गुरु ग्रंथ साहिब 26 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1यह समस्त संसार तो आने-जाने वाला है। अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि नश्वर है॥ ३॥
2इस दुनिया में रहते हुए ही यदि जीव सेवा-सुमिरन करता रहे,
3तभी प्रभु के दरबार में बैठने के लिए स्थान प्राप्त होता है।
4नानक देव जी कथन करते हैं कि यह जीव उन्हीं कर्मो द्वारा चिन्ता मुक्त होकर रह सकता है ॥ ४ ॥ ३३ ॥
5श्रीरागु महला ३ घरु १
6ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
7मैं अपने सतिगुरु,की सेवा एकाग्रचित और मन व प्रेम-भाव के साथ करता हूँ।
8मेरा सतिगुरु मनोकामना पूर्ण करने वाला तीर्थ है, किन्तु जिस पर परमेश्वर की कृपा होती है, उसी को ऐसी समझ होती है।
9प्रभु की स्तुति करने से ही मनवांछित आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है और इच्छानुसार फल की प्राप्ति होती है।
10इसलिए उस परमेश्वर का नाम-सुमिरन करें, नाम की ही कामना करें, इसी नाम द्वारा हम सहज अवस्था में लीन हो सकते हैं ॥१॥
11हे मेरे मन ! हरि का नाम-रस चखने से ही तृष्णा मिट सकती है।
12जिन गुरुमुख जीवों ने इसे चखा है, वे ही सहज अवस्था में समाए हैं।॥ ॥१॥ रहाउ ॥
13जिन्होंने सतिगुरु की सेवा की है, उन्होंने परमेश्वर का नाम-कोष प्राप्त किया है।
14इससे अंतर्मन में हरिनाम रस भरपूर हो जाता है और मन से अभिमान समाप्त हो जाता है।
15सहज अवस्था में लीन हो जाने से हृदय रूपी कमल खिल जाता है।
16जिस मन में हरि व्याप्त है, वह निर्मल हो जाता है, और उसने प्रभु के दरबार में सम्मान प्राप्त किया है॥ २॥
17वे जीव इस संसार में बहुत कम हैं जो अपने सतिगुरु की सेवा करते हैं।
18ऐसे जीवों ने अभिमान, मोह आदि विकारों का दमन करके प्रभु को ह्रदय में धारण कर रखा है।
19मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ, जिनको प्रभु-नाम के साथ प्रीत हुई है।
20वे चारों युगों में सुखी हैं, जिनके पास अक्षय एवं अपार नाम की निधि है॥ ३॥
21गुरु के मिलने से नाम की प्राप्ति होती है और इसी नाम के कारण ही माया का मोह व विषयों की तृष्णा समाप्त होती है।
22ऐसे में जीव का मन हरि के साथ मिल जाता है तथा जीव को गृहस्थ जीवन में रह कर ही उदासीनता प्राप्त हो जाती है।
23जिन को हरि की उपासना का आनंद मिला है, उन पर मैं सदा बलिहारी जाऊँ।
24नानक देव जी कथन करते हैं कि प्रभु की कृपा-दृष्टि से ही गुणों का खज़ाना सत्य नाम प्राप्त किया जा सकता है ॥४॥१॥३४॥
25श्रीरागु महला ३ ॥
26मनुष्य कितने ही तरह-तरह के भेष बना कर इधर-उधर भटकता है, ऐसा करके वह हृदय में छल अर्जित करता है।
27छलिया मन के साथ मनुष्य प्रभु के दर्शन नहीं पाता और अंततः मर कर वह नरकों की गंदगी में समा जाता है ॥ १॥
28हे मन ! गृहस्थ जीवन में रह कर ही मोह-मायादि बंधनों से उदासीन होकर रहो।
29सत्य व संयम की क्रिया वही करता है, जिस मनुष्य को गुरु के उपदेश द्वारा ज्ञान रूपी प्रकाश प्राप्त हो जाता है ॥ १॥ रहाउ॥
30जिसने गुरु के उपदेश द्वारा विषयों-विकारों से मन को जीत लिया है, उसने गृहस्थ जीवन में ही सदगति व मुक्ति पा ली है।
31हरि का नाम-सिमरन करने से ही सत्संगति द्वारा प्रभु से मिलन होता है ॥ २॥
32मनुष्य यदि लाखों स्त्रियों का भोग कर ले, सम्पूर्ण सृष्टि पर राज्य कर ले।
33तब भी बिना सतिगुरु के आत्मिक सुख नहीं मिलता तथा मनुष्य पुनः पुनः योनियों में पड़ता है।॥ ३॥
34जिन्होंने हरि नाम रूपी हार अपने गले में पहन लिया तथा गुरु-चरणों में मन को लीन किया है।
35उनके पीछे ऋद्धि -सिद्धि आदि सम्पूर्ण शक्तियाँ फिरती हैं, किन्तु उन्हें इन सब की तिनका मात्र मी लालसा नहीं है॥ ४॥
36जो ईश्वर को अच्छा लगे वही होता है, अन्य कुछ भी नहीं किया जा सकता।
37नानक देव जी कथन करते हैं कि हे प्रभु ! मैं आपके नाम-सिमरन द्वारा ही जीवित रहता हूँ. इसलिए आप मुझे शांत स्वभाव प्रदान कीजिए ॥ ५॥ २॥ ३५ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं