सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 252 · Raag Gauree

1पउड़ी॥

2हे मेरे मन ! परमेश्वर के अलावा जिस किसी (मोह) में भी तू प्रवृत्त होता है, वहाँ ही तुझे बन्धन जकड़ लेते हैं।

3शाक्त इन्सान वही कर्म करता है, जिससे उसको कभी मुक्ति नहीं मिल सकती।

4कर्मों के प्रेमी अपने शुभ-अशुभ कर्मों का अहंकार करते रहते हैं, इस अहंकार का असह्य बोझ उन्हें ही सहन करना पड़ता है।

5जब प्रभु के नाम से प्रेम नहीं तो यह कर्म विकार भरे हैं।

6जो मधुर माया से प्रेम करते हैं, वे मृत्यु की फाँसी में फँसे हुए हैं।

7दुविधा में फँसे हुए प्राणी समझते नहीं कि ईश्वर सदैव उनके साथ है।

8जब उनके कुकर्मों का लेखा-जोखा किया जाता है उनको मुक्ति नहीं मिलती। गारे की कच्ची दीवार कभी स्वच्छ नहीं हो सकती।

9हे नानक ! जिस मनुष्य को प्रभु स्वयं सूझ प्रदान करता है, उस गुरमुख की बुद्धि निर्मल हो जाती है।॥ ९॥

10श्लोक॥

11जिस जीव के (माया के) बन्धन कट जाते हैं, उसे संतों की संगति मिल जाती है।

12हे नानक ! जो जीव एक ईश्वर के प्रेम रंग में मग्न रहते हैं, उनका रंग बहुत गहरा होता है, जो कभी उतरता नहीं॥ १॥

13पउड़ी ॥

14र – अपने इस मन को प्रभु के प्रेम से रंग लो।

15अपनी रसना से प्रभु-परमेश्वर के नाम का बार-बार भजन करो।

16प्रभु के दरबार में तुझे कोई निरादर के शब्द नहीं बोलेगा।

17सभी यह संबोधन करके तेरा स्वागत करेंगे, "आइए पधारिए"।

18प्रभु के उस दरबार में तुझे निवास मिलेगा।

19प्रभु के दरबार में कोई जन्म, मृत्यु एवं विनाश नहीं।

20हे नानक ! जिसके माथे पर शुम कर्मों द्वारा कृपा का लेख लिखा होता है,

21उसी व्यक्ति के हदय-घर में हरि-नाम रूपी संपति होती हैं। ॥ १० ॥

22श्लोक ॥

23हे नानक ! जो व्यक्ति लालच, झूठ, पाप, सांसारिक मोह के बन्धनों में फंस जाते हैं, उन ज्ञानहीन मूर्खों को ये विकार दबाव डालते रहते हैं।

24माया में फँसे हुए वे कुकर्मों में ही लगे रहते हैं॥ १॥

25पउड़ी॥

26ल - मनुष्य पाप से भरे विकारों में लिपटे रहते हैं।

27वह अहंबुद्धि एवं माया के नशे में मग्न रहते हैं।

28इस मोहिनी के जाल में फँसकर प्राणी (जन्म-मरण के चक्र में पड़कर) संसार मेंआते-जाते रहते हैं

29(लेकिन प्राणी के वश में कुछ नहीं) जैसे जैसे ईश्वर की आज्ञा होती है, वैसे ही प्राणी करते हैं।

30कोई भी प्राणी अधूरा नहीं और कोई पूर्ण भी नहीं।

31अपने आप न कोई चतुर है और न ही कोई मूर्ख।

32जहाँ कहीं भी प्रभु प्राणी को लगाता है, वहीं वह लग जाता है।

33हे नानक ! ईश्वर हमेशा (माया के प्रभाव से) निर्लिप्त रहता है॥ ११॥

34श्लोक ॥

35वह गोविन्द गोपाल हम सबका प्रिय है। मेरा प्रियतम प्रभु सर्वज्ञाता, धैर्यवान एवं विशाल हृदय वाला तथा अथाह है।

36हे नानक ! उस जैसा दूसरा कोई नहीं। वह बिल्कुल बेपरवाह है॥ १॥

37पउड़ी ॥

38ल - उसके समान दूसरा कोई नहीं।

39वह ईश्वर एक है, उस जैसा दूसरा कोई होगा भी नहीं।

40वह अब भी अस्तित्व में है, वही होगा और सदा होता आया है।

41उसका अन्त कभी किसी को भी नहीं मिला।

42चींटी से लेकर हाथी तक सब में प्रभु मौजूद है।

43सर्वव्यापक परमेश्वर हर तरफ प्रत्यक्ष गोचर है।

44हे नानक ! जिस किसी को भी प्रभु अपना हरि-रस प्रदान करता है,

45वह गुरु के आश्रय द्वारा हरि-परमेश्वर का भजन करता रहता है॥ १२॥

46श्लोक॥

47जो व्यक्ति प्रभु के अमृत के स्वाद को जानता है, वह सहज ही हरि के प्रेम का आनंद लेता है।

48हे नानक ! वे व्यक्ति भाग्यशाली हैं एवं उनका इस संसार में जन्म लेना सफल है॥ १॥

49पउड़ी॥

50उसका इस जगत् में आगमन सफल गिना जाता है

51जिसकी जिव्हा प्रभु-परमेश्वर की महिमा करती रहती है।

52वह (संसार में) आकर संतों से संगति करता है

53और रात-दिन प्रेमपूर्वक नाम का ध्यान करता है।

54उस जीव का जन्म सफल है, जो प्रभु के नाम में मग्न हुआ है

55और जिस पर विधाता की दया एवं कृपा हुई है।

56ऐसा जीव (संसार में) एक बार ही जन्म लेता है और पुनः योनि के चक्र में नहीं पड़ता।

57हे नानक ! ऐसा व्यक्ति प्रभु के दर्शनों में ही समा जाता है॥ १३॥

58शलोक॥

59हे नानक ! जिस ईश्वर का भजन करने से मन में प्रसन्नता उत्पन्न होती है, द्वैतवाद का मोह मिट जाता है एवं दुःख, दर्द व सांसारिक तृष्णा का नाश हो जाता है, उसके नाम में समा जाओ॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं