गुरु ग्रंथ साहिब 261 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1यहाँ (इहलोक में) किसी ने कुछ भी स्वयं सम्पूर्ण नहीं किया।
2हे नानक ! प्रभु ने ही यह सृष्टि रचना की हुई है॥ ५१॥
3श्लोक॥
4हे नानक ! यदि हम जीवों के कर्मों का हिसाब किया जाए तो हमें मुक्ति नहीं मिल सकती, क्योंकि हम हर समय भूल ही करते रहते हैं।
5हे क्षमाशील ईश्वर ! तुम स्वयं ही हमारी भूल क्षमा करके हमें भवसागर से पार कर दो ॥ १॥
6पउड़ी॥
7मूर्ख एवं अल्पबुद्धि वाला जीव नमकहराम एवं गुनहगार है।
8जिस प्रभु ने उसे यह आत्मा, शरीर एवं सुख प्रदान किया है, उससे वह अपरिचित ही रहता है, उसे पहचानता ही नहीं।
9माया की खातिर वह दसों दिशाओं में खोज करने हेतु जाता है
10लेकिन सबकुछ देने वाले दाता-प्रभु को वह क्षण भर के लिए भी अपने हृदय में नहीं बसाता।
11लालच, झूठ, विकार एवं सांसारिक मोह इनको वह अपने हृदय में एकत्र करता है।
12जो बड़े विषयी, तस्कर एवं निन्दक हैं, उनके साथ वह अपना जीवन व्यतीत करता है।
13हे परमात्मा ! यदि तुझे उपयुक्त लगे तो तुम स्वयं ही बुरे लोगों को भले लोगों की संगति में रखकर क्षमा कर देते हो।
14हे नानक ! यदि पारब्रह्म प्रभु को उपयुक्त लगे तो पत्थर भी जल में तैरने लग जाता है॥ ५२ ॥
15श्लोक ॥
16नानक का कथन है कि हे ईश्वर ! हम प्राणी माया से संबंधित पदार्थ ही खाते-पीते एवं माया के विलासों में ही हंसते-खेलते कितनी ही योनियों में भटकते आ रहे हैं।
17हे प्रभु ! हम जीवों को भवसागर से बाहर निकाल, क्योंकि हमें तो तेरा ही सहारा है॥ १॥
18पउड़ी॥
19जीव माया के विलासों में मन लगाता, अनगिनत योनियों से गुजरता हुआ, दु:ख सहन करता आता है।
20संतों को मिलने एवं सतिगुरु के उपदेश में लीन होने से दुःख-क्लेश नष्ट हो जाते हैं।
21सहनशीलता को धारण करने और सत्य को एकत्र करने से मनुष्य नाम रूपी अमृत का सेवन करता है।
22जब प्रभु अपनी कृपा करता है तो हमें आनन्द एवं प्रसन्नता में सुख का निवास मिल जाता है।
23जिस पुरुष ने (गुरु जी से विधि सीखकर गुणस्तुति का) व्यापार समस्त आयु निभाया, उसने लाभ प्राप्त किया है, और वह (दुविधा से बचकर) आदर-सत्कार पाता है।
24गुरु ने उसे भारी धैर्य प्रदान किया है और वह भगवान के चरणों में मिला है।
25हे ईश्वर ! यह सारी लीला तूने ही रची है, अब भी तुम स्वयं ही सब कुछ कर रहे हो। लोक-परलोक में प्राणियों के रक्षक तुम स्वयं हो।
26हे नानक ! केवल उस भगवान की महिमा-स्तुति करते रहो, जो प्रत्येक हृदय में समाया हुआ है॥ ५३॥
27श्लोक ॥
28हे कृपा के भण्डार, हे दया के घर प्रभु ! हम जीव तुम्हारी ही शरण में आए हैं।
29हे नानक ! जिस व्यक्ति के अन्तर्मन में एक अनश्वर परमात्मा मौजूद है, वह कृतार्थ हो जाता है॥ १॥
30पउड़ी॥
31तीनों लोकों की रचना ईश्वर ने अपने हुक्म में की है।
32ईश्वर के हुक्मानुसार वेद रचे गए और अध्ययन किए गए।
33समस्त शास्त्र, स्मृतियां एवं पुराण भगवान के हुक्म का प्रकट रूप हैं।
34इन पुराणों, शास्त्रों एवं स्मृतियों के भजन, कथन एवं व्याख्या भी भगवान के हुक्म का ही प्रकाश है।
35संसार के भय एवं दुविधा से मुक्ति पाना भी भगवान के हुक्म का प्रकाश है।
36धार्मिक संस्कारों, सांसारिक कर्मो, पवित्रता एवं धर्म का वर्णन भी भगवान का हुक्म हैं।
37हे नानक ! जितना भी यह दृष्टिगोचर जगत् है,
38इसमें अनश्वर प्रभु का हुक्म सक्रिय है, फिर भी पारब्रह्म प्रभु निर्लिप्त है॥ ५४॥
39श्लोक ॥
40उस अगम्य ईश्वर के हाथ में (हुक्म-रूपी) कलम है। वह समस्त जीवों के मस्तक पर कर्मो के अनुसार भाग्य लिख रहा है।
41अनूप सुन्दरता वाला प्रभु समस्त प्राणियों के साथ मिला हुआ है।
42नानक का कथन है कि हे प्रभु ! तेरी महिना मैं अपने मुख से व्यक्त नहीं कर सकता।
43तेरे दर्शन करके मैं मुग्ध हो गया हूँ और तुझ पर न्यौछावर हो रहा हूँ॥ १॥
44पउड़ी ॥
45नानक का कथन है कि हे अच्युत ! हे पारब्रह्म ! हे अविनाशी ! हे पापनाशक !
46हे सर्वव्यापक ! हे दुःखनाशक ! हे गुणों के भण्डार !
47हे निरंकार प्रभु ! हे निर्गुण ! हे समस्त प्राणियों के सहारे !
48हे गोबिन्द ! हे गुणों के खजाने ! तेरे पास सदैव विवेक है।
49हे अपरम्पार प्रभु ! तुम अब भी मौजूद हो, तुम सदा सत्यस्वरूप हो।
50हे संतों के सदा सहायक ! तू ही निराश्रितो का आश्रय है।
51हे ठाकुर ! मैं तेरा छोटा-सा (निम्न) सेवक हूँ। मैं गुणविहीन हूँ, मुझ में कोई भी गुण मौजूद नहीं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं