता, चाहे वह कैसे विचार करे।

3करतार का विस्तार, उसका उत्पन्न किया हुआ जीव नहीं जान सकता।

4हे नानक ! जो कुछ उसे लुभाता है, केवल वही होता है। ७॥

5प्रभु के अद्भुत, आश्चर्यजनक कौतुक देखकर मैं चकित हो गया हूँ।

6जो प्रभु की महिमा को समझता है, वही आनन्द प्राप्त करता है।

7प्रभु के सेवक उसके प्रेम में लीन रहते हैं।

8गुरु के उपदेश द्वारा वह (नाम) पदार्थ को प्राप्त कर लेते हैं।

9वह दानी एवं दुःख दूर करने वाले हैं।

10उनकी संगति में संसार का कल्याण हो जाता है।

11ऐसे सेवकों का सेवक सौभाग्यशाली है।

12उसके सेवक की संगति में मनुष्य की वृति एक ईश्वर से लग जाती है।

13प्रभु का सेवक उसकी गुणस्तुति एवं भजन गायन करता है।

14हे नानक ! गुरु की कृपा से वह फल प्राप्त कर लेता है॥ ८॥ १६॥

15श्लोक II

16भगवान सृष्टि-रचना से पहले सत्य था, युगों के प्रारम्भ में भी सत्य था,

17अब वर्तमान में उसी का अस्तित्व है। हे नानक ! भविष्य में भी उस सत्यस्वरूप भगवान का अस्तित्व होगा II १II

18अष्टपदी॥

19प्रभु के चरण सत्य हैं और सत्य है वह जो उसके चरण-स्पर्श करता है।

20उसकी पूजा सत्य है एवं उसकी पूजा करने वाला भी सत्य है।

21उसके दर्शन सत्य हैं और दर्शन करने वाला भी सत्य है।

22उसका नाम सत्य है और वह भी सत्य है जो इसका ध्यान करता है।

23वह स्वयं सत्यस्वरूप है, सत्य है वह प्रत्येक वस्तु जिसे उसने सहारा दिया हुआ है।

24वह स्वयं ही गुण है और स्वयं ही गुणकारी है।

25प्रभु की वाणी सत्य है और वह सत्य वक्ता है।

26वह कान सत्य हैं जो सद्पुरुष का यशोगान सुनते हैं।

27जो प्रभु को समझता है, उसके लिए सब सत्य ही है।

28हे नानक ! वह प्रभु सदा सर्वदा सत्य है॥ १॥

29जो मनुष्य अपने हृदय में सत्यस्वरूप परमात्मा पर आस्था धारण करता है,

30वह सब कुछ करने वाले एवं कराने वाले (सृष्टि के) मूल को समझ लेता है।

31जिसके ह्रदय में प्रभु का विश्वास प्रवेश कर गया है,

32उसके मन में तत्व ज्ञान प्रत्यक्ष होता है।

33डर को त्याग कर वह निडर होकर बसता है

34और जिससे वह उत्पन्न हुआ था, उस में ही समा जाता है।

35जब एक वस्तु अपनी प्रकार की दूसरी वस्तु से मिल जाती है

36तो वह इससे भिन्न नहीं कही जा सकती।

37इस विचार को कोई सूझवान ही समझता है।

38हे नानक ! जो प्राणी नारायण से मिल चुके हैं, वे उसके साथ एक हो चुके हैं।॥ २॥

39भगवान का सेवक उसका आज्ञाकारी होता है।

40भगवान का सेवक सदा उसकी ही पूजा करता रहता है।

41ईश्वर के सेवक के मन में आस्था होती है।

42प्रभु के सेवक का जीवन-आचरण पवित्र होता है।

43प्रभु का सेवक जानता है कि उसका स्वामी सदैव उसके साथ है।

44परमेश्वर का सेवक उसके नाम की प्रीति में बसता है।

45अपने सेवक का प्रभु पालन-पोषणहार है।

46निरंकार प्रभु अपने सेवक की प्रतिष्ठा रखता है।

47वही सेवक है, जिस पर प्रभु दया करता है।

48हे नानक ! वह सेवक प्रत्येक श्वास से ईश्वर को स्मरण करता रहता है ॥ ३ ॥

49परमात्मा अपने सेवक का पद रखता है।

50वह अपने सेवक की निश्चित ही प्रतिष्ठा रखता है।

51प्रभु अपने सेवक को मान-सम्मान प्रदान करता है।

52अपने सेवक से वह अपने नाम का जाप करवाता है।

53अपने सेवक की वह स्वयं ही लाज रखता है।

54उसकी गति एवं अनुमान को कोई नहीं जानता।

55कोई भी व्यक्ति प्रभु के सेवक की बराबरी नहीं कर सकता।

56ईश्वर के सेवक सर्वोच्च हैं।

57प्रभु जिसको अपनी सेवा में लगाता है,

58हे नानक ! वह सेवक दसों दिशाओं में लोकप्रिय हो जाता है ॥ ४ ॥

59यदि प्रभु छोटी-सी चींटी में शक्ति भर दे तो

60वह लाखों, करोड़ों लश्करों को भस्म बना सकती है।

61जिस प्राणी का श्वास परमेश्वर स्वयं नहीं निकालता,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं