सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 275 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1उसका नाम सत्य ही रामदास है।

2उसे अपंने अन्तर में ही राम दिखाई दे गया है।

3सेवकों का सेवक होने के स्वभाव से उसने ईश्वर को पाया है।

4जो हमेशा ही भगवान को अपने निकट समझता है,

5वह सेवक प्रभु के दरबार में स्वीकार होता है।

6ईश्वर अपने सेवक पर स्वयं कृपा-दृष्टि करता है

7और उस सेवक को समूचा ज्ञान हो जाता है।

8समूचे परिवार में (रहता हुआ भी) वह मन से निर्लिप्त रहता है,

9हे नानक ! ऐसी जीवन-युक्ति वाला रामदास होता है॥ ६॥

10जो प्रभु की आज्ञा को सच्चे मन से मानता है,

11वही जीवन मुक्त कहलाता है।

12उसके लिए सुख एवं दुःख एक समान होते हैं।

13उसे हमेशा ही आनंद मिलता है और कोई वियोग नहीं होता।

14सोना तथा मिट्टी भी उस पुरुष के लिए एक समान हैं,

15उसके लिए अमृत एवं खट्टा विष भी एक समान है।

16उसके लिए मान एवं अभिमान भी एक समान है।

17रंक तथा राजा भी उसकी नजर में बराबर हैं।

18जो भगवान करता है, वही उसकी जीवन-युक्ति होती है।

19हे नानक ! वह पुरुष ही जीवन मुक्त कहा जाता है॥ ७ ॥

20परमात्मा के ही समस्त स्थान हैं।

21जिस-जिस स्थान पर ईश्वर प्राणियों को रखता है, वैसा ही वह नाम धारण कर लेते हैं।

22भगवान स्वयं ही सब कुछ करने और (प्राणियों से) करवाने में समर्थ है।

23जो परमात्मा को भला लगता है, वही होता है

24परमात्मा ने अपने आपको अनन्त लहरों में मौजूद होकर फैलाया हुआ है।

25परमात्मा के कौतुक जाने नहीं जा सकते।

26परमात्मा जैसी बुद्धि प्रदान करता है, वैसा ही प्रकाश होता है।

27सृष्टिकर्ता परमात्मा अनश्वर है।

28ईश्वर हमेशा ही दयालु है।

29हे नानक ! उस परमात्मा का सिमरन करके कितने ही जीव कृतार्थ हो गए हैं। ८॥ ६॥

30श्लोक ॥

31बहुत सारे मनुष्य प्रभु की गुणस्तुति करते रहते हैं, परन्तु परमात्मा के गुणों का कोई ओर-छोर नहीं मिलता।

32हे नानक ! परमात्मा ने जो यह सृष्टि-रचना की है, वह अनेक प्रकार की होने के कारण बहुत सारी विधियों से रची है॥ १॥

33अष्टपदी ॥

34कई करोड़ जीव उसकी पूजा करने वाले हुए हैं।

35कई करोड़ धार्मिक एवं सांसारिक आचरण-व्यवहार करने वाले हुए हैं।

36कई करोड़ जीव तीर्थो के निवासी हुए हैं।

37कई करोड़ जीव वैरागी बनकर जंगलों में भटकते रहते हैं।

38कई करोड़ वेदों के श्रोता हैं।

39कई करोड़ तपस्वी बने हुए हैं।

40कई करोड़ अपनी आत्मा में प्रभु-ध्यान को धारण करने वाले हैं।

41कई करोड़ कवि काव्य-रचनाओं द्वारा विचार करते हैं।

42कई करोड़ पुरुष नित्य नवीन नाम का ध्यान करते रहते हैं,

43तो भी हे नानक ! उस परमात्मा का कोई भेद नहीं पा सकते॥ १॥

44इस दुनिया में कई करोड़ (पुरुष) अभिमानी हैं।

45कई करोड़ (पुरुष) अन्धे अज्ञानी हैं।

46कई करोड़ (पुरुष) पत्थर दिल व् कंजूस हैं।

47कई करोड़ (मनुष्य) शुष्क एवं संवेदनहीन हैं।

48कई करोड़ (मनुष्य) दूसरों का धन चुराते हैं।

49कई करोड़ (मनुष्य) दूसरों की निन्दा करते हैं।

50कई करोड़ (पुरुष) धन संग्रह करने हेतु श्रम में लगे हैं।

51कई करोड़ दूसरे देशों में भटक रहे हैं।

52हे प्रभु ! जहाँ कहीं तुम जीवों को (काम में) लगाते हो, वहाँ-वहाँ वे लग जाते हैं।

53हे नानक ! कर्ता-प्रभु की सृष्टि रचना (का भेद) कर्ता-प्रभु ही जानता है॥ २ ॥

54दुनिया में कई करोड़ सिद्ध, ब्रह्मचारी एवं योगी हैं।

55कई करोड़ रस भोगने वाले राजा हैं।

56कई करोड़ पक्षी एवं साँप परमात्मा ने पैदा किए हैं,

57कई करोड़ पत्थर एवं वृक्ष उगाए गए हैं।

58कई करोड़ हवाएँ, जल एवं अग्नियां हैं।

59कई करोड़ देश एवं भूमण्डल हैं।

60कई करोड़ चन्द्रमा, सूर्य एवं तारे हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं