सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 25 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji

1जैसी सूझ तुम उनको प्रदान करते हो, वैसा ही मार्ग उनको मिल जाता है। अर्थात्-प्रत्येक जीव अपनी सूझ-बूझ के अनुसार इस संसार में कर्म-मार्ग अपना चुका है।

2सभी जीवों के कर्मों के निर्णय का नियम एक ही है, जिसके अनुसार वे आवागमन के चक्र में रहते हैं।॥ १॥

3हे जीव ! तुम चतुराई क्यों करते हो ?

4वह दाता प्रभु लेने और देने में कभी भी विलम्ब नहीं करता ॥ १॥ रहाउ॥

5हे परमेश्वर ! | यह समस्त जीव तुम्हारे बनाए हुए हैं तथा इन सब जीवों के तुम स्वामी हो।

6हे प्रभु ! फिर तुम (इन जीवों की भूलों पर) क्रोध क्यों करते हो?

7यदि तुम इन पर क्रोध करते भी हो।

8तो भी तुम इन जीवों के हो और ये जीव तुम्हारे हैं ॥ २॥

9हम अपशब्द बोलने वाले हैं तथा निरर्थक बातें करते हैं।

10हमारी निरर्थक बातों को तुम अपनी कृपा-दृष्टि में तोलते हो।

11जहाँ सत्कर्म हैं, वहाँ बुद्धि भी परिपक्व होती है।

12सत्कर्मो के बिना जीवन में हानि ही हानि है॥ ३॥

13नानक देव जी विनयपूर्वक कथन करते हैं कि सूझवान जीव कैसा होना चाहिए?

14प्रत्युत्तर में कहते हैं, स्वयं को जो पहचानता है और उस परमात्मा को समझता है।

15उस गुरु रूप परमात्मा की कृपा से उसके गुणों का चिन्तन (विचार) करता है।

16ऐसा सूझवान, परम ज्ञानी ही परमात्मा के दरबार में अथवा परलोक में स्वीकृत होता है॥ ४॥ ३०॥

17श्रीरागु महला १ घरु ४ ॥

18हे प्रभु ! तुम दरिया के समान विशाल हो, सर्वज्ञाता हो, सर्वद्रष्टा हो और मैं एक छोटी मछली के समान हूँ तो मैं तुम्हारी सीमा को कैसे जान सकता हूँ. (क्योंकि तुम तो असीम प्रभु हो)।

19जिस ओर भी मेरी दृष्टि जाती है, वहाँ सब ओर तुम परिपूर्ण व्यापक हो, अतः तुम से बिछुड़ कर मैं तड़प कर मर जाऊँगी, अर्थात्-तुम्हारे नाम-सुमिरन से विस्मृत होने पर मैं दुखी होकर मर जाऊँगी ॥ १॥

20न ही मैं यम रूपी मछुए को जानती हूँ तथा न उसके जाल को जानती हूँ।

21जीवन में जब भी कोई कष्ट आता है तो मैं तुझे ही स्मरण करती हूँ॥ ॥१॥ रहाउ ॥

22हे परमात्मा ! तुम सर्वव्यापक हो, किन्तु मैंने तुझे अपनी तुच्छ बुद्धि के कारण कहीं दूर ही समझा है।

23जो कुछ भी मैं करती हूँ, वह सब कुछ तेरी दृष्टि में ही है। अर्थात्- क्योंकि तुम सर्वव्यापक हो, इसलिए जीव जो भी कर्म करता है वह तुम्हारी उपस्थिति में ही होता है।

24मेरे किए कर्मों को जबकि तुम देख रहे हो, लेकिन मैं फिर भी इन्कार करती हूँ।

25न तो मैं तुम्हारे द्वारा स्वीकृत होने वाले कार्य ही करती हूँ तथा न ही मैं तुम्हारा नाम-सुमिरन करती हूँ॥ २॥

26हे परमात्मा ! जितना तुम देते हो, मैं उतना ही खाती हूँ।

27तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई द्वार नहीं, तो फिर मैं किस द्वार पर जाऊँ।

28मैं नानक तुम्हारे समक्ष यही एक प्रार्थना करता हूँ कि

29मेरे प्राण एवं तन-मन आदि सब कुछ तुम्हारे अधीन ही रहें।॥ ३॥

30तुम स्वयं निकट हो, दूर भी तुम ही हो तथा मध्य स्थान में भी आप हो।

31तुम स्वयं (हमारे कर्मों को) देखते हो, तुम ही (अच्छे-बुरे वचन) सुनते हो तथा तुम स्वयं ही अपनी शक्ति द्वारा इस सृष्टि की रचना करते हो।

32नानक देव जी कथन करते हैं कि जो आप को आदेश करना अच्छा लगता है, वही हम सब को मान्य है ॥४॥३१॥

33श्रीरागु महला १ घरु ४ ॥

34परमात्मा द्वारा रचित जीव अपने मन में किस प्रकार अभिमान कर सकता है ?

35जबकि सभी पदार्थ तो उस दाता के हाथ में हैं।

36जीव को देना अथवा न देना उस प्रभु की ही इच्छा है।

37जीव के कहने से क्या होता है॥ १॥

38वह स्वयं तो सत्य स्वरूप है ही, उसे सत्य ही स्वीकृत भी है।

39अज्ञानी जीव पूर्णतया कच्चा है॥ १॥ रहाउ॥

40जिस कर्ता-पुरुष के ये मानव रूपी पेड़-पौधे हैं वही इन्हें संवारता है।

41जैसी उनकी नस्ल बन जाती है, वैसा ही इनका नाम पड़ जाता है। अर्थात्-जीव के कर्मानुसार ही संसार में उसका नाम प्रसिद्ध होता है।

42इनकी भावना के अनुसार ही फूल लगता है तथा लिखे हुए कर्मानुसार फल प्राप्त करता है।

43जीव स्वयं ही बोता है और स्वयं ही खाता है। अर्थात्-जीव जैसे कर्म करता है, वैसे ही फल को भोगता है॥ २॥

44जीव की तन रूपी दीवार दुर्बल है और इसके अन्दर बैठा मन रूपी राज-मिस्त्री भी अनाड़ी है।

45इसकी बुद्धि भी नाम रूपी नमक से रहित है, इसलिए इसे आत्मिक पदार्थों का स्वाद भी रसहीन ही लगेगा।

46नानक देव जी कथन करते हैं कि परमेश्वर जब मानव-जीवन को संवारता है तभी उसका जीवन सफल होता है।

47प्रभु के नाम-सुमिरन के बिना उसको दरबार में सम्मान प्राप्त नहीं होता ॥३॥३२॥

48श्रीरागु महला १ घरु ५ ॥

49अछल माया भी मानव को छलने में स्वयं सफल नहीं हो सकती, तथा न ही कटार उसको कोई घाव लगा सकती है।

50क्योंकि प्रभु सदैव उसका रक्षक है, किन्तु मानव लोभी होने के कारण माया के पीछे भटकता रहता है। १॥

51नाम सुमिरन रूपी तेल के बिना भला यह आत्मिक प्रकाश करने वाला ज्ञान रूपी दीपक कैसे जल सकता है? ॥ १॥ रहाउ॥

52गुरु जी प्रत्युत्तर में कथन करते हैं कि ज्ञान रूपी दीपक जलाने के लिए धर्म-ग्रंथों के सिद्धान्तों पर चल कर जीवन को संवारना तेल है।इस शरीर रूपी दीपक में भय की बाती डाली जाए।

53सत्य ज्ञान रूपी अग्नि की लौ द्वारा यह दीपक जलाया जाए ॥२॥

54इस प्रकार की सामग्री से ही यह ज्ञान रूपी दीपक जल सकता है।

55जब ज्ञान रूपी दीपक प्रकाश करता है तो निरंकार से मिलाप हो जाता है ॥१॥ रहाउ ॥

56मानव शरीर धारण करने पर जीव को गुरु उपदेश ग्रहण करना चाहिए।

57प्रभु की उपासना करने से ही सुखों की प्राप्ति होती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं