सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 245 · Raag Gauree · Guru Amar Daas Ji

1मैं गुरु के समक्ष विनती करती हूँ यदि उनको अच्छा लगे। जैसे भी वह मिला सकता है, मुझे अपने साथ मिला ले।

2सुखों के दाता, प्रभु ने मुझे अपने साथ मिला लिया है और वह स्वयं ही मेरे हृदय घर में आकर मुझे मिल गया है।

3हे नानक ! ऐसी जीव-स्त्री हमेशा के लिए अपने पति-प्रभु की सौभाग्यवती है। प्रियतम प्रभु न कभी मरता है और न ही अलग होता है। ४॥ २ ॥

4गउड़ी महला ३ ॥

5जीव-स्त्री सहज-स्वभाव ही हरि-रस में बिंध गई है।

6मनमोहन प्रभु ने उसको मुग्ध कर दिया है और उसकी दुविधा सहज ही नाश हो गई है।

7जीव-स्त्री सहज ही अपनी दुविधा निवृत करके और अपने पति-प्रभु को प्राप्त होकर गुरु के उपदेश द्वारा आनन्द प्राप्त करती है।

8यह शरीर गले तक झूठ एवं असत्य से भरा हुआ है और पाप करता रहता है।

9गुरु के माध्यम से भक्ति करने से ही सहज ध्वनि उत्पन्न होती है। प्रभु की भक्ति के बिना (विकारों की) मैल दूर नहीं होती।

10हे नानक ! जो जीव-स्त्री अपने अहंकार को अपनी अन्तरात्मा से निकाल देती है, वह अपने प्रियतम की प्रिया हो जाती है॥ १॥

11गुरु की प्रीति एवं प्रेम द्वारा पत्नी ने अपना प्रियतम स्वामी प्राप्त कर लिया है।

12गुरु को अपनी अन्तरात्मा एवं ह्रदय से लगाने से वह रात को सुख से सोती है।

13गुरु को अपनी अन्तरात्मा एवं ह्रदय में रात-दिन टिकाने से वह अपने प्रियतम से मिल जाती है और उसके दुःख दूर हो जाते हैं।

14गुरु के उपदेश का चिन्तन करने से अपने हृदय-मन्दिर में दुल्हन अपने दुल्हे (प्रभु) का प्रेम पाती है।

15दिन-रात वह नाम अमृत का पान करती है और अपनी दुविधा का नाश करती है।

16हे नानक ! गुरु के अनन्त प्रेम द्वारा सौभाग्यवती पत्नी अपने सत्यस्वरूप स्वामी को मिल जाती है॥ २ ॥

17हे मेरे प्रियतम ! अपनी दया करो और मुझे अपने दर्शन प्रदान करें।

18उसको सत्य नाम से सुशोभित करने के लिए पत्नी (जीवात्मा) तुझे प्रार्थना करती है।

19सत्य नाम से श्रृंगारी हुई जीव-स्त्री अपने अहंकार को मिटा देती है और गुरु के माध्यम से उसके काम संवर जाते हैं।

20युग-युगों में वह एक प्रभु ही सत्य है और गुरु के प्रदान किए हुए विचार द्वारा वह जाना जाता है।

21स्वेच्छाचारी जीव-स्त्री कामवासना के विलास में लीन एवं सांसारिक मोह की पीड़ित की हुई है। वह किसके समक्ष जाकर पुकार करे ?

22हे नानक ! परम प्यारे गुरु के बिना स्वेच्छाचारी नारी को कोई सुख का ठिकाना नहीं मिलता ॥ ३॥

23जीव-स्त्री मूर्ख, भोली एवं गुणविहीन है। पति-प्रभु अगम्य एवं अनन्त है।

24ईश्वर स्वयं ही अपने मिलन में मिलाता है और स्वयं ही क्षमाशील है।

25जीव-स्त्री का प्रियतम पति दोषों को क्षमा करने वाला है और कण-कण में मौजूद है।

26गुरु ने मुझे यह बोध विदित कर दिया है कि प्रभु प्रेम, प्रीति एवं भक्ति द्वारा पाया जाता है।

27जो जीव-स्त्री अपने पति के स्नेह में रात-दिन लीन रहती है, वह रात-दिन प्रसन्न रहती है।

28हे नानक ! जो जीव-स्त्री नाम के नौ भण्डार (नवनिधि) प्राप्त कर लेती है, वह सहज ही ईश्वर को अपने पति के तौर पर पा लेती है॥ ४ ॥ ३ ॥

29गउड़ी महला ३ ॥

30माया का सागर अत्याधिक हलचल मचा रहा है, भयानक जगत् सागर किस तरह पार किया जा सकता है?

31(हे प्राणी !) ईश्वर के नाम का जहाज बना और गुरु के शब्द को नाविक (मल्लाह) के तौर पर इसमें रख।

32जब गुरु के शब्द का नाविक (मल्लाह) उसमें रख लिया जाता है तो ईश्वर स्वयं भवसागर से पार कर देता है। इस विधि से अगम्य सागर पार किया जाता है।

33गुरु के माध्यम से ही प्रभु की भक्ति प्राप्त होती है और इस तरह मनुष्य जीवित ही मोह-माया से मृत रहता है।

34एक क्षण में ही राम का नाम उसके पाप मिटा देता है और उसका शरीर पवित्र हो जाता है।

35हे नानक ! राम के नाम द्वारा उद्धार हो जाता है और मन शुद्ध हो जाता है। १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं