गुरु ग्रंथ साहिब 251 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1हे नानक ! नामविहीन सभी इन्सान धूलि होते जा रहे हैं।॥ १॥
2पउड़ी॥
3ध-हे प्रभु ! तेरे सन्तों-भक्तों की चरण-धूलि पवित्र पावन है।
4जिनके हृदय में इस धूलि की इच्छा है, वे भाग्यशाली हैं।
5ऐसे लोग धन को नहीं चाहते और स्वर्ग की भी चाहत नहीं रखते।
6क्योंकि वह प्रिय प्रभु के प्रेम एवं संतों की चरण-धूलि में मग्न रहते हैं।
7सांसारिक माया का बन्धन उन पर प्रभाव नहीं डाल सकता, जो लोग ईश्वर का सहारा त्याग कर कहीं ओर नहीं जाते।
8हे नानक ! जिस व्यक्ति के हृदय में प्रभु ने अपना नाम बसा दिया है,
9वही व्यक्ति भगवान के पूर्ण संत हैं॥ ४॥
10श्लोक॥
11अनेक धार्मिक वेश धारण करने एवं ज्ञान, ध्यान एवं मन के हठ से भगवान में सुरति लगाने से कोई भी पुरुष ईश्वर से नहीं मिल सकता।
12हे नानक ! जिस व्यक्ति पर ईश्वर की कृपा हो जाती है, वही भक्त एवं ज्ञानी है॥ १ ॥
13पउड़ी ॥
14ड-ज्ञान केवल मौखिक बातों से प्राप्त नहीं होता।
15शास्त्रों की बताई हुई अनेकों विधियों की युक्तियों द्वारा भी प्राप्त नहीं होता।
16केवल वही ज्ञानी है, जिसके हृदय में प्रभु बसा हुआ है।
17कहने एवं सुनने से मनुष्य मूल रूप से ही योग्य नहीं होता।
18जो मनुष्य प्रभु की आज्ञा मानने में तत्पर रहता है, वही ईश्वर का वास्तविक ज्ञानी है।
19गर्मी और सर्दी (दुःख-सुख) सभी उसके लिए एक समान हैं।
20हे नानक ! ज्ञानी वहीं है, जो गुरु की शरण में प्रभु का भजन करता है
21और जिस पर वह अपनी कृपा करता है॥ ५॥
22श्लोक ॥
23आने वाले सृष्टि में आते हैं परन्तु जीवन का सन्मार्ग समझे बिना वे जानवर एवं पशुओं की भाँति ही रहे हैं।
24हे नानक ! गुरु की शरण में केवल वही प्रभु को समझता है, जिसके मस्तक पर भाग्यरेखाएँ विद्यमान होती हैं।॥ १॥
25पउड़ी॥
26इस जगत् में मनुष्य ने प्रभु का भजन करने के लिए जन्म लिया है
27लेकिन जन्म काल से ही मोह लेने वाली माया ने उसको मुग्ध कर लिया है।
28माता के गर्भ में विपरीत लटका हुआ प्राणी तपस्या करता था।
29वहाँ वह अपनी हर सांस से प्रभु की आराधना करता रहता था।
30वह उस माया से उलझ गया है, जिसे उसने अवश्य छोड़ जाना है।
31दाता प्रभु को वह अपने हृदय से विस्मृत कर देता है।
32हे नानक ! गोसाई जिस व्यक्ति पर कृपा धारण करता है, वह लोक-परलोक में उसे नहीं भूलते॥ ६॥
33श्लोक॥
34इन्सान ईश्वर के हुक्म से दुनिया में जन्म लेता है, उसके हुक्म से वह मृत्यु प्राप्त करता है। कोई भी इन्सान ईश्वर के हुक्म का विरोध नहीं कर सकता।
35हे नानक ! जिस इन्सान के हृदय में ईश्वर का निवास हो जाता है, उसका जन्म-मरण का चक्र मिट जाता है॥ १॥
36पउड़ी॥
37ये प्राणी अनेक योनियों में वास करते हैं।
38मीठे मोह में मस्त होकर प्राणी योनियों के चक्र में फंस जाते हैं।
39इस मोहिनी ने (प्राणियों को) अपने तीन गुणों के वश में किया हुआ है।
40इस मोहिनी ने प्रत्येक प्राणी के हृदय में अपना मोह टिका दिया है।
41हे मित्र ! मुझे कोई ऐसा उपाय बता,
42जिससे मैं मोहिनी के विषम सागर से पार हो जाऊँ ।
43हे नानक ! जिस व्यक्ति पर ईश्वर कृपा दृष्टि करके सत्संग में मिलाता है,
44माया उसके निकट नहीं आती॥ ७ ॥
45श्लोक॥
46ईश्वर स्वयं (प्राणी में विद्यमान होकर) उससे शुभ-अशुभ कर्म करवाता है।
47लेकिन इस बात का मूर्ख मनुष्य अहंकार एवं अभिमान करता है। लेकिन हे नानक ! भगवान के अलावा प्राणी कुछ भी करने में सक्षम नहीं॥ १॥
48पउड़ी॥
49एक ईश्वर ही प्राणियों से कर्म करवाता है।
50वह स्वयं पाप एवं पुण्य का प्रसार करता है।
51इस मनुष्य जन्म में प्रभु जिस-जिस ओर स्वयं लगाता है, उधर ही प्राणी लगते हैं।
52जो कुछ ईश्वर स्वयं प्रदान करता है, वह वही कुछ प्राप्त करते हैं।
53उस ईश्वर का अन्त कोई भी नहीं जानता।
54जो कुछ प्रभु (संसार में) करता है, आखिरकार वही कुछ होता है।
55इस जगत् का प्रसार केवल ईश्वर द्वारा ही हुआ है।
56हे नानक ! ईश्वर स्वयं ही जीवों का जीवन संवारने वाला है॥ ८ ॥
57श्लोक ॥
58मनुष्य नारियों एवं ऐश्वर्य-विलासों में लीन रहता है। विषय-विकारों का शोर-शराबा कुसुंभे के फूल की तरह क्षणभंगुर है।
59हे नानक ! मैं तो उस ईश्वर की शरण लेता हूँ, जिसकी कृपा से अहंकार एवं मोह दूर हो जाते हैं।॥ १॥ |
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं