गुरु ग्रंथ साहिब 247 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji
1माया के बन्धन में जकड़ा हुआ मन स्थिर नहीं रहता। क्षण-क्षण पीड़ा उसको पीड़ित करती है।
2हे नानक ! सांसारिक माया का दुख केवल तभी दूर होता है, जब मनुष्य अपने मन को गुरु के शब्द में मिला लेता है॥ ३॥
3हे मेरे प्रिय मन ! स्वेच्छाचारी जीव मूर्ख एवं अनाड़ी हैं। प्रभु के नाम को तुम अपने हृदय में नहीं बसाते।
4माया के भ्रम कारण तुम (ज्ञान से) अन्धे हो गए हो। हे मेरे प्रिय मन ! तुम प्रभु का मार्ग किस तरह प्राप्त कर सकते हो ?
5जब तक सतिगुरु को अच्छा नहीं लगता, तुझे मार्ग किस तरह मिल सकता है? स्वेच्छाचारी अपने अहंत्व को प्रकट करता है।
6प्रभु के सेवक भक्त सदैव ही सुखी हैं। वह अपने मन को गुरु के चरणों से लगाते हैं।
7ईश्वर जिस व्यक्ति पर अपनी कृपा करता है, वह सदैव प्रभु की गुणस्तुति करता रहता है।
8हे नानक ! इस संसार में केवल नाम के रत्न का ही लाभ है। गुरमुखों को प्रभु स्वयं यह सूझ प्रदान करता है॥ ४॥ ५॥ ७॥
9रागु गउड़ी छंत महला ५
10ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
11मेरे मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया है। मैं किस तरह अपने दाता प्रभु के दर्शन करूं ?
12पूज्य परमेश्वर, सर्वशक्तिमान विधाता ही मेरा मित्र एवं सखा है।
13हे भाग्य विधाता ! हे श्रीधर ! मैं व्याकुल तुझे किस तरह मिल सकता हूँ?
14हे प्रभु ! मेरे हाथ तेरी सेवा-भक्ति करते हैं। मेरा सिर तेरे चरणों पर झुका हुआ है और मेरे विनीत मन में तेरे दर्शनों की अभिलाषा है।
15हे ईश्वर ! श्वास-श्वास और एक घड़ी भर के लिए मैं तुझे विस्मृत नहीं करता। हर क्षण, मुहूर्त एवं दिन-रात मैं तुझे स्मरण करता हूँ।
16हे नानक ! हे दाता प्रभु ! हम जीव पपीहे की भाँति प्यासे हैं। तुझ से किस तरह मिलेंगे ? ॥ १॥
17हे मेरे प्रिय प्राणनाथ ! मैं एक विनती करती हूँ, इसे सुनिए।
18तेरी अदभुत लीलाएँ देखकर मेरा मन एवं तन मुग्ध हो गए हैं। तेरी आश्चर्यजनक लीलाएँ देखकर मैं मुग्ध हो गई हूँ।
19लेकिन अब मैं तेरी (लीलाओं से) उदास हो गई हूँ, (तेरे मिलन बिना) मुझे धैर्य नहीं मिलता।
20हे गुणों के स्वामी ! तू बड़ा दयालु, यौवन-सम्पन्न एवं समस्त गुणों से परिपूर्ण है।
21हे सुखों के दाता ! तू दोष-रहित हैं। अपने पापों से मैं तुझ से जुदा हो गई हूँ।
22नानक विनती करते हैं, हे मेरे प्रिय पति ! दया करो और मेरे हृदय घर में आ बसो॥ २॥
23मैं अपनी आत्मा समर्पित करता हूँ, मैं अपना समूचा शरीर समर्पित करता हूँ एवं अपनी समस्त भूमि समर्पित करता हूँ।
24मैं अपना शीश उस प्रिय मित्र को अर्पित करता हूँ, जो मुझे मेरे प्रभु का सन्देश दे।
25परम प्रतिष्ठित निवास वाले गुरु जी को मैंने अपना शीश समर्पित किया है और उन्होंने प्रभु को मेरे साथ ही दिखा दिया है।
26एक क्षण में मेरे तमाम दुख दूर हो गए हैं और सब कुछ जो मेरे ह्रदय की लालसा है, मुझे प्राप्त हो गया है।
27दिन-रात अब जीवात्मा आनन्द प्राप्त करती है और उसकी तमाम चिन्ताएँ मिट गई हैं।
28नानक वन्दना करते हैं कि उनको अपना मनपसन्द पति प्राप्त हो गया है॥ ३ ॥
29मेरे हृदय में आनन्द विद्यमान है और वधाइयां मिल रही हैं।
30मेरा प्रियतम मेरे हृदय घर में आ गया है और मेरी प्यास बुझ गई है।
31मैं गोपाल ठाकुर जी को मिल गई हूँ और मेरी सखियों ने मंगल गीत गायन किए हैं।
32मेरे समस्त मित्र एवं सगे-संबंधी आनंदपूर्वक हैं और मेरे कट्टर (कामादिक) शत्रुओं का नामोनिशान मिट गया है।
33अब मेरे हृदय में अनहद भजन गूंज रहा है और मेरे तथा मेरे प्रियतम हेतु सेज बिछाई गई है।
34नानक वन्दना करते हैं कि अब मैं सहज में रहता हूँ। मेरा सुखों का दाता पति-परमेश्वर मुझे मिल गया है॥ ४॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं