गुरु ग्रंथ साहिब 284 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1नानक के मन में यही अभिलाषा है ॥ १॥
2भगवान मनोकामना पूर्ण करने वाला एवं शरण देने योग्य है।
3जो कुछ ईश्वर ने अपने हाथ से लिख दिया है, वही होता है।
4वह पलक झपकते ही सृष्टि की रचना एवं विनाश कर देता है।
5दूसरा कोई उसके भेद को नहीं जानता।
6वह प्रसन्नता का रूप है एवं उसके मन्दिर में सदैव मंगल-खुशियाँ हैं।
7मैंने सुना है कि समस्त पदार्थ उसके घर में मौजूद हैं।
8राजाओं में वह महान राजा एवं योगीयों में महायोगी है।
9तपस्वियों में वह महान तपस्वी है और गृहस्थियों में भी स्वयं ही गृहस्थी है।
10उस एक ईश्वर का ध्यान करने से भक्तजनों ने सुख प्राप्त कर लिया है।
11हे नानक ! उस परमात्मा का किसी ने भी अन्त नहीं पाया ॥ २ ॥
12जिस भगवान की (सृष्टि-रूपी) लीला का कोई अंत नहीं,
13उसे खोज-खोजकर देवता भी थक चुके हैं।
14चूंकि अपने पिता के जन्म बारे पुत्र क्या जानता है ?
15सारी सृष्टि ईश्वर ने अपने (हुक्म रूपी) धागे में पिरोई हुई है।
16जिन्हें प्रभु सुमति, ज्ञान एवं ध्यान प्रदान करता है, उसके सेवक एवं दास उसका ही ध्यान करते रहते हैं।
17जिसको प्रभु माया के तीन गुणों में भटकाता है,
18वह जन्मता-मरता रहता है और आवागमन के चक्र में पड़ा रहता है।
19ऊँच-नीच सब उसके ही स्थान हैं।
20हे नानक ! जैसी सूझ वह देता है, वैसे ही सूझ वाला प्राणी बन जाता हैII ३ll
21ईश्वर के अनेक रूप हैं और अनेक उसके रंग हैं।
22अनेक वेष धारण करते हुए वह फिर भी एक ही रहता है।
23उसने विभिन्न विधियों से अपनी सृष्टि का प्रसार किया हुआ है।
24अनश्वर प्रभु जो एक ही है,
25एक क्षण में वह विभिन्न खेल रच देता है।
26पूर्ण प्रभु समस्त स्थानों में समा रहा है।
27अनेक विधियों से उसने सृष्टि-रचना की है।
28अपना मूल्यांकन उसने स्वयं ही पाया है।
29समस्त हृदय उसके हैं और उसके ही समस्त स्थान हैं।
30हे नानक ! मैं हरि का नाम जप-जप कर ही जीता हूँ॥ ४॥
31ईश्वर नाम ने ही समस्त जीव-जन्तुओं को सहारा दिया हुआ है।
32धरती के खण्ड एवं ब्रह्माण्ड ईश्वर नाम ने ही टिकाए हुए हैं।
33ईश्वर के नाम ने ही स्मृतियों, वेदों एवं पुराणों को सहारा दिया हुआ है।
34नाम के सहारे द्वारा प्राणी ज्ञान एवं मनन बारे सुनते हैं।
35परमेश्वर का नाम ही आकाशों एवं पातालों का सहारा है।
36ईश्वर का नाम समस्त शरीरों का सहारा है।
37तीनों भवन एवं चौदह लोक ईश्वर के नाम ने टिकाए हुए हैं।
38नाम की संगति करने एवं कानों से इसको श्रवण करने से मनुष्य पार हो गए हैं।
39जिस पर प्रभु कृपा धारण करके अपने नाम के साथ मिलाता है,
40हे नानक ! वह मनुष्य चतुर्थ स्थान में पहुँचकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ ५॥
41जिस भगवान का रूप सत्य है, उसका निवास भी सत्य है।
42केवल वह सद्पुरुष ही प्रधान है।
43उसके करतब सत्य हैं और उसकी वाणी सत्य है।
44सत्यस्वरूप प्रभु सब में समाया हुआ है।
45उसके कर्म सत्य हैं और उसकी सृष्टि भी सत्य है।
46उसका मूल सत्य है एवं जो कुछ उससे उत्पन्न होता है, वह भी सत्य है।
47उसकी करनी सत्य है और पवित्र से भी पवित्र है।
48भगवान जिसे समझाता है, उसे सब भला ही लगता है।
49प्रभु का सत्यनाम सुख देने वाला है।
50हे नानक ! (प्राणी को) यह सच्चा विश्वासगुरु से मिलता है॥ ६ ॥
51साधु का उपदेश सत्य वचन हैं।
52वे पुरुष सत्य हैं, जिनके हृदय में सत्य प्रवेश करता है।
53यदि कोई व्यक्ति सत्य को समझे और प्रेम करे,
54तो नाम जपने से उसकी गति हो जाती है।
55प्रभु स्वयं सत्यस्वरूप है और उसका किया सब सत्य है।
56वह स्वयं ही अपने अनुमान एवं अवस्था को जानता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं