गुरु ग्रंथ साहिब 259 · Raag Gauree
1श्लोक ॥
2जिनके मन में पूर्ण गुरु का मंत्र विद्यमान हो जाता है, उनकी बुद्धि पूर्ण हो जाती है और वे विख्यात हो जाते हैं।
3हे नानक ! वे जीव बड़े भाग्यशाली हैं, जो अपने प्रभु को जान लेते हैं।॥ १॥
4पउड़ी॥
5म-जिसने ईश्वर का भेद पा लिया है, वह संतों की संगति में मिलकर तृप्त हो जाता है।
6ऐसा व्यक्ति दुःख-सुख को एक समान समझता है।
7वह नरक-स्वर्ग में फँसने से बच जाता है।
8वह संसार के साथ रहता है, लेकिन फिर भी इससे निर्लिप्त रहता है।
9वह श्रेष्ठ प्रभु प्रत्येक हृदय में परिपूर्ण दिखता है।
10हे नानक ! ईश्वर के उस प्रेम में ही उसे सुख प्राप्त होता है
11और माया उसको प्रभावित नहीं कर सकती ॥ ४२ ॥
12श्लोक ॥
13हे मित्रो, हे सज्जनों एवं दोस्तो ! ध्यानपूर्वक सुनो। भगवान के सिमरन बिना किसी को भी मुक्ति प्राप्त नहीं होती।
14हे नानक ! जो लोग गुरु के चरण-स्पर्श करते हैं, उनके (मोह-माया के) बन्धन मिट जाते हैं ॥ १॥
15पउड़ी॥
16य - इन्सान (मोक्ष की प्राप्ति हेतु) अनेक प्रकार के यत्न करता रहता है
17किन्तु भगवान का नाम-सिमरन किए बिना उसे कामयाबी नहीं मिलती।
18जिन यत्नों द्वारा मोक्ष मिल सकता है,
19वह यत्न यही है कि संतों की संगति की जाए।
20चाहे हरेक व्यक्ति मोक्ष का ख्याल धारण किए बैठा है
21परन्तु उस ईश्वर को स्मरण किए बिना मोक्ष नहीं मिल सकता।
22इस भवसागर को पार करने के लिए ईश्वर ही जहाज के समान है।
23हे प्रभु ! गुणविहीन प्राणियों की रक्षा कीजिए।
24हे नानक ! जिन लोगों के मन, कर्म, वचन में ईश्वर स्वयं सूझ उत्पन्न कर देता है,
25उनकी मति उज्जवल हो जाती है॥ ४३॥
26श्लोक ॥
27(हे मानव !) किसी अन्य पर क्रोध मत करो और अपने आप पर विचार करो।
28हे नानक ! यदि तू दुनिया में नम्रता सहित रहे तो ईश्वर की कृपा से तेरा भवसागर से उद्धार हो जाएगा ॥ १॥
29पउड़ी॥
30र - सारा विश्व जिस गुरु की चरण-धूलि होता है,
31तू भी उसके समक्ष अपना अभिमान त्याग दे और तेरे सुपुर्द जो (विकारों का) बकाया है, वह खत्म हो जाएगा।
32हे भाई ! इस संसार-रूपी रणभूमि में एवं ईश्वर के दरबार में तभी तुझे कामयाबी मिल सकती है,
33यदि गुरु के सान्निध्य में रहकर ईश्वर के नाम में वृत्ति लगाएगा।
34तेरे पाप धीरे-धीरे मिट जाएँगे पूर्ण गुरु के अपार शब्द (के चिंतन) द्वारा ।
35हे नानक ! वे नाम के प्रेम में मग्न रहते हैं और ईश्वर नाम के रस में मस्त हो जाते हैं ।
36जिन लोगों को गुरु ने ईश्वर-नाम की देन प्रदान की है ॥ ४४॥
37श्लोक ॥
38इस तन में लोभ, झूठ एवं पापों-विकारों के रोग वास करते हैं।
39हे नानक ! जिस गुरमुख ने हरि-परमेश्वर के नाम का अमृत पान किया है, वह सुखपूर्वक निवास करता है॥ १॥
40पउड़ी॥
41ल - हे ईश्वर ! जिसे भी तुम अपने नाम की औषधि लगाते हो,
42एक क्षण में ही उसके दुःख-दर्द समाप्त हो जाते हैं।
43जो व्यक्ति अपने हृदय में ईश्वर के नाम की औषधि से प्रेम करता है,
44स्वप्न में भी रोग उसको नहीं सताते।
45हे भाई ! ईश्वर के नाम की औषधि प्रत्येक हृदय में विद्यमान है।
46पूर्ण गुरु के अलावा किसी को भी इसे तैयार करने की विधि नहीं आती।
47हे नानक ! जब पूर्ण गुरु संयमं दशा कि औषधि देते हैं,
48मनुष्य पुनः दुखी नही होता॥ ४५ ॥
49श्लोक ॥
50हे नानक ! वासुदेव तो प्रत्येक स्थान पर मौजूद है, ऐसा कोई भी स्थान नहीं है, जहाँ वह मौजूद न हो।
51समस्त प्राणियों के भीतर एवं बाहर ईश्वर है, उससे क्या छिपाया जा सकता है।॥ १॥
52पउड़ी।
53व - किसी से भी वैर मत करो।
54(क्योकि) परमात्मा कण-कण में प्रत्येक हृदय में विद्यमान है,
55वासुदेव सागर एवं धरती में व्यापक है।
56गुरु की कृपा से कोई विरला पुरुष ही उसका यशोगान करता है।
57उनके मन से वैर-विरोध मिट जाते हैं।
58जो व्यक्ति गुरु के सान्निध्य में रहकर भगवान का भजन-कीर्तन सुनते हैं,
59हे नानक ! वे जात-पात एवं रूपरेखा से मुक्त हो जाते हैं जो व्यक्ति गुरु के माध्यम से भगवान के नाम का चिन्तन करते हैं। ४६ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं