गुरु ग्रंथ साहिब 248 · Raag Gauree
1गउड़ी महला ५ ॥
2हे मेरे मोहन ! तेरे मन्दिर बहुत ऊँचे हैं और तेरा महल अनन्त है।
3हे मोहन ! तेरे द्वार अति सुन्दर हैं। वे साधु-संतों के लिए पूजा-स्थल हैं।
4तेरे मन्दिर में संत जन सदैव ही अनन्त एवं दयावान प्रभु का भजन गायन करते रहते हैं।
5जहाँ साधु एवं संतों की सभा होती है, वहाँ वह तेरी ही आराधना करते हैं।
6हे दयालु स्वामी ! दया एवं कृपा करो तथा दीनों पर कृपालु हो जाओ।
7नानक विनती करता है - मैं तेरे दर्शनों हेतु प्यासा हूँ। तेरे दर्शन करके मैं तमाम सुख प्राप्त कर लेता हूँ॥ १॥
8हे मोहन ! तेरी वाणी बड़ी अनूप है और तेरी चाल (मर्यादा) बड़ी अनोखी है।
9हे मोहन ! तू एक ईश्वर में ही आस्था रखता है, तेरे लिए शेष समस्त धूल के तुल्य है।
10हे मोहन ! तुम एक परमात्मा की आराधना करते हो, जो अपनी अपार शक्ति द्वारा सृष्टि को सहारा दे रहा है।
11हे मोहन ! गुरु के उपदेश द्वारा तूने आदिपुरुष सृजनहार के हृदय को जीत लिया है।
12हे मोहन ! तू स्वयं ही (आयु भोगकर) चलते हो, स्वयं ही स्थिर व्यापक हो और स्वयं ही सृष्टि में अपनी सत्ता व्याप्त की हुई है।
13नानक प्रार्थना करता है - (हे प्रभु !) मेरी मान-प्रतिष्ठा की रक्षा कीजिए! तेरे समस्त सेवक तेरी शरण ढूंढते हैं॥ २॥
14हे मोहन ! साधु-संतों की संगति (सत्संग) तेरा भजन करती है और तेरे दर्शनों का ध्यान करती है।
15हे चितचोर मोहन ! जो प्राणी अन्तिम समय आपको स्मरण करते हैं, यमदूत उसके निकट नहीं आता।
16यमकाल (मृत्यु का समय) उसे स्पर्श नहीं कर सकता, जो प्राणी एक हृदय से प्रभु का भजन करता है।
17हे मोहन ! जो पुरुष अपने मन, वचन एवं कर्म द्वारा तेरी आराधना करता है, वह समस्त फल प्राप्त कर लेता है।
18जो प्राणी मल-मूत्र की भाँति गन्दे, मूर्ख एवं बेवकूफ हैं, वह तेरे दर्शन करके श्रेष्ठ ज्ञानी हो जाते हैं।
19नानक प्रार्थना करता है - हे मेरे पूर्ण सर्वव्यापक भगवान ! तेरी सत्ता सदैव स्थिर है॥ ३॥
20हे मोहन ! तुम (संसार रूपी) बड़े परिवार से फलित विधि से प्रफुल्लित हुए हो।
21हे मोहन ! तुमने पुत्र, मित्र एवं कुटंब सहित सबका कल्याण कर दिया है।
22हे मोहन ! तुमने समस्त विश्व का कल्याण कर दिया है। जिन्होंने तेरे दर्शन किए तूने उनका अभिमान त्याग दिया है।
23हे मोहन ! जो तुझे धन्य कहते हैं अर्थात् गुणस्तुति करते हैं, यमदूत उनके कदापि निकट नहीं आता।
24हे मुरारी ! हे सच्चे गुरु ! तेरे गुण अनन्त हैं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।
25नानक वन्दना करता है-(हे प्रभु !) मैंने वह सहारा पकड़ा है, जिससे जुड़कर समूचे जगत् का उद्धार हो जाता है॥ ४॥ २ ॥
26गउड़ी महला ५ ॥
27श्लोक॥
28हे प्रभु ! असंख्य पापियों को तुम पवित्र पावन करते हो, मैं तुम पर बार-बार कुर्बान जाता हूँ।
29हे नानक ! राम नाम के भजन की अग्नि पापों को जला देने वाली है॥ १॥
30छंद॥
31हे मेरे मन ! तू राम, नारायण, गोविन्द, हरि का भजन कर, जो सृष्टि का रक्षक एवं माया का पति है।
32हे मेरे मन ! तू मुकुंद मुरारी का चिन्तन कर, जो दुखदायक मृत्यु की फाँसी को काट देता है।
33हे प्राणी ! प्रभु के सुन्दर चरणों की आराधना कर, जो दुखों का नाशक, निर्धनों का सहारा एवं लक्ष्मी का स्वामी श्रीधर है।
34एक क्षण भर के लिए प्रभु को स्मरण करने से मृत्यु के विषम मार्ग एवं अग्नि के सागर से उद्धार हो जाता है।
35हे प्राणी ! दिन-रात प्रभु का चिन्तन कर, जो कल्पना को नाश करने वाला एवं विकारों की मैल को पवित्र पावन करने वाला है।
36नानक प्रार्थना करता है - हे सृष्टि के पालनहार गोपाल ! हे गोबिन्द ! हे माधव ! मुझ पर कृपा करो।॥ १॥
37हे मेरे मन ! उस परमात्मा दामोदर को स्मरण कर, जो दुख दूर करने वाला और भय का नाश करने वाला है।
38हे बन्धु ! अपने स्वभाव अनुसार दयालु प्रभु लक्ष्मीपति, मन को चुराने वाला मनोहर एवं भक्तवत्सल है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं