गुरु ग्रंथ साहिब 278 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1बहुरूपिए की भाँति वह अत्याधिक रूप धारण करता हुआ भी दिखाई देता है।
2जिस तरह प्रभु को उपयुक्त लगता है, वैसे ही नचाता है
3जैसे उसको अच्छा लगता है, वही होता है।
4हे नानक ! उसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं ॥ ७॥
5यह जीव कभी सत्संगति को पाता है तो
6उस (पवित्र) स्थान से दोबारा वह लौटकर नहीं आता।
7उसके हृदय में ज्ञान का प्रकाश होता है।
8उस निवास का कभी विनाश नहीं होता।
9जिसका मन एवं तन ईश्वर के नाम एवं प्रेम में मग्न रहता हैं।
10यह हमेशा ही परमात्मा के संग बसता है।
11जैसे जल आकर जल में ही मिल जाता है,
12वैसे ही उसकी ज्योति परम ज्योति में लीन हो जाती है।
13उसका आवागमन (जन्म-मरण) मिट जाता है और वह सुख पा लेता है।
14हे नानक ! ऐसे प्रभु पर मैं सदैव कुर्बान जाता हूँ॥ ८ ॥ ११॥
15श्लोक ॥
16विनग्न स्वभाव वाला पुरुष सुख में रहता है। वह अपने अहंकार को त्याग कर विनीत हो जाता है।
17(परन्तु) हे नानक ! बड़े-बड़े अहंकारी इन्सान अपने अहंकार में ही नाश हो जाते हैं।॥ १॥
18अष्टपदी।
19जिस व्यक्ति के हृदय में शासन का अभिमान होता है,
20ऐसा व्यक्ति नरक में पड़ने वाला कुत्ता होता है।
21जो पुरुष अहंकार में अपने आपको अति सुन्दर (यौवन सम्पन्न) समझता है,
22वह विष्टा का कीड़ा होता है।
23जो व्यक्ति स्वयं को शुभकर्मों वाला कहलाता है,
24वह जन्म-मरण के चक्र में फंसकर अधिकतर योनियों में भटकता रहता है।
25जो प्राणी अपने धन एवं भूमि का घमण्ड करता है,
26वह मूर्ख, अन्धा एवं अज्ञानी है।
27जिस इन्सान के हृदय में प्रभु कृपा करके विनम्रता बसा देता है,
28हे नानक ! ऐसा इन्सान इहलोक में मोक्ष तथा परलोक में सुख प्राप्त करता है॥ १॥
29जो आदमी धनवान होकर अपने धन का अभिमान करता है,
30एक तिनके के बराबर भी कुछ उसके साथ नहीं जाता।
31जो आदमी बहुत बड़ी सेना एवं लोगों पर आशा लगाए रखता है,
32उसका एक क्षण में ही नाश हो जाता है।
33जो आदमी अपने आपको सबसे शक्तिशाली समझता है,
34वह एक क्षण में भस्म हो जाता है।
35जो आदमी अपने अहंकार में किसी की भी परवाह नहीं करता,
36यमराज अन्त में उसे बड़ा दुःख देता है।
37हे नानक ! गुरु की कृपा से जिस इन्सान का अभिमान मिट जाता है,
38ऐसा इन्सान ही प्रभु के दरबार में स्वीकार होता है॥ २॥
39यदि व्यक्ति करोड़ों शुभ कर्म करता हुआ अभिमान करे,
40तो वह दुःख ही उठाता है, उसके तमाम कार्य व्यर्थ हो जाते हैं।
41जो व्यक्ति अनेक तपस्या करके अहंकार करता है,
42वह पुनः पुनः नरक-स्वर्ग में जन्म लेता रहता है।
43जिसका हृदय अधिकतर यत्न करने के बावजूद भी विनम्र नहीं होता,
44तो बताओ, वह पुरुष भगवान के दरबार में कैसे जा सकता है?
45जो पुरुष अपने आपको भला कहलाता है,
46भलाई उसके निकट नहीं आती।
47हे नानक ! जिसका मन सबकी चरण-धूलि बन जाता है,
48उसकी निर्मल शोभा होती है॥ ३॥
49जब तक इन्सान यह समझने लगता है कि मुझे से कुछ हो सकता है,
50तब तक उसको कोई सुख उपलब्ध नहीं होता।
51जब तक इन्सान यह समझने लगता है कि मैं कुछ करता हूँ,
52तब तक वह गर्भ की योनियों में भटकता रहता है।
53जब तक इन्सान किसी को शत्रु एवं किसी को मित्र समझता है,
54तब तक उसका मन स्थिर नहीं होता।
55जब तक इन्सान माया के मोह में मग्न रहता है,
56तब तक यमराज उसको दण्डित करता रहता है।
57प्रभु की कृपा से इन्सान के बन्धन टूट जाते हैं।
58हे नानक ! गुरु की कृपा से अहंकार मिट जाता है॥ ४॥
59इन्सान हजारों कमा कर भी लाखों के लिए भाग-दौड़ करता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं