सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 260 · Raag Gauree

1श्लोक॥

2शाक्त, मूर्ख एवं नासमझ इन्सान अहंकार करता हुआ अपनी आयु बिता देता है।

3हे नानक ! दुःख में वह प्यासे पुरुष की भाँति मर जाता है और अपने किए कर्मो का फल भोगता है॥ १॥

4पउड़ी ॥

5ड़ - संतजनों की संगति करने से मनुष्य के हर प्रकार के झगड़े समाप्त हो जाते हैं।

6भगवान के नाम की आराधना करनी ही कर्म एवं धर्म का मूल है।

7जिसके हृदय में सुन्दर प्रभु निवास करता है,

8उसका झगड़ा नाश हो जाता है।

9भगवान से टूटे हुए मूर्ख व्यक्ति के हृदय में अहंबुद्धि का पाप निवास करता है

10और वह विवाद उत्पन्न कर लेता है।

11हे नानक ! गुरमुख का एक क्षण में ही झगड़ा मिट जाता है और उसे सुख उपलब्ध हो जाता है॥ ४७ ॥

12श्लोक॥

13हे मेरे मन ! अपनी युक्ति एवं चतुराई को त्याग कर संतों की शरण ले।

14हे नानक ! जिस व्यक्ति के ह्रदय में गुरु-उपदेश का वास हो जाता है, उसके माथे पर भाग्य उदय हो जाता है॥ १॥

15पउड़ी॥

16स-हे परमात्मा ! अब हारकर तेरी शरण में आए हैं। विद्वान लोग शास्त्र, स्मृतियों का उच्च स्वर में अध्ययन करते हैं,

17जांच-पड़ताल एवं निर्णय करने से अनुभव कर लिया है कि

18भगवान के भजन के अलावा मनुष्य को मुक्ति नहीं मिलती।

19हम श्वास-श्वास से भूल करते रहते हैं।

20हे प्रभु! तुम सर्वशक्तिमान, गणना-रहित एवं अनन्त हो।

21हे दया के घर ! शरण में आए हुओं की रक्षा करो।

22नानक का कथन है कि हे गोपाल ! हम तो तेरी ही संतान हैं॥ ४८ ॥

23श्लोक।

24जब अहंकार मिट जाता है तो सुख-शांति उत्पन्न हो जाती है और मन एवं तन स्वस्थ हो जाते हैं।

25हे नानक ! अहंकार के मिटने से ही प्राणी को प्रभु दिखाई देता है, जो सत्य ही महिमा-स्तुति का हकदार है॥ १॥

26पउड़ी ॥

27ख - उस परमात्मा की एकाग्रचित होकर प्रशंसा करते रहो,

28जो एक क्षण में ही उन हृदयों को शुभ गुणों से भरपूर कर देता है, जो पहले गुणों से शून्य थे।

29जब प्राणी भली प्रकार से विनीत हो जाता है

30तो वह रात-दिन निर्मल प्रभु का भजन करता रहता है।

31यदि ईश्वर को भला लगे तो वह सुख प्रदान करता है।

32पारब्रह्म प्रभु ऐसा अनन्त है।

33वह असंख्य पाप एक क्षण में क्षमा कर देता है।

34हे नानक प्रभु सदैव ही दया का घर है॥ ४९॥

35श्लोक ॥

36हे मेरे मन ! मैं तुझे सत्य कहता हूँ, जरा ध्यानपूर्वक सुन। हरि-परमेश्वर की शरण में आओ।

37हे नानक ! अपनी समस्त युक्तियाँ एवं चतुरता त्याग दे, फिर ईश्वर तुझे अपने भीतर लीन कर लेगा ॥ १॥

38पउड़ी ॥

39स - हे मूर्ख प्राणी ! अपनी चतुरता को त्याग दे।

40ईश्वर चतुराइयों एवं हुक्म (उपदेश) करने से प्रसन्न नहीं होता।

41चाहे तू हजारों प्रकार की चतुरता भी करे परन्तु

42एक चतुराई भी तेरा साथ नहीं देगी।

43हे मेरे मन ! उस ईश्वर को ही दिन-रात स्मरण करता रह,

44ईश्वर की याद ने ही तेरे साथ जाना है।

45हे नानक ! जिस व्यक्ति को ईश्वर स्वयं संतों की सेवा में लगाता है,

46उसे कोई भी मुसीबत प्रभावित नहीं करती ॥ ५० ॥

47श्लोक ॥

48हरि-परमेश्वर के नाम को मुख से बोलने एवं इसको हृदय में बसाने से सुख प्राप्त होता है।

49हे नानक ! प्रभु सर्वव्यापक है और प्रत्येक स्थान के भीतर वह मौजूद है॥ १॥

50पउड़ी॥

51देखो ! भगवान सबके हृदय में परिपूर्ण हो रहा है।

52ईश्वर सदैव अस्तित्व वाला चलायमान है, वह प्राणियों के दुःख नष्ट करने वाला है तथा यह सूझ गुरु का ज्ञान प्रदान करता है।

53अपना अहंकार नष्ट करने से मनुष्य प्रसन्नता प्राप्त कर लेता है।जहाँ अहंकार नहीं वहाँ ईश्वर स्वयं मौजूद है।

54संतों की संगति के प्रताप द्वारा जन्म-मरण की पीड़ा निवृत्त हो जाती है।

55दया का घर ईश्वर उन पर कृपालु हो जाता है जो लोग संतों की संगति में रहकर प्रभु के नाम को प्रेमपूर्वक अपने हृदय में स्थित करते हैं,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं