गुरु ग्रंथ साहिब 250 · Raag Gauree
1ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
2गउड़ी बावन अखरी महला ५ ॥
3श्लोक॥
4गुरु ही माता है, गुरु ही पिता है और गुरु ही जगत् का स्वामी परमेश्वर है।
5गुरु अज्ञानता का अन्धकार नाश करने वाला साथी है और गुरु ही संबंधी एवं भाई है।
6गुरु परमात्मा के नाम का दाता और उपदेशक है और गुरु ही अचूक मन्त्र है।
7गुरु सुख-शांति, सत्य एवं बुद्धि की मूरत है। गुरु ऐसा पारस है, जिसको स्पर्श करने से प्राणी का उद्धार हो जाता है।
8गुरु ही तीर्थ एवं अमृत का सरोवर है। गुरु के ज्ञान में स्नान करने से मनुष्य अनन्त प्रभु को मिल जाता है।
9गुरु ही कर्तार एवं समस्त पापों को नाश करने वाला हैं। गुरु ही पतित को पवित्र पावन करने वाला है।
10गुरु आदि, युगों के आरम्भ से एवं युग-युग में विद्यमान हैं। गुरु हरि के नाम का मन्त्र है, जिसका भजन करने से प्राणी का भवसागर से उद्धार हो जाता है।
11हे मेरे प्रभु ! कृपा करके मुझ मूर्ख एवं पापी को गुरदेव की संगति में मिला दो, जिससे मिलकर मैं जीवन के विषम सागर से पार हो जाऊँ।
12हे नानक ! गुरु ही सतिगुरु एवं पारब्रह्म परमेश्वर है और उस गुरदेव हरि को नमस्कार है॥ १॥
13श्लोक ॥
14परमात्मा ने स्वयं ही सृष्टि-रचना की है और वह स्वयं ही इसे करने में समर्थ है।
15हे नानक ! एक परमेश्वर ही सारी सृष्टि में मौजूद है और उसके सिवाय न कोई है और न ही कोई होगा।॥ १॥
16पउड़ी॥
17मैं उस एक ईश्वर संत स्वरूप सतिगुरु को प्रणाम करता हूँ।
18निरंकार प्रभु संसार के प्रारंभ में भी स्वयं ही था, वर्तमान में भी है और भविष्य में भी स्वयं ही मौजूद रहेगा।
19प्रभु स्वयं ही शून्य अवस्था में होता है और स्वयं ही सुख आसन (शांत समाधि) में होता है।
20वह स्वयं ही अपना यश सुनता है।
21अपना प्रत्यक्ष रूप उसने स्वयं ही उत्पन्न किया है।
22वह स्वयं ही अपना पिता है और स्वयं ही अपनी माता है।
23वह स्वयं ही प्रत्यक्ष है और स्वयं ही अप्रत्यक्ष है।
24हे नानक ! उस ईश्वर की लीला कथन नहीं की जा सकती।
25हे दीनदयालु प्रभु ! मुझ पर कृपा करो
26चूंकि मेरा मन तेरे संतों की चरण-धूलि बन जाए॥ रहाउ॥
27श्लोक।
28निरंकार परमेश्वर स्वयं ही (सृष्टि) आकार की रचना करता है। वह स्वयं ही निर्गुण और सगुण है।
29हे नानक ! यही बखान किया जा सकता है कि निरंकार ईश्वर अकेला स्वयं ही है चूंकि एक ईश्वर अनेक रूप बना लेता है॥ १॥
30पउड़ी॥
31एक ईश्वर ने गुरमुख बनने के लिए संसार की रचना की है।
32इस रचना में समस्त जीव-जन्तुओं को अपने एक ही सूत्र में पिरोया हुआ है।
33माया के तीन लक्षणों का उसने भिन्न-भिन्न प्रसार कर दिया है।
34निर्गुण से वह सगुण दृष्टिमान होता है।
35कर्तार ने अनेक प्रकार की संसार की रचना की है।
36जन्म-मरण का मूल सांसारिक मोह ईश्वर ने प्राणी के मन में खुद ही बढ़ाया हुआ है।
37लेकिन दोनों (जन्म-मरण) प्रकार से वह स्वयं अलग है।
38हे नानक ! ईश्वर के आर-पार का अन्त नहीं मिल सकता॥ २॥
39श्लोक॥
40वहीं व्यक्ति शाह एवं भाग्यवान है जिनके पास सत्य की संपति एवं प्रभु के नाम की पूंजी है।
41हे नानक ! उन संतजनों के पास से ही सत्य (नाम) एवं पवित्रता की प्राप्त होती है।॥ १॥
42पउड़ी॥
43स-वह परमात्मा सदैव सत्य, सत्यस्वरूप एवं सत्य का पुंज है।
44कोई भी सत्यस्वरूप प्रभु से अलग नहीं।
45जिस प्राणी को ईश्वर अपनी शरण में लेता है, केवल वही प्राणी उसकी शरण में आता है।
46ऐसा प्राणी प्रभु की महिमा-स्तुति ही करता रहता है और दूसरों को भी उसकी महिमा सुनाता रहता है।
47ऐसे प्राणी को दुविधा एवं भ्रम कदाचित प्रभाव नहीं डालते।
48उस प्राणी को प्रभु का प्रताप प्रत्यक्ष ही दिखाई देता है।
49केवल वही संत है, जो इस आत्मिक अवस्था को प्राप्त करता है,
50हे नानक ! मैं उस पर सदैव कुर्बान जाता हूँ॥ ३॥
51श्लोक॥
52(हे जीव !) तू हर वक्त धन की लालसा के लिए क्यों चिल्लाता रहता है। क्योंकि माया का मोह बिल्कुल मिथ्या है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं