गुरु ग्रंथ साहिब 257 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1जिसके हृदय में नाम निवास करता है, उसको मृत्यु का मार्ग एवं भय नहीं सताता।
2वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है और उसकी मति उज्जवल हो जाती है और उसको स्वामी के आत्मस्वरूप में निवास मिल जाता है।
3अन्तकाल जीव के साथ न ही धन साथ जाता है, न ही घर, जवानी एवं राज्य साथ जाता है।
4हे जीव ! संतों की संगति में ईश्वर का भजन करता रह, केवल वही परलोक में तेरे काम आएगा।
5जब ईश्वर स्वयं तेरे ताप का निवारण करेगा तो तुझे निश्चित ही कोई जलन नहीं होगी।
6हे नानक ! ईश्वर स्वयं ही हमारा पालन-पोषण करता है, वह हमारी माता एवं पिता है।॥ ३२ ॥
7श्लोक॥
8स्वेच्छाचारी जीव अनेक विधियों से परिश्रम करके हार-थक गए हैं। उनकी तृप्ति नहीं हुई और न ही उनकी तृष्णा मिटी है।
9हे नानक ! शाक्त जीव धन संचित करते-करते मर जाते हैं परन्तु धन-दौलत उनके साथ नहीं जाता ॥ १॥
10पउड़ी॥
11थ- कोई भी जीव स्थिर नहीं, तुम क्यों अपने चरण फैलाते हो ?
12केवल धन के प्रयास की खातिर तुम बहुत धोखे एवं छल-कपट करते हो।
13हे मूर्ख ! तुम थैली भरने के लिए परिश्रम करते हो और फिर हार-थक कर गिर जाते हो।
14यह अन्तिम अवसर तेरी आत्मा के किसी काम नहीं आना।
15इसलिए गोविन्द का भजन करने एवं संतों के उपदेश का अनुसरण करने से तुझे स्थिरता प्राप्त हो जाएगी।
16सदैव एक ईश्वर से प्रेम करो। यही (तेरा) सच्चा प्रेम है।
17ईश्वर सब कुछ करने वाला एवं जीव से कराने वाला है। समस्त युक्तियों केवल उसके वश में है।
18नानक का कथन है कि हे प्रभु ! जीव तो असहाय एवं विवश हैं, चूंकि जीवों को तुम जहां-जहां भी लगा देते हो, वे उस तरफ ही लग जाते हैं॥ ३३ ॥
19श्लोक॥
20उसके दासों ने एक ईश्वर को देखा है, जो सब कुछ देने वाला है।
21हे नानक ! वह श्वाश-श्वाश से ईश्वर का चिन्तन करते जाते हैं और उसके दर्शन ही उनके जीवन का आघार है॥ १॥
22पउड़ी ॥
23द- एक परमात्मा ही वह दाता है जो समस्त जीवों को भोजन-पदार्थ देने वाला है।
24जीवों को देते वक्त उसकी देन में कोई कमी नहीं आती, क्योंकि उसके अक्षय भण्डार भरपूर हैं।
25वह देने वाला सदैव जीवित है।
26हे मूर्ख मन ! तू उस देने वाले दाता को क्यों भूल रहा है ?
27हे मेरे मित्र ! इसमें किसी का दोष नहीं।
28क्योंकि माया-मोह के बन्धन ईश्वर ने ही रचे हैं।
29हे नानक ! जिस गुरमुख का वह स्वयं दुःख दूर कर देता है, वह कृतार्थ हो जाता है।॥ ३४॥
30श्लोक।
31हे मेरे मन ! तू एक ईश्वर का सहारा ले तथा किसी दूसरे की आशा को त्याग दे।
32हे नानक ! भगवान के नाम का ध्यान करने से समस्त कार्य संवर जाते हैं॥ १॥
33पउड़ी॥
34ध- यदि संतों-महापुरुषों की संगति में निवास हो जाए तो मन की भटकना मिट जाती है।
35यदि ईश्वर स्वयं आदि से ही कृपा करे तो मन में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है।
36जिनके पास सच्चा नाम-धन है, वही सच्चे साहूकार हैं।
37हरि-परमेश्वर का नाम उनकी जीवन-पूंजी होती है और वह उसके नाम का व्यापार करते रहते हैं।
38वही आदमी धैर्यवान होता है और उसे बड़ा यश एवं शोभा मिलती है।
39जो आदमी अपने कानों से हरि-परमेश्वर का नाम सुनता रहता है,
40हे नानक ! जिस गुरमुख के अन्तर्मन में भगवान का नाम निवास कर लेता है,
41उसे ही दुनिया में ख्याति प्राप्त होती है॥ ३५॥
42श्लोक ॥
43हे नानक ! जो व्यक्ति भीतर एवं बाहर एकाग्रचित होकर ईश्वर के नाम का जाप करता रहता है,
44पूर्ण गुरु से उपदेश प्राप्त करता है और संतों की सभा में शामिल होता है, ऐसा व्यक्ति कभी नरक में नहीं जाता ॥ १॥
45पउड़ी ॥
46न- वह नरक में नहीं पड़ता, जिस व्यक्ति के मन एवं तन में भगवान का नाम निवास करता है।
47जो गुरमुख नाम-भण्डार का भजन करते रहते हैं,
48वे माया के विष में नष्ट नहीं होते।
49उनके जीवन-मार्ग में कोई बाधा नहीं आती, जिन जिज्ञासुओं को गुरु ने नाम-मंत्र दिया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं