सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 24 · Siree Raag

1श्रीरागु महला १ घरु ३ ॥

2गुरु जी कथन करते हैं कि हे जीव ! शुभ कर्मों को भूमि बना कर उसमें गुरु-उपदेश रूपी बीज का रोपण करो और सत्य-नाम रूपी जल से इसकी सिंचाई करो।

3इस प्रकार तुम कृषक बन कर धार्मिक-निष्ठा को उत्पन्न करो, इससे तुझे स्वर्ग-नरक का ज्ञान प्राप्त होगा I १II

4यह मत समझ लेना केि ज्ञान केवल बातों से ही प्राप्त हो जाता है।

5धन -सम्पति के अभिमान तथा रूप की शोभा में तुम ने अपना जन्म निष्फल ही गंवा लिया है॥ १॥ रहाउ ॥

6मानव शरीर में अवगुण कीचड़ की भाँति हैं तथा मन मेंढक समान, ऐसे में निकट ही विकसित हुए कमल की उसे कोई सूझ नहीं है। अर्थात्-अवगुणों के कीचड़ में फँसे मानव मन रूपी मेंढक ने परमात्मा रूपी कमल की पहचान कदाचित नहीं की है।

7गुरु रूपी मैंनरा नित्य प्रति आकर अपनी भाषा बोलता है, अर्थात-उपदेश देता है, लेकिन मेंढक रूपी मानव मन इसे कैसे समझ सकता है, जब तक प्रभु स्वयं इस मन को समझा न दे॥ २॥

8जिनका मन माया में रंजित है, उनको उपदेश देना अथवा उनके द्वारा उपदेश अवण करना (पवन की वाणी ) व्यर्थ की बात है।

9स्वामी की कृपा-दृष्टि में तथा हृदय में प्रिय वही जीव हैं, जिन्होंने एक परमेश्वर को स्मरण किया है॥ ३॥

10हे काजी ! सुनो, तुम तीस रोज़े रखते हो, तथा पाँच समय की नमाज़ तुम्हारी साथीं है, किन्तु देखना, कहीं ऐसा न हो (कान, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार में से कोई) शैतान इन को नष्ट न कर दे।

11गुरु जी कहते हैं कि हे काज़ी ! एक दिन तुम ने भी मृत्यु-मार्ग पर चलना है, फिर यह धन-सम्पति तुम किस के लिए संग्रहित कर रहे हो ॥ ४॥ २७ ॥

12श्रीरागु महला १ घरु ४ ॥

13वही परमात्मा है, जिसने इस जगत् को प्रफुल्लित किया है तथा संसार को हरा-भरा किया है।

14जिस परमात्मा ने पानी व पृथ्वी आदि पाँच तत्वों से सम्पूर्ण सृष्टि को बांध रखा है, वह सृजनहार परमात्मा धन्य है॥ १॥

15हे मुल्लां ! मृत्यु अपरिहार्य है।

16परमात्मा से डरना चाहिए॥ १॥ रहाउ॥

17तभी तुम श्रेष्ठ मुल्लां हो सकते हो, तभी तुम श्रेष्ठ काजी हो सकते हो, यदि तुम परमात्मा के नाम के बारे में जानते हो।

18यदि तुम बहुत विद्वान हो तो भी तुम मृत्यु से बच कर नहीं रह सकते अर्थात् पनधड़ी की भाँति भर जाने पर डूब जाओगे॥ २॥

19असली काज़ी तो वही है, जिस ने अहंत्व का त्याग किया है और एक प्रभु के नाम का आश्रय लिया है।

20सत्य सृष्टि का सृजनहार आज भी है, भविष्य में भी होगा, उसकी यह रचना तो नष्ट हो जाएगी, किन्तु वह नष्ट नहीं होगा ॥ २॥

21बेशक तुम पांचों समय की नमाज़ पढ़ते हो, चाहे कुरान शरीफ आदि धार्मिक ग्रंथ भी पढ़ते हो।

22नानक देव जी कहते हैं कि हे काज़ी ! जब तुम्हें मृत्यु कब्र की ओर बुलाएगी तो तुम्हारा खाना-पीना ही समाप्त हो जाएगा।॥४॥२८॥

23श्रीरागु महला १ घरु ४ ॥

24गुरु जी कहते हैं कि जीव के साथ लोभ रूपी कुत्ता है तथा आशा व तृष्णा रूपी दो कुतियाँ हैं।

25सदैव प्रातः होते ही ये आहार हेतु भौंकने लग जाते हैं।

26जीव के पास झूठ रूपी छुरा है, जिससे वह सांसारिक प्राणियों को ठग कर खाता है। अर्थात् जीव झूठ के आसरे अभक्ष्य पदार्थ सेवन करता है।

27हे प्रभु ! सांसारिक जीव हत्यारे के रूप में रह रहा है॥ १॥

28जीव के लिए गुरु जी स्वयं को पुरुष मान कर कहते हैं कि मैंने उस प्रभु-पति की प्रतिष्ठित शिक्षा ग्रहण नहीं की तथा न ही कोई श्रेष्ठ कार्य किया है।

29मैं ऐसे विकृत विकराल रूप में रह रहा हूँ।

30हे प्रभु ! आपका एक नाम ही भवसागर पार करने वाला है!

31मुझे इसी नाम की आशा है और इसी नाम का आश्रय है॥ १॥ रहाउ॥

32मैं अपने मुंह से दिन-रात निन्दा करता रहता हूँ।

33मैं निम्न वर्ग वाला चोरी करने हेतु पराए घरों की ओर देखता रहता हूँ।

34इस देह में काम-क्रोधादि चाण्डाल बसते हैं।

35हे प्रभु ! मैं हत्यारे के रूप में रह रहा हूँ॥ २॥

36मेरा ध्यान लोगों को फँसाने में लगा रहता है, यद्यपि मेरा बाह्य भेष फकीरों वाला है।

37मैं बड़ा ठग हूँ तथा दुनिया को ठग रहा हूँ।

38मैं स्वयं को बहुत चतुर समझता हूँ, लेकिन मेरे ऊपर पापों का बहुत भार पड़ा हुआ है।

39हे प्रभु ! मैं हत्यारे के रूप में रह रहा हूँ॥ ३॥

40मैंने प्रभु के किए उपकारों को भी नहीं जाना, अतः मैं कृतघ्न हूँ।

41मैं दुष्ट चोर हूँ, सो मैं किस मुँह से परमात्मा के दरबार में जाऊँगा। अर्थात् मैं अपने कुकृत्यों से इतना शर्मिन्दा हूँ कि प्रभु के द्वार पर क्या मुँह लेकर जाऊँ।

42गुरु नानक देव जी स्वयं को जीव रूप में सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि मैं इतना नीच हो गया हूँ।

43मैं हत्यारे के रूप में रह रहा हूँ। अर्थात्-इस स्वरूप में मेरी मुक्ति कैसे होगी ? ॥ ४॥ २९ ॥

44श्रीरागु महला १ घरु ४ ॥

45इस दुनिया में जितने भी जीव हैं, उन सब में एक-सी सूझ है।

46इस सूझ से वंचित कोई भी नहीं है

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं