गुरु ग्रंथ साहिब 258 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1हे नानक ! जिनके अन्तर्मन सर्वगुणों के भण्डार हरि-नाम के अमृत से भरे रहते हैं,
2उनके भीतर एक ऐसा आनन्द कायम रहता है, जिस तरह लगातार अनहद ध्वनि के सर्व प्रकार के संगीत मिले-जुले स्वर में गूंज रहे हों। ३६॥
3श्लोक ॥
4जिस पुरुष का मान-सम्मान गुरु पारब्रह्म ने बचाया है, ऐसे पुरुष ने छल, मोह एवं पाप सब कुछ छोड़ दिए हैं।
5हे नानक ! हमें उस पारब्रह्म-प्रभु की आराधना करनी चाहिए, जिसकी महिमा का अंत नहीं मिल सकता तथा जिसके अस्तित्व का ओर-छोर भी प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १॥
6पउड़ी ॥
7प- परमेश्वर अपरंपार है और उसका अंत नहीं पाया जा सकता।
8हरि-परमेश्वर अगम्य एवं पतितपावन है।
9ऐसे करोड़ों ही अपराधी पवित्र हो जाते हैं,
10जो संतों की संगति में मिलकर भगवान के अमृत नाम का जाप करते रहते हैं।
11उसका छल-कपट, धोखा एवं सांसारिक मोह मिट जाते हैं,
12हे गुसाई ! जिसकी तुम स्वयं रक्षा करते हो।
13हे नानक ! ईश्वर सर्वोपरि बादशाह है, वहीं वास्तविक छत्रधारी है,
14कोई दूसरा उसकी समानता करने योग्य नहीं है॥ ३७॥
15श्लोक ॥
16हे नानक ! यदि मन को जीत लिया जाए तो वासनाओं पर विजय हासिल हो जाती है और मोह-माया के बन्धन मिट जाते हैं एवं मोहिनी के पीछे की शंका नष्ट हो जाती है।
17जिस व्यक्ति को गुरु द्वारा मन की स्थिरता प्राप्त हो जाती है, उस व्यक्ति के जन्म-मरण के चक्र हमेशा के लिए मिट जाते हैं॥ १ ॥
18पउड़ी॥
19फ - (हे जीव !) तू कितनी ही योनियों में भटकता आया है
20तथा इस कलियुग में तुझे दुर्लभ मनुष्य देहि प्राप्त हुई है।
21यदि तू मोह-माया के बन्धनों में फँसा रहा तो ऐसा सुनहरी अवसर दुबारा नहीं मिलेगा।
22ईश्वर के नाम की स्तुति करता रह, मृत्यु का बन्धन कट जाएगा।
23तेरा बार-बार जन्म-मरण का चक्र मिट जाएगा
24केवल एक ईश्वर के नाम का चिन्तन कर।
25हे सृष्टिकर्ता प्रभु ! अपनी कृपा धारण करो
26नानक का कथन है कि बेचारे जीव को अपने साथ मिला लो॥ ३८ ॥
27श्लोक॥
28हे दीनदयाल ! हे गोपाल ! हे पारब्रह्म ! तुम मेरी एक विनती सुनो।
29हे नानक ! संतजनों की चरणधूलि ही विभिन्न सुखों, धन-पदार्थों एवं अनेक रसों के भोग के समान है॥ १॥
30पउड़ी॥
31ब - जो ब्रह्म को समझता है, वही वास्तविक ब्राह्मण है।
32वैष्णव वही है जो गुरु का सान्निध्य लेकर आत्मिक शुद्धता के धर्म का पालन करता है।
33जो व्यक्ति अपनी बुराई का नाश कर देता है, वही शूरवीर होता है
34तथा फिर बुराई उसके निकट नहीं आती।
35मनुष्य स्वयं ही अहंकार के बन्धनों में फँसा हुआ है।
36परन्तु ज्ञानहीन मनुष्य दूसरों पर दोष लगाता है।
37बातचीत एवं चतुरता किसी योग्य नहीं।
38हे नानक ! जिसको ईश्वर सूझ प्रदान करता है, वही उसको समझता है॥ ३६॥
39श्लोक ॥
40(हे जीव !) अपने मन में उस भगवान की आराधना कर, जो भय को नष्ट करने वाला और सर्व प्रकार के पाप एवं दु:खों का नाश करने वाला है।
41हे नानक ! संतों की संगति में रहकर जिन लोगों के हृदय में प्रभु आ बसता है, उनके हर प्रकार के भ्रम समाप्त हो जाते है॥ १॥
42पउड़ी॥
43भ-अपना भ्रम मिटा दो,
44क्योंकि यह समूचे संसार का साथ स्वप्न के तुल्य है।
45स्वर्ग निवासी पुरुष और देवी-देवते भी भ्रम में पड़ते रहे हैं।
46सिद्ध, साधक एवं ब्रह्मा भी भ्रम में भटकाए हुए हैं।
47भटक-भटक कर मनुष्य नष्ट हो गए हैं।
48यह माया का सागर बड़ा विषम एवं तैरने के लिए कठिन है।
49हे नानक ! जिसने गुरु की शरण में अपना भ्रम, भय एवं सांसारिक मोह को नष्ट कर दिया है,
50वह परम सुख प्राप्त कर लेता है॥ ४०॥
51श्लोक ॥
52इन्सान का चंचल मन बहुत प्रकार से माया हेतु डगमगाता रहता है और माया से ही लिपटता रहता है।
53नानक का कथन है कि हे ईश्वर ! जिसे तुम माया माँगने से रोकते हो, उसका नाम से प्रेम हो जाता है॥ १॥
54पउड़ी ॥
55म - माँगने वाला जीव मूर्ख है।
56देने वाला चतुर दाता देन देता जा रहा है।
57जो कुछ भी प्रभु ने देना होता है, वह उसको एक बार ही दे देता है।
58हे मूर्ख मन ! तुम क्यों ऊँची-ऊँची पुकार कर रहे हो ?
59जब कभी भी तुम माँगते हो, तब तुम सांसारिक पदार्थ ही माँगते हो,
60जिन से किसी को भी प्रसन्नता प्राप्त नहीं हुई।
61नानक का कथन है कि हे मूर्ख मन ! यदि तूने दात ही माँगनी है तो एक ईश्वर के नाम की माँग,
62जिससे तेरा संसार सागर से कल्याण हो जाएगा ॥ ४१ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं