गुरु ग्रंथ साहिब 266 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1अनेक यत्न करने से भी तृष्णा नहीं बुझती।
2अनेकों धार्मिक वेष बदलने से (तृष्णा की) अग्नि नहीं बुझती।
3(ऐसे) करोड़ों ही उपायों द्वारा मनुष्य प्रभु के दरबार में मुक्त नहीं होता।
4वह चाहे आकाश में चले जाएँ अथवा पाताल में चले जाएँ, उनकी मुक्ति नहीं होती,
5जो व्यक्ति मोह के कारण माया के जाल में फँसते हैं।
6मनुष्य की दूसरी सब करतूतों पर यमराज उन्हें दण्ड देता है।
7(लेकिन) गोविन्द के भजन के बिना मृत्यु तनिकमात्र भी परवाह नहीं करती।
8भगवान के नाम का जाप करने से हर प्रकार के दुःख दूर हो जाते हैं
9नानक सहज स्वभाव यही बोलता है ।॥ ४॥
10यदि कोई व्यक्ति चार पदार्थो-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का अभिलाषी हो
11तो उसे संतजनों की सेवा में लगना चाहिए।
12यदि कोई व्यक्ति अपना दुःख मिटाना चाहता है तो
13उसे अपने हृदय में हरि-परमेश्वर का नाम सदैव स्मरण करना चाहिए।
14यदि कोई व्यक्ति अपनी शोभा चाहता हो तो
15वह संतों की संगति में रहकर इस अहंकार को त्याग दे।
16यदि कोई व्यक्ति जन्म-मरण के दुःख से डरता है,
17तो उसे संतजनों की शरण लेनी चाहिए।
18जिस व्यक्ति को परमात्मा के दर्शनों की तीव्र लालसा है,
19हे नानक ! मैं उस पर सदा कुर्बान जाता हूँ॥ ५॥
20समस्त पुरुषों में वहीं पुरुष प्रधान है
21जिस पुरुष का सत्संग में रहकर अभिमान मिट जाता है।
22जो पुरुष अपने आपको निम्न (विनीत) जानता है,
23वह सबसे भला (ऊँचा) समझा जाता है।
24जिस पुरुष का मन सबके चरणों की धूलि बन जाता है,
25वह हरि-परमेश्वर के नाम को प्रत्येक हृदय में देखता है।
26जो अपने मन से बुराई को मिटा देता है,
27वह सारी सृष्टि को अपना मित्र देखता है।
28हे नानक ! जो पुरुष सुख-दुःख को एक समान देखता है,
29वह पाप-पुण्य से निर्लिप्त रहता है॥ ६॥
30हे नाथ ! निर्धन के लिए तेरा नाम ही धन-दौलत है।
31निराश्रित को तेरा नाम ही आश्रय है।
32हे प्रभु ! निरादरों का तू आदर है।
33तू ही समस्त प्राणियों को दान देता है।
34हे जगत् के स्वामी ! तुम स्वयं ही सब कुछ करते एवं स्वयं ही जीवो से करवाते हो।
35तू बड़ा अन्तर्यामी है।
36हे ठाकुर ! अपनी गति एवं अपनी मर्यादा तुम स्वयं ही जानते हो।
37हे प्रभु ! अपने आप से तुम स्वयं ही रंगे हुए हो।
38हे ईश्वर ! अपनी महिमा केवल तुम ही कर सकते हो।
39हे नानक ! कोई दूसरा तेरी महिमा को नहीं जानता॥ ७॥
40समस्त धर्मों में सर्वोपरि धर्म है की
41ईश्वर के नाम का जाप करना एवं पवित्र कर्म करना।
42समस्त धार्मिक क्रियाओं में सर्वश्रेष्ठ क्रिया है की
43सत्संग में मिलकर दुर्बुद्धि की मैल को धो फेंकना।
44समस्त प्रयासों में उत्तम प्रयास यही है कि
45सदा मन में हरि के नाम का जाप करते रहो।
46समस्त वाणियों में अमृत वाणी है की
47ईश्वर की महिमा सुनो एवं इसको जिव्हा से उच्चारण करो ।
48हे नानक ! समस्त स्थानों में वह स्थान उत्तम है,
49जिसमें ईश्वर का नाम निवास करता है॥ ८ ॥ ३॥
50श्लोक ॥
51हे गुणविहीन एवं मूर्ख जीव ! उस ईश्वर को सदैव स्मरण कर।
52हे नानक ! जिसने तुझे उत्पन्न किया है, उसको अपने ह्रदय में बसा, केवल ईश्वर ही तेरा साथ देगा ॥ १॥
53अष्टपदी॥
54हे नश्वर प्राणी ! सर्वव्यापक राम के गुण स्मरण कर।
55तेरा क्या मूल है और तू कैसा दिखाई देता हे।
56जिसने तुझे रचा, संवारा एवं सुशोभित किया है,
57जिसने तेरी गर्भ की अग्नि में रक्षा की है,
58जिसने तुझे बाल्यावस्था में पीने के लिए दूध दिया है,
59जिसने तुझे यौवन में भोजन, सुख एवं सूझ दी
60और जिसने जब तू बूढ़ा हुआ तो, सगे-संबंधी एवं मित्र बैठे ही मुँह में भोजन डालने के लिए -तेरी सेवा के लिए दिए हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं