सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 249 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1हे मन ! पूर्ण परमेश्वर भक्तवत्सल है, उससे मनवांछित मनोकामनाएँ प्राप्त होती हैं।

2प्रभु मनुष्य को अन्धकूप से बाहर निकाल लेता है। उसके नाम को अपने हृदय में बसाओ।

3हे प्रभु ! देवते, सिद्ध पुरुष, देवगण, गन्धर्व, मुनिजन एवं भक्त तेरी ही भक्ति का यशोगान करते हैं।

4नानक प्रार्थना करता है - हे मेरे पारब्रह्म ! हे हरि बादशाह ! मुझ पर कृपा करो। २॥

5हे मेरे मन ! उस पारब्रह्म परमेश्वर का भजन कर, जो सर्वकला सम्पूर्ण है।

6प्रभु समर्थावान एवं दया का पुंज है। वह प्रत्येक हृदय के प्राणों का आधार है।

7अनन्त, अगम्य, अपार प्रभु प्राण, मन एवं तन का दाता है।

8शरण में आने वाले की रक्षा करने वाला, समर्थावान एवं मन चुराने वाला मोहन तमाम दुख निवृत्त कर देता है।

9हे मन ! मुरारी प्रभु के नाम का भजन करने से समस्त रोग, शोक एवं दोष नाश हो जाते हैं।

10नानक प्रार्थना करता है - हे समर्थावान प्रभु ! तू सर्वकला सम्पूर्ण हैं, मुझ पर भी कृपा करो।॥ ३॥

11हे मेरे मन ! जो सदा अटल रहने वाला, अनश्वर है एवं जो सर्वोपरि है, उस दया के घर परमात्मा की महिमा-स्तुति करते रहो।

12केवल विश्वंभर ही दुनिया को देन देने वाला है और वह समस्त जीव-जन्तुओं का पोषण करता है।

13परम दयालु एवं बुद्धिमान सृष्टि का पालनहार सब पर दया करता है।

14जिस इन्सान के हृदय में प्रभु आ बसता है, दुखदायक काल, लोभ, मोह उससे भाग जाते हैं।

15हे मन ! जिस पर प्रभु देवा सुप्रसन्न हो जाता है, उसकी सेवा फलदायक एवं परिश्रम सम्पूर्ण हो जाता है।

16नानक प्रार्थना करता है-दीनदयाल ईश्वर का भजन करने से प्रत्येक इच्छा पूर्ण हो जाती है॥ ४॥ ३॥

17गउड़ी महला ५ ॥

18हे मेरी सत्संगी सखी ! सुन, हम मिलकर (भजन) उपाय करके अपने पति-परमेश्वर को प्रसन्न करें।

19अपना अहंकार त्यागकर भक्ति को ठगबूटी बनाकर और संतों (गुरु) के मन्त्र (वाणी) द्वारा आओ हम मिलकर उसे (पति) मुग्ध कर लें।

20हे मेरी सत्संगी सखी ! यदि वह एक बार हमारे वश में हो जाए तो वह फिर हमें त्याग कर नहीं जाएगा। उस भगवान की यही सुन्दर मर्यादा है।

21हे नानक ! (जो उसकी शरण में आता है) परमेश्वर उस प्राणी का बुढ़ापा, मृत्यु एवं नरक का भय दूर कर देता है और वह प्रसन्न होकर उसको पवित्र कर देता है॥ १॥

22हे मेरी सखियो ! इस भली प्रार्थना की तरफ ध्यान दो। आओ हम मिलकर सुदृढ़ फैसला करें।

23रोगों से रहित होकर आओ हम सहज ही गोविन्द का यश गायन करें।

24इससे (हमारे विकारों का) क्लेश एवं लड़ाई झगड़े निवृत्त हो जाएँगे। दुविधा मिट जाएगी और हम मनोवांछित फल प्राप्त कर लेंगे।

25हे नानक ! आओ हम पूर्ण पारब्रह्म परमेश्वर के नाम का ध्यान करें ॥ २॥

26हे मेरी सत्संगी सखी ! मैं सदैव उसकी इच्छा करती हूँ और उससे सुख माँगती हूँ। प्रभु मेरी आशा पूर्ण करे।

27मैं प्रभु के चरणों की प्यासी हूँ और उसके दर्शनों की इच्छा करती हूँ। उसको में सर्वव्यापक देखती है।

28(हे सखी !) ईश्वर को खोज कर मैं संतों की संगति प्राप्त करती हूँ। (क्योंकि) साधु-संत ही प्राणी को समर्थावान प्रभु से मिला देते हैं।

29हे नानक ! हे माता! वही व्यक्ति भाग्यशाली हैं जिन्हें देवलोक का स्वामी एवं सुखों का दाता प्रभु मिल जाता है॥ ३॥

30हे मेरी सत्संगी सखी ! अब मैं प्रियतम पति के साथ रहती हूँ। मेरा मन एवं तन प्रभु के साथ एक हो गया है।

31हे मेरी सत्संगी सखी ! सुनो, मेरी नींद भली है, क्योंकि मुझे अपना प्रियतम पति मिल गया है।

32मेरी दुविधा दूर हो गई है। मुझे शांति एवं सुख प्राप्त हो गए हैं। प्रभु का मेरे भीतर प्रकाश हो गया है और मेरा कमल रूपी ह्रदय प्रफुल्लित हो गया है।

33हे नानक ! अन्तर्यामी प्रभु को मैंने वर के रूप में पा लिया है, मेरा सुहाग कभी समाप्त नही होगा॥ ४॥ ४॥ २॥ ५॥ ११॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं