गुरु ग्रंथ साहिब 254 · Raag Gauree
1श्लोक॥
2(हे जिज्ञासु !) अपने चित्त में भलीभाँति विचार कर देख लो, कि लोगों ने इस दुनिया से निश्चित ही चले जाना है।
3हे नानक ! क्षणभंगुर पदार्थों की तृष्णा गुरु की शरण लेने से ही मिटती है। केवल भगवान के नाम में ही अरोग्यता है॥ १ ॥
4पउड़ी॥
5ग - (हे जिज्ञासु !) अपने प्रत्येक श्वास से गोविन्द की गुणस्तुति करते रहो और नित्य उसका भजन करो।
6शरीर के ऊपर क्या विश्वास किया जा सकता है ? हे मेरे मित्र ! देरी न कर।
7चाहे बचपन हो, जवानी हो, बुढ़ापा हो, मृत्यु को आने से किसी समय भी रुकावट नहीं है।
8उस वक्त का पता नहीं लग सकता कि कब यमराज का रस्सा गले में आ पड़ता है।
9यह बात समझ लो चाहे कोई ज्ञानी हो, चाहे कोई ध्यानी हो, चाहे कोई चतुर हो, किसी ने भी दुनिया में सदा नहीं रहना।
10मूर्ख ही उन वस्तुओं की प्राप्ति में लगते हैं, जिन्हें समूचा जगत् त्याग गया है।
11जिसके माथे पर शुभ भाग्य लिखा हुआ है, वह गुरु की कृपा से प्रभु का भजन करता रहता है।
12हे नानक ! जिन्हें प्रियतम प्रभु का सौभाग्य प्राप्त है, उनका ही इस संसार में आगमन सफल है॥ १६॥
13श्लोक॥
14मैंने समस्त शास्त्र एवं वेद अध्ययन करके देख लिए हैं। कोई भी यह नहीं बताता किं भगवान के अलावा कोई अन्य भी हमेशा रहने वाला है।
15हे नानक ! एक परमेश्वर ही सृष्टि के आदि में, युगों के आरम्भ में था, अब है और हमेशा ही रहने वाला है॥ १॥
16पउड़ी।
17घ - अपने मन में यह बात दृढ़ कर लो कि प्रभु के अलावा कोई नहीं।
18न कोई था और न ही आगे कोई होगा। वह प्रभु सर्वव्यापक हो रहा है।
19हे मन ! यदि तू प्रभु की शरण लेगा तो ही प्रभु में लीन होगा।
20इस कलियुग में प्रभु का नाम ही वास्तविक प्रायश्चित कर्म है।
21दुविधा में मेहनत-परिश्रम करके अनेकों पश्चाताप करते हैं।
22भगवान की भक्ति के सिवाय कैसे शांति मिल सकती हैं ?
23हे नानक ! वह इसे घोलकर पान करता है
24जिसे हरि रूप गुरु जी महारस अमृत प्रदान करते हैं॥ २०॥
25श्लोक ॥
26समस्त दिवस एवं श्वास प्रभु ने गिन कर ही मनुष्य में डाले हैं। वह एक तिलमात्र भी न अधिक होते हैं और न ही कम होते हैं।
27हे नानक ! जो व्यक्ति भ्रम एवं मोह में जिंदगी जीना चाहते हैं, ऐसे व्यक्ति मूर्ख हैं।॥ १॥
28पउड़ी॥
29ङ - काल (मृत्यु) उसे अपना ग्रास बना लेता है, जिसे प्रभु ने नास्तिक बना दिया है।
30जो व्यक्ति राम को अनुभव नहीं करते, वे अनेकों योनियों में जन्मते-मरते रहते हैं।
31केवल वही व्यक्ति ज्ञान एवं ध्यान को प्राप्त करता है,
32जिस पर ईश्वर स्वयं कृपा करके देता है।
33कर्मों का लेखा पता करने से कोई भी मुक्त नहीं हो सकता।
34यह शरीर मिट्टी की कच्ची गागर है जिस ने निश्चित ही टूट जाना है,
35केवल वही जीवित है, जो जीवित ही प्रभु का भजन करता है।
36हे नानक ! भगवान का सिमरन करने वाला मनुष्य छिपा नहीं रहता अपितु जगत् में प्रसिद्ध हो जाता है।॥ २१ ॥
37श्लोक॥
38अपने चित्त में प्रभु के सुन्दर चरणों का चिन्तन करने से मेरा विपरीत मन कमल की भाँति प्रफुल्लित हो गया है।
39हे नानक ! संतजनों के उपदेश से गोविन्द स्वयं ही प्रकट हो जाता है॥ १॥
40पउड़ी ॥
41च – जब गुरु के सुन्दर चरणों में मन लगा, वह दिन बड़ा शुभ है, वह संयोग भी भाग्यशाली है ।
42मैं चारों तरफ एवं दस दिशाओं से भटक कर आया हूँ।
43जब प्रभु ने कृपा की तो ही मुझे गुरु के दर्शन प्राप्त हुए।
44भगवान की महिमा का विचार करने से समूह द्वैतवाद नाश हो गया है।
45संतों की संगति में मेरा मन निर्मल हो गया है।
46हे नानक ! वह चिन्ता को भूल जाता है और वह एक ईश्वर के दर्शन कर लेता है,
47जिसके नेत्रों में ज्ञान का सुरमा पड़ जाता है ॥२२ ॥
48श्लोक॥
49गोविन्द की महिमा के छंद गायन करने से छाती शीतल एवं मन सुखी हो जाता है।
50नानक की प्रार्थना है कि हे मेरे प्रभु! मुझ पर ऐसी कृपा-दृष्टि करो कि मैं तेरे दासो का दास बन जाऊँ॥ १॥
51पउड़ी ॥
52छ - मैं तेरा दास बालक हूँ।
53मैं तेरे दासों के दासों का जल भरने वाला हूँ।
54छ - मैं तेरे संतों की चरण-धूलि बन जाऊँ,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं