सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 256 · Raag Gauree

1पउड़ी॥

2ठ - वह किसी के भी मन को दुःख नहीं पहुँचाते जो सब कुछ त्याग कर एक ईश्वर से जुड़े हुए हैं।

3जो लोग सांसारिक माया से उलझे हुए हैं, वह मृत हैं

4और उनको कहीं भी प्रसन्नता नहीं मिलती।

5जो व्यक्ति संतों की संगति में वास करता है, उसका मन शीतल हो जाता है

6और नाम अमृत उसके हृदय को बड़ा मीठा लगता है।

7हे नानक ! जो व्यक्ति अपने ईश्वर को भला लगता है,

8उसका मन शीतल हो जाता है ॥ २८ ॥

9श्लोक॥

10हे नानक ! (इस तरह वन्दना कर-) हे सर्वकला सम्पूर्ण प्रभु ! मैं अनेक बार तुझे प्रणाम करता हूँ।

11मुझे अपना हाथ देकर माया के मोह में विचलित होने से बचा ले॥ १॥

12पउड़ी॥

13ड - (हे जीव !) यह जगत् तेरा निवास नहीं, उस स्थान को पहचान, जहाँ तेरा वास्तविक घर है।

14गुरु के शब्द द्वारा तू उस निवास में पहुँचने की विधि पहचान ले।

15संसार के इस निवास हेतु मनुष्य कड़ा परिश्रम करके साधना करता है,

16किन्तु मृत्यु आने पर इसका थोड़ा-सा भी इसके साथ नहीं जाता।

17उस निवास-स्थान की मर्यादा वही जानता है,

18जिस पर पूर्ण भगवान अपनी कृपा-दृष्टि करता है।

19यह निवास स्थान निश्चित एवं सच्चा है और यह सत्संग द्वारा ही प्राप्त होता है।

20हे नानक ! वह सेवक जो इस शाश्वत निवास को संतों की संगति द्वारा प्राप्त कर लेते हैं, उनका हृदय विचलित नहीं होता। ॥२९ ॥

21श्लोक ॥

22जब यमराज ध्वस्त करने लगता है तो कोई भी उसके मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकता।

23हे नानक ! जो व्यक्ति सत्संग में संबंध जोड़ कर ईश्वर की आराधना करते हैं, उनका भवसागर से उद्धार हो जाता है॥ १॥

24पउड़ी॥

25ढ - तुम परमात्मा को ढूंढने के लिए कहाँ फिर रहे हो ? खोज-तलाश तो इस हृदय में ही करनी है।

26ईश्वर तेरे साथ ही रहता है, तुम वन-वन में क्यों भटकते फिरते हो ?

27सत्संग में अपनी अहंबुद्धि के विकराल ढेर को गिरा दो।

28ऐसे तुझे सुख प्राप्त होगा और सुख-शांति में वास करोगे तथा प्रभु के दर्शन करके प्रसन्न होवोगे।

29जिसके भीतर अहंकार का यह अम्बार विद्यमान है, वह जन्मता-मरता है और गर्भयोनि का कष्ट सहन करता है।

30जो व्यक्ति दुनिया के मोह में मस्त हुआ है और अहंकार एवं अहंत्व में फँसा है, वह जगत् में जन्मता-मरता रहता है।

31मैं अब शनेः शनेः साधु-संतों की शरण में आ गिरा हूँ।

32हे नानक ! ईश्वर ने मेरे दुःख-क्लेश के फंदे काट दिए हैं और मुझे अपने में लीन कर लिया है॥ ३०॥

33श्लोक॥

34हे नानक ! जहाँ संत-महांपुरुष प्रतिदिन गोबिन्द के नाम का भजन-कीर्त्तन करते रहते हैं।

35यमराज संबोधन करता है, "हे दूतो ! उस निवास के निकट मत जाना, अन्यथा न ही मेरा और न ही तुम्हारा बचाव होगा" ॥ १॥

36पउड़ी॥

37ण - यदि कोई व्यक्ति अपने मन को वश में कर लेता है, तो वह जीवन के युद्ध को विजय कर लेता है।

38जो व्यक्ति अपने अहंत्व एवं द्वैतवाद के साथ लड़ता मर जाता है, वही योद्धा है।

39जो व्यक्ति अपने अहंत्व को त्याग देता है, वह गुरु के उपदेश द्वारा जीवित ही मोह-माया से मरा रहता है।

40वह अपने मन को जीत कर ईश्वर से मिल जाता है और उसकी वीरता के लिए उसको सम्मान की वेशभूषा मिलती है।

41किसी पदार्थ को भी वह अपना नहीं समझता। एक ईश्वर ही उसका सहारा एवं आसरा होता है।

42वह रात-दिन अनन्त ईश्वर की आराधना करता रहता है।

43वह अपने इस मन को सबकी चरण धूलि बना देता है, ऐसे कर्म वह करता है।

44हे नानक ! ईश्वर के हुक्म को समझ कर वह सदैव सुख प्राप्त करता है और जो कुछ उसके भाग्य में लिखा होता है, उसको प्राप्त कर लेता है॥ ३१॥

45श्लोक॥

46मैं अपना तन, मन एवं धन उसको समर्पित करता हूँ, जो मुझे मेरे प्रभु से मिला दे।

47हे नानक ! चूंकि प्रभु-मिलाप से ही दुविधा एवं भय नाश हो जाते हैं और मृत्यु का आतंक भी दूर हो जाता है॥१ ॥

48पउड़ी ॥

49त - उस परमात्मा से प्रीति करो जो गुणों का भण्डार एवं सृष्टि का स्वामी है।

50तुझे अपने मनोवांछित फल प्राप्त होंगे और तृष्णा मिट जाएगी।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं